मुख्य बातें
- मध्यप्रदेश सरकार इंदौर, उज्जैन और भोपाल को मेट्रोपॉलिटन सिटी के रूप में विकसित करने की दिशा में काम कर रही है।
- वर्ष 2047 तक इस क्षेत्र में लगभग 20 लाख रोजगार, 12 से 15 नई टाउनशिप और 25 से 30 हजार एकड़ में नियोजित विकास का लक्ष्य है।
- इंदौर आर्थिक क्षेत्र की योजना में आठ जिलों को शामिल कर 2047 तक अर्थव्यवस्था 500 से 600 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।
- शहरी परियोजनाओं के लिए 2,013.81 करोड़ रुपये की वित्तीय व्यवस्था और तीन शहरी नीतियों के प्रारूप जनपरामर्श के लिए प्रस्तुत किए गए।

मध्यप्रदेश में शहरी विकास को नई दिशा देने के लिए इंदौर, उज्जैन और भोपाल को मेट्रोपॉलिटन सिटी के रूप में विकसित करने की योजना पर काम किया जा रहा है। राज्य सरकार ने वर्ष 2047 तक इस क्षेत्र में करीब 20 लाख रोजगार के अवसर तैयार करने, 12 से 15 नई टाउनशिप बसाने और 25 से 30 हजार एकड़ भूमि पर सुनियोजित शहरी विकास का लक्ष्य रखा है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 28 अक्टूबर को इंदौर में आयोजित अर्बन ग्रोथ कॉन्क्लेव 2.0 में यह जानकारी दी।
इस योजना का उद्देश्य केवल शहरों का विस्तार करना नहीं, बल्कि उन्हें उद्योग, व्यापार, निवेश, आवास और रोजगार के बड़े केंद्रों के रूप में विकसित करना है। इसके साथ ही जल सुरक्षा, आधुनिक परिवहन, किफायती आवास और पर्यावरण संरक्षण को भी शहरी विकास की रूपरेखा में शामिल किया गया है।
2047 तक शहरों की विकास योजना
मुख्यमंत्री के अनुसार, इंदौर, उज्जैन और भोपाल को मेट्रोपॉलिटन सिटी के रूप में विकसित करने के लिए दीर्घकालीन योजना पर काम चल रहा है। इसके तहत 2047 तक लगभग 20 लाख रोजगार के अवसर पैदा करने और 12 से 15 नई टाउनशिप विकसित करने का लक्ष्य है। इस क्षेत्र में 25 से 30 हजार एकड़ भूमि पर नियोजित विकास की योजना भी प्रस्तावित है।
इंदौर फ्यूचर सिटी इस योजना का एक प्रमुख हिस्सा होगी। इसके लिए लगभग 5 हजार एकड़ क्षेत्र में आवासीय, औद्योगिक और रोजगार आधारित गतिविधियों को विकसित करने की बात कही गई है। इससे शहर के विस्तार को योजनाबद्ध स्वरूप देने और उद्योगों के साथ आवासीय सुविधाओं का विकास करने की मंशा है।
हालांकि, इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए भूमि विकास, परिवहन संपर्क, जल और सीवरेज व्यवस्था, निवेश तथा स्थानीय निकायों की क्षमता जैसे मुद्दे महत्वपूर्ण होंगे। कॉन्क्लेव में इन्हीं क्षेत्रों से जुड़ी योजनाओं और निवेश की संभावनाओं पर चर्चा हुई।
आठ जिलों को जोड़कर बनेगा आर्थिक क्षेत्र
कॉन्क्लेव में नीति आयोग की पहल के तहत तैयार इंदौर आर्थिक क्षेत्र यानी आईईआर-2047 की आर्थिक योजना रिपोर्ट भी जारी की गई। इस योजना में इंदौर के साथ उज्जैन, धार, देवास, रतलाम, खरगोन, खंडवा और शाजापुर को शामिल किया गया है। इस तरह मालवा-निमाड़ के आठ जिलों को एकीकृत आर्थिक क्षेत्र के रूप में विकसित करने की रूपरेखा तैयार की गई है।
रिपोर्ट के अनुसार, इस क्षेत्र की मौजूदा अर्थव्यवस्था लगभग 37.4 अरब डॉलर आंकी गई है। इसे वर्ष 2047 तक 500 से 600 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है। योजना में 12 लाख से अधिक रोजगार सृजित करने और 100 अरब डॉलर से ज्यादा निजी निवेश आकर्षित करने की परिकल्पना है।
इस आर्थिक क्षेत्र के लिए उन्नत विनिर्माण, इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग, फार्मा और टेक्सटाइल पार्क, खाद्य प्रसंस्करण, धार्मिक एवं सांस्कृतिक पर्यटन, ज्ञान और नवाचार केंद्र तथा आधुनिक परिवहन व्यवस्था से जुड़ी 60 से अधिक परियोजनाएं प्रस्तावित हैं।
यहां दो अलग-अलग लक्ष्यों को समझना जरूरी है। इंदौर-उज्जैन-भोपाल मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के लिए लगभग 20 लाख रोजगार का लक्ष्य बताया गया है, जबकि आठ जिलों वाले इंदौर आर्थिक क्षेत्र की रिपोर्ट में 12 लाख से अधिक रोजगार की परिकल्पना है। दोनों योजनाओं का भौगोलिक दायरा और विकास का आधार अलग है।
शहरी परियोजनाओं के लिए 2,013 करोड़
कॉन्क्लेव में शहरी अधोसंरचना और नागरिक सुविधाओं से जुड़ी परियोजनाओं के लिए 2,013.81 करोड़ रुपये की वित्तीय व्यवस्था वाले तीन प्रमुख समझौते किए गए। इनमें उज्जैन मंदिर सर्किट के विकास के लिए उज्जैन विकास प्राधिकरण और इंडियन ओवरसीज बैंक के बीच 643.39 करोड़ रुपये की ऋण व्यवस्था शामिल है।
इंदौर में जल प्रदाय और सीवरेज परियोजनाओं के लिए इंदौर नगर निगम तथा बैंक ऑफ इंडिया के बीच 1,320.42 करोड़ रुपये का ऋण अनुबंध हुआ। वहीं, रीवा की जल प्रदाय योजना के लिए रीवा नगर निगम और एचडीएफसी बैंक के बीच 50 करोड़ रुपये की वित्तीय व्यवस्था की गई।
इन परियोजनाओं का उद्देश्य धार्मिक पर्यटन से जुड़े क्षेत्र में सुविधाएं बेहतर करना और शहरों में पेयजल तथा सीवरेज सेवाओं को मजबूत करना है। इसके अलावा शहरी विकास में संस्थागत सहयोग, खाद्य अपशिष्ट के वैज्ञानिक प्रसंस्करण और उपचारित जल के औद्योगिक उपयोग को बढ़ावा देने के लिए अन्य समझौता ज्ञापनों का भी आदान-प्रदान किया गया।
तीन नई शहरी नीतियों के प्रारूप जारी
शहरी विकास को व्यवस्थित बनाने के लिए कॉन्क्लेव में तीन नीतियों और नियमों के प्रारूप जनपरामर्श के लिए प्रस्तुत किए गए। इनमें मध्यप्रदेश अर्बन अफोर्डेबल हाउसिंग एंड हैबिटेट पॉलिसी-2026, ट्रीटेड वेस्ट वॉटर रिसाइक्लिंग एंड रीयूज पॉलिसी-2026 और यूनिफाइड लैंड डेवलपमेंट एंड बिल्डिंग प्रमोशन रूल्स-2026 शामिल हैं।
किफायती आवास नीति का उद्देश्य शहरी क्षेत्रों में घरों की उपलब्धता बढ़ाना है। इसमें किराये के आवास, पहले से बसे क्षेत्रों के भीतर पुनर्विकास, निजी निवेश और सरकारी भूमि के बेहतर उपयोग जैसे विकल्पों को प्रोत्साहित करने की बात है।
उपचारित अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग से जुड़ी नीति में उद्योग, निर्माण, उद्यानिकी और अन्य गैर-पेयजल जरूरतों के लिए शोधित पानी के इस्तेमाल को बढ़ावा देने का प्रस्ताव है। इसके तहत वर्ष 2037 तक उपचारित जल के पुनः उपयोग का लक्ष्य 50 प्रतिशत निर्धारित किया गया है। इससे मीठे पानी के स्रोतों पर दबाव घटाने में मदद मिल सकती है।
तीसरे प्रारूप में भूमि विकास और भवन निर्माण के नियमों को सरल तथा एकरूप बनाने का प्रस्ताव है। इसमें मिश्रित भूमि उपयोग, सार्वजनिक परिवहन आधारित विकास, पुनर्सघनीकरण और हरित भवनों को बढ़ावा देने जैसे प्रावधान शामिल हैं। ये फिलहाल जनपरामर्श के लिए रखे गए प्रारूप हैं, इन्हें अंतिम लागू नीति या नियम नहीं माना जाना चाहिए।
भोपाल में भी बड़े निवेश की चर्चा
कॉन्क्लेव में भोपाल के लिए आवास, शिक्षा, प्रशासनिक परिसर और पर्यटन से जुड़ी परियोजनाओं को भी प्रदर्शित किया गया। इनमें भौंरी क्षेत्र में प्रस्तावित शिक्षा, ज्ञान एवं एआई सिटी, सेंट्रल विस्टा और राज्य राजधानी परिसर का आधुनिकीकरण तथा टॉर्टाइज सिटी में लगभग 4,600 आवासों के पुनर्विकास की योजना शामिल है।
भोपाल में 21,255 ईडब्ल्यूएस आवास इकाइयों की इन-सीटू पुनर्विकास परियोजना को भी निवेश संभावनाओं के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसके अतिरिक्त, मुख्यमंत्री ने डेला ग्रुप के संस्थापक जिमी मिस्त्री के साथ भोपाल में 220 एकड़ क्षेत्र में प्रस्तावित 2,250 करोड़ रुपये की डेला रेसकोर्स परियोजना पर चर्चा की। प्रस्तावित परियोजना में लक्जरी विला, ब्रांडेड आवास, पांच सितारा वन्यजीव रिसॉर्ट और घुड़सवारी तथा पोलो जैसी सुविधाओं की योजना बताई गई।
भोपाल के निकट रातापानी क्षेत्र में डेला रातापानी रिजर्व टाउनशिप विकसित करने की योजना का भी उल्लेख किया गया। इसे पर्यटन, स्वास्थ्य, वेलनेस और सतत विकास से जोड़ने की बात कही गई है। इन परियोजनाओं के वास्तविक स्वरूप और क्रियान्वयन की स्थिति आगे की योजना तथा आवश्यक स्वीकृतियों पर निर्भर करेगी।
उज्जैन में धार्मिक पर्यटन पर जोर
उज्जैन को धार्मिक पर्यटन के बड़े केंद्र के रूप में विकसित करने की योजनाएं भी कॉन्क्लेव में प्रमुखता से सामने आईं। मुख्यमंत्री ने कहा कि श्री महाकाल महालोक के विकास के बाद उज्जैन में धार्मिक पर्यटन का विस्तार हुआ है। उनके अनुसार, शहर में हर साल करीब 7 करोड़ लोगों का आगमन होता है।
सरकार का जोर मंदिरों और धार्मिक स्थलों तक पहुंच, परिवहन, आवास, व्यापार और अन्य नागरिक सुविधाओं को बेहतर बनाने पर है। कॉन्क्लेव में उज्जैन के 11 प्रमुख मंदिर परिसरों के विकास और मंदिर सर्किट को आधुनिक बनाने की परियोजना प्रदर्शित की गई। इसके लिए 643.39 करोड़ रुपये की ऋण व्यवस्था का समझौता भी हुआ है।
आगामी सिंहस्थ-2028 को देखते हुए उज्जैन की आधारभूत सुविधाओं का विकास और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। हालांकि, आयोजन की जरूरतों के साथ शहर की स्थायी नागरिक सुविधाओं, यातायात प्रबंधन और पर्यावरणीय संतुलन को भी ध्यान में रखना होगा।
जल और सौर ऊर्जा पर नई पहल
शहरी विकास की योजनाओं में ऊर्जा और जल प्रबंधन को भी स्थान दिया गया है। कॉन्क्लेव में सौर ऊर्जा से जुड़ी बैठक में 20 से अधिक निवेशकों ने हिस्सा लिया। चर्चा का एक प्रमुख विषय नगरीय निकायों में सौर ऊर्जा का उपयोग बढ़ाकर बिजली खर्च कम करना और वित्तीय संसाधन जुटाना रहा।
मध्यप्रदेश पावर जनरेटिंग कंपनी की ओर से बिरसिंहपुर में प्रस्तावित 200 मेगावाट क्षमता की फ्लोटिंग सोलर परियोजना और बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणाली का प्रस्तुतीकरण किया गया। इस परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 1,564 करोड़ रुपये बताई गई। योजना के अनुसार, इससे नगरीय निकायों को सौर ऊर्जा उपलब्ध कराने और शाम के समय दो घंटे तक बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने की दिशा में काम किया जाएगा।
इसके अलावा लगभग 200 नगरीय निकायों के लिए पूल्ड म्युनिसिपल बॉन्ड के माध्यम से वित्तीय संसाधन जुटाने पर भी विचार हुआ। यह व्यवस्था स्थानीय निकायों को विकास परियोजनाओं के लिए पूंजी जुटाने का एक विकल्प दे सकती है।
निवेश और रोजगार के बड़े दावे
मुख्यमंत्री ने कॉन्क्लेव में कहा कि प्रदेश में अब तक लगभग 12 लाख करोड़ रुपये के निवेश को धरातल पर उतारा जा चुका है। सरकार औद्योगिक कॉरिडोर, सड़क नेटवर्क, लॉजिस्टिक्स, पर्यटन, नवीकरणीय ऊर्जा, जल प्रबंधन और आधुनिक तकनीकी क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित कर रही है।
नगरीय विकास एवं आवास विभाग के अपर मुख्य सचिव संजय दुबे ने प्रदेश के 2047 तक 2 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य का उल्लेख किया। उनके अनुसार, मध्यप्रदेश में 5.6 लाख किलोमीटर से अधिक सड़क नेटवर्क, 44 राष्ट्रीय राजमार्ग, 22 रेलवे जंक्शन और 8 हवाई अड्डे हैं। जबलपुर-भोपाल-इंदौर औद्योगिक कॉरिडोर और इंदौर-पिथमपुर आर्थिक कॉरिडोर में एक-एक लाख करोड़ रुपये के निवेश का लक्ष्य भी बताया गया।
इन आंकड़ों और लक्ष्यों के बीच सबसे महत्वपूर्ण सवाल इनके समयबद्ध क्रियान्वयन का है। मेट्रोपॉलिटन क्षेत्र के विकास के लिए केवल निवेश प्रस्ताव पर्याप्त नहीं होंगे। रोजगार के अवसर स्थानीय युवाओं तक पहुंचें, आवास किफायती रहें, सार्वजनिक परिवहन मजबूत हो और जल तथा कचरा प्रबंधन की व्यवस्था बढ़ती आबादी के अनुरूप विकसित हो—ये सभी पहलू योजना की सफलता तय करेंगे।
शहरों के विकास की अगली चुनौती
अर्बन ग्रोथ कॉन्क्लेव 2.0 में सामने आया रोडमैप मध्यप्रदेश के तीन प्रमुख शहरों और मालवा-निमाड़ क्षेत्र के आर्थिक विस्तार की महत्वाकांक्षी तस्वीर पेश करता है। इंदौर को औद्योगिक और आर्थिक गतिविधियों का केंद्र, उज्जैन को धार्मिक पर्यटन तथा संबंधित सेवाओं का प्रमुख स्थल और भोपाल को प्रशासन, शिक्षा, आवास तथा तकनीकी निवेश के केंद्र के रूप में विकसित करने की योजनाएं रखी गई हैं।
लेकिन 2047 के लक्ष्यों को जमीन पर उतारने के लिए परियोजनाओं की वित्तीय व्यवस्था, भूमि उपयोग, पर्यावरणीय मंजूरियों, नागरिक सुविधाओं और स्थानीय भागीदारी के बीच संतुलन जरूरी होगा। फिलहाल कॉन्क्लेव में कई प्रस्ताव, वित्तीय समझौते और नीति प्रारूप सामने आए हैं। आने वाले चरणों में इनका क्रियान्वयन ही बताएगा कि यह विकास योजना शहरों के नागरिक जीवन और रोजगार के अवसरों में कितना वास्तविक बदलाव ला पाती है।
FAQ’s
1. इंदौर-उज्जैन-भोपाल मेट्रोपॉलिटन सिटी योजना का लक्ष्य क्या है?
राज्य सरकार ने वर्ष 2047 तक इस क्षेत्र में लगभग 20 लाख रोजगार के अवसर तैयार करने, 12 से 15 नई टाउनशिप विकसित करने और 25 से 30 हजार एकड़ भूमि पर नियोजित शहरी विकास का लक्ष्य रखा है। इसमें आवास, उद्योग, निवेश, परिवहन और नागरिक सुविधाओं को साथ लेकर चलने की योजना है।
2. इंदौर फ्यूचर सिटी कितने क्षेत्र में विकसित होगी?
मुख्यमंत्री के अनुसार, इंदौर फ्यूचर सिटी के लिए लगभग 5 हजार एकड़ क्षेत्र में विकास की योजना है। इसमें आवासीय सुविधाओं के साथ उद्योग और रोजगार आधारित गतिविधियों को शामिल करने की बात कही गई है। इसके विस्तृत क्रियान्वयन और समयसीमा से जुड़ी जानकारी उपलब्ध विवरण में नहीं दी गई है।
3. इंदौर आर्थिक क्षेत्र में कौन-कौन से जिले शामिल हैं?
इंदौर आर्थिक क्षेत्र की 2047 योजना में आठ जिले शामिल हैं—इंदौर, उज्जैन, धार, देवास, रतलाम, खरगोन, खंडवा और शाजापुर। इसका उद्देश्य इन जिलों की अर्थव्यवस्था को उद्योग, कृषि, पर्यटन, विनिर्माण और आधुनिक अधोसंरचना के जरिए एकीकृत रूप से आगे बढ़ाना है।
4. क्या तीनों शहरी नीतियां लागू हो चुकी हैं?
नहीं। अर्बन ग्रोथ कॉन्क्लेव में किफायती आवास नीति, उपचारित अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग की नीति और एकीकृत भूमि विकास एवं भवन प्रोत्साहन नियमों के प्रारूप जनपरामर्श के लिए प्रस्तुत किए गए हैं। इन्हें अंतिम रूप देने और लागू करने की प्रक्रिया के बारे में आगे की आधिकारिक जानकारी देखनी होगी।
5. शहरी परियोजनाओं के लिए कितनी वित्तीय व्यवस्था हुई?
तीन प्रमुख परियोजनाओं के लिए कुल 2,013.81 करोड़ रुपये की वित्तीय व्यवस्था की गई। इसमें उज्जैन मंदिर सर्किट के लिए 643.39 करोड़, इंदौर की जल और सीवरेज परियोजनाओं के लिए 1,320.42 करोड़ तथा रीवा जल प्रदाय योजना के लिए 50 करोड़ रुपये शामिल हैं।
6. उपचारित अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग का लक्ष्य क्या है?
मध्यप्रदेश ट्रीटेड वेस्ट वॉटर रिसाइक्लिंग एंड रीयूज पॉलिसी-2026 के प्रारूप में वर्ष 2037 तक उपचारित अपशिष्ट जल के पुनः उपयोग का लक्ष्य 50 प्रतिशत रखा गया है। इसका इस्तेमाल उद्योग, निर्माण, उद्यानिकी और अन्य गैर-पेयजल जरूरतों में बढ़ाने का प्रस्ताव है।





