मध्यप्रदेश के जनजातीय अंचल की गौरवशाली परंपराओं और नायकों की अदम्य वीरता को समर्पित तीन दिवसीय गोंड नृत्य-नाट्य समारोह बुधवार को हरदा के शासकीय पॉलिटेक्निक कॉलेज में संपन्न हुआ। इस समारोह में गोंड जनजाति के इतिहास, संस्कृति, कला और साहस की झलक देखने को मिली। राजा पेमल शाह, रानी दुर्गावती, और अनेक अज्ञात गोंड योद्धाओं की वीरता को नृत्य, गीत और नाट्य रूपांतरणों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया। यह आयोजन केवल मनोरंजन नहीं था — यह उस ऐतिहासिक स्मृति का पुनर्जागरण था, जिसे कभी जनजातीय समाज की आत्मा में गहराई से बसाया गया था।

गोंड संस्कृति की धड़कन पर थिरकी हरदा की धरती
कार्यक्रम का उद्घाटन पारंपरिक गोंड ढोल, तुमरी, और मादल की ताल से हुआ। रंग-बिरंगे परिधानों में सजे कलाकारों ने जैसे ही मंच संभाला, सभागार में बैठा हर दर्शक मंत्रमुग्ध हो गया। पहले दिन की प्रस्तुति थी — “राजा पेमल शाह की वीरता और गोंड जनों की एकता”।
इस नाट्य प्रस्तुति में दिखाया गया कि कैसे पेमल शाह ने अन्याय के विरुद्ध अपनी प्रजा की रक्षा की और अपनी भूमि की स्वाधीनता के लिए बलिदान दिया।
दूसरे दिन रानी दुर्गावती के संघर्ष को मंच पर जीवंत किया गया। महिलाओं के एक समूह ने ‘दुर्गावती के रण’ नामक नृत्य-नाटक प्रस्तुत किया जिसमें रानी की वीरता और आत्मसम्मान की भावना को बड़े ही प्रभावशाली ढंग से दिखाया गया। तीसरे दिन ‘जनजातीय गौरव गीत’ कार्यक्रम हुआ, जिसमें स्थानीय कलाकारों के साथ प्रदेश भर से आए दलों ने भाग लिया।
कलाकारों का जनसमर्पण: परंपरा और आधुनिकता का संगम
इस आयोजन में हरदा, बैतूल, डिंडोरी, मंडला, सिवनी, छिंदवाड़ा, बालाघाट और झाबुआ से लगभग 400 से अधिक कलाकारों ने हिस्सा लिया। गोंड समुदाय के युवा कलाकारों ने पारंपरिक नृत्यों में आधुनिक संगीत और रोशनी के संयोजन से कार्यक्रम को जीवंत बना दिया।
कलाकारों ने कहा —
“हमारे पूर्वजों की कहानियाँ किताबों में नहीं, हमारे नृत्य और गीतों में जीवित हैं।”
हर प्रस्तुति में सामूहिकता, प्रकृति के प्रति आस्था और समुदाय की एकता का संदेश स्पष्ट दिखा।
राजा पेमल शाह: एक भूले-बिसरे नायक की पुनर्स्मृति
इस समारोह की सबसे प्रभावशाली प्रस्तुति रही “पेमल शाह की वीर गाथा”। राजा पेमल शाह गोंड वंश के एक बहादुर योद्धा माने जाते हैं जिन्होंने अपने लोगों की रक्षा के लिए बाहरी शक्तियों से संघर्ष किया। उनकी गाथा गोंड लोकगीतों में अमर है, लेकिन मुख्यधारा के इतिहास ने उन्हें वह स्थान नहीं दिया जिसके वे अधिकारी थे।
नाट्य मंचन में दिखाया गया कि कैसे पेमल शाह ने जंगलों, नदियों और पहाड़ों के बीच बसे अपने लोगों को आत्मनिर्भर बनाया और अन्याय के विरुद्ध खड़ा किया। उनकी कथा ने हर दर्शक को गर्व और सम्मान से भर दिया।
गोंड जनजाति की सांस्कृतिक विरासत: गीतों में इतिहास, नृत्य में पहचान
गोंड समाज की संस्कृति प्रकृति और सामूहिकता पर आधारित है। उनके नृत्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उनके जीवन की लय हैं।
हर ताल में जंगल की आवाज़, हर रंग में मिट्टी की सुगंध और हर गीत में संघर्ष की गूंज होती है।
इस नृत्य-नाट्य समारोह में पारंपरिक सेला, करमा, रीना, और लिंगो पेंदा नृत्य प्रस्तुत किए गए। मंच पर जब कलाकारों ने सामूहिक नृत्य किया, तो ऐसा लगा जैसे इतिहास जीवित हो उठा हो।
कार्यक्रम की खास झलकियाँ
- मंच सज्जा में जनजातीय कलाकृतियों, बाँस और मिट्टी के प्रतीकों का प्रयोग किया गया था।
- दर्शकों को पारंपरिक पेय और जनजातीय व्यंजन भी परोसे गए।
- बच्चों द्वारा प्रस्तुत “लिंगो देव कथा” ने सबका मन मोह लिया।
- महिला कलाकारों ने “नारी शक्ति और जनजातीय अस्मिता” पर आधारित नृत्य प्रस्तुत किया।
अतिथियों और प्रशासन की उपस्थिति
समारोह के समापन अवसर पर जिला कलेक्टर, जनजातीय विभाग के अधिकारी और स्थानीय जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।
मुख्य अतिथि ने कहा —
“यह केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि हमारी जड़ों से जुड़ने का प्रयास है।
आज की पीढ़ी को यह समझना जरूरी है कि जनजातीय नायक ही असली धरती के रक्षक हैं।”
समाज में संदेश: अपनी पहचान पर गर्व करो
कार्यक्रम का मूल संदेश था — “अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान पर गर्व करें।” गोंड समुदाय को यह एहसास दिलाया गया कि उनकी परंपराएँ केवल अतीत नहीं, बल्कि भविष्य की प्रेरणा हैं। युवाओं को प्रोत्साहित किया गया कि वे अपने लोकगीतों और नृत्यों को आधुनिक माध्यमों से दुनिया तक पहुँचाएँ।
अकादमिक महत्व और भविष्य की योजना
इस समारोह ने एक अकादमिक विमर्श को भी जन्म दिया — कैसे जनजातीय इतिहास को शिक्षा प्रणाली में समाविष्ट किया जाए?
कई शिक्षाविदों और शोधकर्ताओं ने सुझाव दिए कि गोंड नायकों पर आधारित पुस्तकों और डॉक्युमेंट्रीज़ को स्कूल पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए।
जनजातीय विभाग ने घोषणा की कि हर वर्ष प्रदेश के विभिन्न जिलों में ऐसे समारोह आयोजित किए जाएंगे, ताकि गोंड संस्कृति का संरक्षण और प्रसार हो सके।
गोंड समाज की एकजुटता और गर्व का उत्सव
अंतिम दिन सामूहिक नृत्य “आदि संस्कृति का उत्सव” के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। हजारों दर्शकों ने खड़े होकर तालियों की गड़गड़ाहट से कलाकारों का स्वागत किया। हर चेहरे पर गर्व, हर नृत्य में एकता और हर ताल में इतिहास की गूंज थी।
हरदा की यह शाम केवल नृत्य और संगीत की नहीं थी — यह अपने पूर्वजों की याद, अपनी संस्कृति की रक्षा और अपने अस्तित्व के उत्सव की शाम थी।
निष्कर्ष: इतिहास के रंगों में आज की पहचान
तीन दिनों तक हरदा की हवा में डमरू की धुन, पगड़ियों की लहर और मिट्टी की खुशबू घुली रही। राजा पेमल शाह और अन्य गोंड नायकों की वीरता ने नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ा। यह आयोजन साबित करता है कि जब कला और इतिहास साथ चलते हैं, तो समाज अपने गौरव को फिर से जीने लगता है।
गोंड समाज का यह नृत्य-नाट्य समारोह केवल मंचीय प्रदर्शन नहीं था — यह इतिहास के साथ संवाद था, आत्मगौरव का उत्सव था, और भविष्य की प्रेरणा का संदेश था।
