बिहार की राजनीति पिछले कुछ वर्षों से लगातार उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है, परंतु 2025 के विधानसभा चुनावों के बाद जो दृश्य उभरा, उसने प्रदेश की राजनीतिक हवा ही बदलकर रख दी। चुनावी नतीजों के सामने आते ही राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के भीतर उठता धुआँ एकदम से लपटों में बदल गया और लालू प्रसाद यादव के परिवार की अंदरूनी कलह एकदम खुलकर सामने आ गई। यह विवाद किसी सामान्य बयानबाज़ी या असहमति भर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती के तौर पर उभरा है।
इस तूफ़ान की शुरुआत हुई लालू यादव की बेटी रोहिणी आचार्य के अचानक आए भावुक और तीखे बयानों से। शनिवार को उन्होंने मीडिया से कहा कि अब उनका कोई परिवार नहीं है, बल्कि उन्हें परिवार से बाहर निकाल दिया गया है। इसका दोष उन्होंने सीधे तौर पर तेजस्वी यादव और उनके करीबी माने जाने वाले संजय यादव और रमीज़ पर लगाया।

उनका यह बयान सिर्फ एक भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं माना गया, बल्कि राजनीतिक गलियारों में इसे लालू परिवार के भीतर की गहरी दरार के रूप में देखा जा रहा है। संभवतः यह आरजेडी के भीतर लंबे समय से simmer हो रही असहमति का विस्फोट था, जो अब चुनाव परिणामों की पृष्ठभूमि में सामने आया।
रोहिणी का दर्द: ‘‘मेरा कोई परिवार नहीं’’ – क्या है भीतर की कहानी?
रोहिणी आचार्य केवल लालू यादव की बेटी ही नहीं, बल्कि वही बेटी हैं जिन्होंने साल 2022 में अपने पिता को नई ज़िंदगी देने के लिए अपनी किडनी दान की थी। उस समय पूरा देश भावुक था। लालू परिवार की एकता, बाप-बेटी का प्रेम और त्याग की कहानी को हर किसी ने सराहा था।
लेकिन आज वही रोहिणी कह रही हैं कि उनका कोई परिवार नहीं! बात यहीं नहीं थमी—they alleged कि तेजस्वी, रमीज़ और संजय यादव ने उन्हें परिवार से बाहर किया है क्योंकि ‘‘वे जिम्मेदारी लेना नहीं चाहते’’।
यह बयान चौंकाने वाला भी है और सवाल खड़े करने वाला भी।
रोहिणी पिछले एक साल से समय-समय पर पार्टी में ‘बाहरी दख़ल’, ‘किसी एक व्यक्ति का नियंत्रण’, ‘वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी’ जैसे मुद्दों पर अपनी नाराज़गी जताती रही हैं। लेकिन इस बार मामला सबसे बड़े स्तर तक पहुँच गया, जहाँ उन्होंने परिवार तक से रिश्ते खत्म करने का एलान कर दिया।
आरजेडी के लिए चुनौती: नेतृत्व की चुप्पी और बढ़ती बेचैनी
तेजस्वी यादव, लालू यादव और पूरे परिवार की ओर से अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है। पार्टी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने इसे ‘‘पारिवारिक मसला’’ बताकर बात को शांत करने की कोशिश जरूर की, लेकिन यह स्पष्ट है कि मामला सतही नहीं है।
चुनाव में खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी पहले ही समीक्षा मोड में है। ऐसे में परिवार की अंदरूनी लड़ाई पार्टी की छवि और संगठनात्मक ढांचे दोनों पर भारी पड़ सकती है।
कौन हैं संजय यादव—तेजस्वी के ‘चाणक्य’ जिनके खिलाफ उठे आरोप?
रोहिणी के बयान में ‘चाणक्य’ शब्द का इस्तेमाल किया गया। बिहार की राजनीति में आम तौर पर यह टैग संजय यादव को दिया जाता है।
संजय यादव की कहानी दिलचस्प है—
– मूल रूप से हरियाणा के महेंद्रगढ़ के निवासी
– कंप्यूटर साइंस में एमएससी
– तेजस्वी से क्रिकेट के मैदान में दोस्ती
– नौकरी छोड़कर तेजस्वी के साथ बिहार की राजनीति में आना
– 2013 से तेजस्वी की टीम का हिस्सा
– पार्टी की नई रणनीतियों और डिजिटल बदलावों के मुख्य कर्ता
उनकी रणनीति ने 2020 के चुनावों में आरजेडी को बड़ी बढ़त दिलवाई। नौकरी देने का वादा, युवाओं को जोड़ने के प्रयास और सोशल मीडिया रणनीति का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है।
लेकिन दूसरी ओर पार्टी के बड़े और पुराने नेता—अक्सर शिकायत करते हैं कि संजय धीरे-धीरे ‘‘ताकत का केंद्र’’ बनते जा रहे हैं और ‘‘आउटसाइडर’’ होकर भी फैसलों पर उनकी पकड़ बढ़ती जा रही है।
रमीज़ का रोल—ज्यादा पर्दे के पीछे, पर असर व्यापक?
रमीज़ को लेकर सार्वजनिक तौर पर कम जानकारी है, लेकिन उनका नाम बीजेपी या मीडिया में कम नहीं चर्चा में है।
– माना जाता है कि वे तेजस्वी के बहुत नजदीकी हैं
– पार्टी के सोशल मीडिया और प्रचार तंत्र में उनकी भूमिका बड़ी बताई जाती है
– पर उनकी औपचारिक भूमिका स्पष्ट नहीं
रोहिणी ने आरोप लगाया है कि रमीज़ और संजय मिलकर पार्टी के फैसलों को नियंत्रित कर रहे हैं और परिवार को दूर किया जा रहा है।
सिर्फ भावनात्मक नहीं—यह राजनीतिक सत्ता संघर्ष है
यह विवाद केवल पारिवारिक भावनाओं तक सीमित नहीं है।
दरअसल यह संघर्ष है—
– राजनीतिक नियंत्रण का
– पार्टी की रणनीति का
– प्रमुख पदों पर प्रभाव का
– पुराने बनाम नए नेताओं का
– परिवार बनाम बाहरी सलाहकारों का
आरजेडी में लंबे समय से देखा जा रहा है कि राजनीति की कमान तेजस्वी के हाथ में जाने के बाद ‘‘नए दोस्त’’ खास प्रभाव में आ गए हैं, जबकि पुराने नेताओं की भूमिका सीमित होती जा रही है।
यही वह जगह है जहां रोहिणी का गुस्सा फूटा है।
2025 के चुनाव—करारी हार और उसके बाद उठे सवाल
इस बार आरजेडी को अपेक्षा से कम सीटें मिलीं।
कार्यकर्ता और स्थानीय नेता बार-बार यह शिकायत करते रहे कि—
– तेजस्वी से मिल पाना मुश्किल है
– संजय की अनुमति के बिना फैसले नहीं होते
– चुनावी प्रचार में पुराने नेताओं को महत्व नहीं मिला
– उम्मीदवारों के चयन में नए सलाहकारों ने ज्यादा दखल दिया
इन्हीं असंतोषों ने चुनाव के बाद एक बड़े राजनीतिक विस्फोट का रूप ले लिया।
पहले भी संजय पर रोहिणी का हमला—फ्रंट सीट का विवाद
कुछ महीने पहले जब संजय यादव तेजस्वी की ‘बिहार अधिकार यात्रा’ के दौरान फ्रंट सीट पर बैठे देखे गए, तब भी रोहिणी ने नाराज़गी जताई थी। उन्होंने X (ट्विटर) पर लिखा: ‘‘फ्रंट सीट सदैव शीर्ष नेता के लिए होती है’’। उनके इस बयान के बाद उन्हें ट्रोल किया गया और उन्होंने तेजस्वी व लालू दोनों को अनफॉलो कर दिया।
क्या आरजेडी टूट की ओर बढ़ रही है?
विश्लेषकों के मुताबिक, यह संकट घातक ज़रूर है, पर तत्काल पार्टी टूटेगी ऐसा नहीं कहा जा सकता। आरजेडी के पास अभी भी राज्य का सबसे बड़ा सामाजिक समीकरण है। लेकिन अगर पारिवारिक विवाद नहीं सुलझा, तो पार्टी का नेतृत्व और दिशा दोनों प्रभावित हो सकती है।
नलिन वर्मा, वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं: ‘यह वही परीक्षा है जो हर राजनीतिक परिवार को कभी न कभी देनी पड़ती है।’’
क्या तेजस्वी स्थिति संभाल पाएंगे?
तेजस्वी की राजनीति में काबिलियत और ऊर्जा को नकारा नहीं जा सकता। वे बिहार में युवाओं के सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक हैं। लेकिन अब उन्हें दो बड़ी चुनौतियों से एक साथ जूझना पड़ेगा—
– चुनावी नाकामी
– परिवार की नाराज़गी
देखना यह होगा कि वह संजय–रमीज़ विवाद और बहन रोहिणी की नाराज़गी को कैसे संभालते हैं।
