
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दिया संकेत — आरबीआई और बैंकों के साथ मिलकर बन रहा है ग्लोबल बैंकिंग स्ट्रक्चर
भारत की ताकत बनाम बैंकिंग हकीकत
भारत आज दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
फिर भी, हैरानी की बात यह है कि भारत का एक भी बैंक दुनिया के टॉप 10 बैंकों की सूची में शामिल नहीं है।
सरकार को अब यह बात अखर रही है — और इसी कारण उसने एक “मेगा बैंक प्लान” पर काम शुरू कर दिया है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल ही में 12वें “एसबीआई बैंकिंग एंड इकॉनमिक्स कॉन्क्लेव 2025” में यह संकेत दिया कि भारत को अब ऐसे बड़े और विश्वस्तरीय बैंकों की जरूरत है जो अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मंच पर देश की स्थिति को मज़बूत कर सकें।
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सीतारमण का ऐलान: “भारत को चाहिए बड़े और ग्लोबल बैंक”
वित्त मंत्री ने कहा —
> “देश को कई बड़े और विश्वस्तरीय बैंकों की जरूरत है। सरकार इस दिशा में काम कर रही है और आरबीआई व बैंकों से बातचीत जारी है।”
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह केवल बैंकों के विलय (merger) से संभव नहीं होगा।
बल्कि एक ऐसा आर्थिक माहौल और नीति ढांचा बनाना होगा जिसमें बड़े बैंक विकसित और प्रतिस्पर्धी बन सकें।
सीतारमण ने बैंकों से अपील की कि वे उद्योग जगत को कर्ज देने की प्रक्रिया को और आसान और पारदर्शी बनाएं ताकि निवेश को गति मिले।
उन्होंने भरोसा जताया कि जीएसटी दरों में कटौती से घरेलू मांग बढ़ेगी, जिससे कुल निवेश और विकास दर में सुधार होगा।
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सरकार का लक्ष्य: मजबूत बैंकिंग संरचना और पूंजी प्रवाह
भारत की वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार अब बुनियादी ढांचे (Infrastructure) और आर्थिक आत्मनिर्भरता (Self-reliance) पर विशेष ध्यान दे रही है।
उन्होंने बताया कि पिछले 10 वर्षों में पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) में 5 गुना वृद्धि हुई है।
इससे न केवल विकास परियोजनाओं को गति मिली है बल्कि रोजगार सृजन और आर्थिक संतुलन भी मजबूत हुआ है।
> “आर्थिक आत्मनिर्भरता का अर्थ है कि देश अपनी समृद्धि खुद पैदा करे। इसमें खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, MSME, कपड़ा उद्योग और पर्यटन जैसे क्षेत्रों की बड़ी भूमिका है।” — निर्मला सीतारमण
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बड़े बैंक बनाने की पुरानी कोशिशें
भारत सरकार पहले भी कई बार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के एकीकरण (Bank Mergers) के माध्यम से इस दिशा में कदम उठा चुकी है।
2017 में देश में जहां 27 सरकारी बैंक थे, वहीं आज उनकी संख्या घटकर 12 रह गई है।
प्रमुख विलयों की सूची:
2020 में:
यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया + ओरिएंटल बैंक ऑफ कॉमर्स → पंजाब नेशनल बैंक
सिंडिकेट बैंक → केनरा बैंक
इलाहाबाद बैंक → इंडियन बैंक
आंध्रा बैंक + कॉरपोरेशन बैंक → यूनियन बैंक ऑफ इंडिया
2019 में:
देना बैंक + विजया बैंक → बैंक ऑफ बड़ौदा
2017 में:
एसबीआई ने अपने 5 सहयोगी बैंकों और भारतीय महिला बैंक का विलय किया।
इससे स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) एक विशाल बैंक के रूप में उभरा।
इन विलयों से बैंकिंग सेक्टर में संरचनात्मक मजबूती तो आई, लेकिन भारत अभी भी वैश्विक बैंकिंग शक्ति बनने से काफी दूर है।
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निजीकरण और विदेशी निवेश की दिशा
जनवरी 2019 में, सरकार ने आईडीबीआई बैंक में अपनी 51% हिस्सेदारी भारतीय जीवन बीमा निगम (LIC) को बेच दी थी।
वर्तमान में, सरकार और एलआईसी दोनों मिलकर इस बैंक में अपनी शेष हिस्सेदारी की रणनीतिक बिक्री की प्रक्रिया आगे बढ़ा रहे हैं।
बैंकिंग विशेषज्ञों का मानना है कि अगर सरकार प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) की सीमा को बढ़ाकर 49% करती है (वर्तमान सीमा 20% है), तो भारत के बैंकों में वैश्विक पूंजी का प्रवाह तेज़ हो सकता है।
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एसबीआई चेयरमैन का बयान: 2030 तक टॉप 10 में पहुंचेगा भारतीय बैंक
एसबीआई के चेयरमैन सी. एस. शेट्टी ने इस कॉन्फ्रेंस में कहा —
> “भारतीय स्टेट बैंक 2030 तक दुनिया के टॉप 10 बैंकों की सूची में शामिल हो जाएगा।”
उन्होंने बताया कि एसबीआई का मार्केट कैपिटलाइजेशन 100 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है।
शेट्टी का मानना है कि भारत के बैंकिंग सेक्टर में जो सुधार हो रहे हैं, वे आने वाले वर्षों में इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाएंगे।
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क्यों जरूरी हैं भारत के लिए “महाबैंक”?
भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है। लेकिन ग्लोबल फाइनेंशियल पावर के लिहाज से हमारे बैंकों का आकार अभी भी छोटा है।
बड़े बैंकों के फायदे:
1. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्रेडिट रेटिंग में सुधार।
2. विदेशी निवेशकों का भरोसा बढ़ना।
3. बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को फंड करने की क्षमता।
4. डिजिटल बैंकिंग और फिनटेक में निवेश की संभावना।
विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी का लक्ष्य हासिल करना है, तो उसे बड़े, लचीले और तकनीकी रूप से सक्षम बैंकों की जरूरत होगी।
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चुनौतियां भी कम नहीं
हालांकि, बड़े बैंकों के निर्माण के साथ कई जोखिम और चुनौतियां भी हैं —
अत्यधिक केंद्रीकरण से जोखिम बढ़ सकता है।
कमजोर प्रबंधन या खराब ऋण नीति (NPA) से संकट फैल सकता है।
छोटे बैंकों और ग्रामीण वित्तीय संस्थानों की भूमिका सीमित हो सकती है।
इसलिए विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को इस प्रक्रिया में संरचनात्मक सुधार, तकनीकी पारदर्शिता, और जोखिम प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना होगा।
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निष्कर्ष: “मेक इन इंडिया” से “बैंक इन इंडिया” तक
भारत का “महा बैंक मिशन” सिर्फ वित्तीय नहीं बल्कि राष्ट्रीय रणनीतिक प्रयास है।
यह उस आत्मविश्वास का प्रतीक है जिसके साथ भारत अब वैश्विक आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
निर्मला सीतारमण का यह कदम इस बात का संकेत है कि आने वाले दशक में भारत केवल चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि दुनिया की शीर्ष बैंकिंग शक्ति भी बनना चाहता है।
2030 तक अगर एसबीआई या किसी अन्य भारतीय बैंक का नाम टॉप 10 में आता है, तो यह न सिर्फ भारत की आर्थिक ताकत, बल्कि नीतिगत दूरदर्शिता का भी प्रमाण होगा।
