इंदौर, जिसे स्वच्छता की राजधानी कहा जाता है, वहां एक ऐसी घटना सामने आई जिसने शहर की छवि को झकझोर दिया। खातीपुरा क्षेत्र में चल रही एक गजक और कुल्फी बनाने वाली फैक्ट्री की असलियत तब सामने आई जब खाद्य सुरक्षा विभाग की टीम अचानक निरीक्षण के लिए पहुंची। वहां जो दृश्य थे, वे इतने भयावह और अस्वच्छ थे कि निरीक्षण करने वाले अधिकारी भी दंग रह गए। मीठे स्वाद की इस परंपरागत गजक के पीछे छिपी गंदगी, लापरवाही और नियमों की अनदेखी ने इस मामले को और गंभीर बना दिया। यह सिर्फ एक कारखाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि किस तरह हमारे भोजन के साथ खिलवाड़ किया जा सकता है और कैसे एक छोटी-सी लापरवाही हजारों लोगों की सेहत पर भारी पड़ सकती है।

अस्वच्छता का अड्डा बन चुकी फैक्ट्री की असली तस्वीर
खातीपुरा स्थित सुमित गजक और कुल्फी के कारखाने में जब विभाग की टीम दाखिल हुई तो सबसे पहला आघात गंध ने ही कर दिया। सीलन, मक्खियों की भनभनाहट, फर्श पर फैली मिट्टी और तिल-मूंगफली के ढेर जो जगह-जगह बिखरे पड़े थे। जहां आमतौर पर गजक जैसी कठोर और सुकून देने वाली मिठाई तैयार की जाती है, वहीं इस कारखाने में वह खुले में, गंदगी के बीच और बिना किसी सुरक्षा मानक के बनाई जा रही थी।
कर्मचारियों ने न तो दस्ताने पहने थे, न मास्क, और न ही साफ एप्रन। हाथों में चिपका गुड़ और तिल उनके कपड़ों पर आसानी से दिख रहा था। गुड़ की कड़ाही के आसपास कचरे के ढेर ऐसे बिखरे थे जैसे महीनों से सफाई न की गई हो। तिल की बोरी खुली पड़ी थी, जिस पर धूल की परतें जमी थीं और मूंगफली के दानों में कीड़ों का बसेरा देखने को मिला।
फूड लाइसेंस तक नहीं, थोक उत्पादन जारी
निरीक्षण के बाद एक और चौंकाने वाला खुलासा सामने आया। फैक्ट्री संचालक सुमित शिवहरे के पास खाने की वस्तुओं का उत्पादन करने का फूड लाइसेंस तक मौजूद नहीं था। स्वच्छता तो दूर, कानूनी रूप से मंजूरी भी नहीं थी।
इस बिना लाइसेंस की फैक्ट्री में हर दिन सैकड़ों किलो गजक बनती थी, जो शहर के दुकानों, ठेलों और बाजारों में बेचने के लिए भेजी जाती थी। लोग खरीदते थे, खाते थे, बच्चों को खिलाते थे, त्योहारों पर बांटते थे और उन्हें यह पता भी नहीं था कि यह मिठाई कैसे बन रही है और किन परिस्थितियों से गुजरकर उनकी थाली में पहुंच रही है।
नमूनों की जांच
कारखाने में मौजूद गुड़, तिल, मूंगफली पट्टी और तैयार गजक के कई नमूने लिए गए हैं। इनके परीक्षण से ही तय होगा कि इस फैक्ट्री में मिलावट किस स्तर पर की जा रही थी। अक्सर सस्ते कारखानों में गुड़ में रंग और रासायनिक पदार्थ मिलाए जाते हैं, तिल में पुराना स्टॉक मिलाया जाता है और मूंगफली में फफूंदी पाई जाती है जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है।
अगर जांच में मिलावट साबित होती है, तो यह मामला आम खाद्य उल्लंघन से बढ़कर एक आपराधिक कार्रवाई का विषय बन सकता है।
कार्रवाई और सीलिंग
लाइसेंस न होने और अस्वच्छ परिस्थितियों में गजक उत्पादन जारी रखने के कारण फूड विभाग ने तत्काल कारखाना बंद करवा दिया। जहां गजक बनाई जा रही थी, वहां ताला जड़ दिया गया है और संचालक पर आगे कानूनी कार्रवाई की तैयारी की जा रही है।
स्वच्छता जांच के तहत अन्य जगहों पर भी निरीक्षण हुआ, जहां राजगीरा लड्डू, तिल लड्डू, पनीर, चावल और मैदा के नमूने जांच के लिए लिए गए। इससे भी पता चलता है कि खाद्य सुरक्षा विभाग ने बड़े पैमाने पर कार्रवाई शुरू की है ताकि शहर में मिलावटकारी गतिविधियों को रोका जा सके।
गजक और इंदौर की पहचान
गजक केवल मिठाई नहीं है, मध्य प्रदेश की गरिमा है। सर्दियों के मौसम में इसकी मांग चरम पर होती है। परिवार के लोग इसे उत्सव की तरह खरीदते हैं और शहर के बाजारों में इसकी ख़ास खुशबू बिखरी रहती है।
इंदौर जैसा शहर, जो स्वच्छता में अमूल्य उपलब्धियां हासिल कर चुका है, उसके लिए ऐसी घटना साफ सन्देश है कि स्वच्छता केवल सड़कों तक सीमित नहीं हो सकती। भोजन की गुणवत्ता, फैक्ट्री की स्थिति और उत्पादन के मानक भी उतने ही जरूरी हैं।
विशेषज्ञों की राय
खाद्य विशेषज्ञ बताते हैं कि अस्वच्छ वातावरण में बनाई गई गजक कई तरह की बीमारियां फैला सकती है। गंदगी में बनी वस्तुएं बैक्टीरिया और फफूंदी से प्रभावित हो सकती हैं। लगातार सेवन से पेट के संक्रमण, उल्टी, दस्त, फूड पॉइजनिंग, एलर्जी और गंभीर स्थितियों में लंबे समय की बीमारियां हो सकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि लोग सबसे पहले यह देखें कि जिस दुकान से मिठाई खरीदी जा रही है, वह भरोसेमंद है या नहीं। गजक, लड्डू या किसी भी मिठाई का उत्पादन मान्यता प्राप्त जगहों से ही लेना चाहिए।
जनता की चिंता
जैसे ही यह खबर फैली, सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रियाएं आने लगीं। कई लोगों ने नाराजगी दिखाई और कहा कि शहर में इस तरह की मिलावटकारी गतिविधियों पर कठोर कार्रवाई की जरूरत है। कुछ लोगों ने पुराने अनुभव साझा किए, जहां उन्हें भी मिठाई की गुणवत्ता को लेकर शिकायत रही थी।
निष्कर्ष
यह मामला केवल एक फैक्ट्री को सील करने का नहीं है, बल्कि यह चेतावनी है कि हमारे भोजन की सुरक्षा के लिए नियमों का पालन अत्यंत आवश्यक है। इंदौर जैसा शहर जहां स्वच्छता को लेकर लगातार प्रयास किए जाते हैं, वहां इस घटना ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा कर दिया है।
क्या स्वच्छता केवल बाहर से दिखने वाली सफाई तक सीमित रह गई है, या हमारे भोजन के अंदर भी इसकी उतनी ही जरूरत है?
अभी इस सवाल का जवाब आगे की कार्रवाई और जांच पर निर्भर होगा। पर फिलहाल यह घटना निश्चित तौर पर लोगों को सजग रहने की सलाह देती है।
