मुख्य बातें
- सरकारी रिकॉर्ड में मध्य प्रदेश में बंधुआ मजदूरी के मामले शून्य बताए गए हैं, जबकि सात महीने के दौरान कई घटनाएं सामने आने का दावा किया गया है।
- रायसेन, रतलाम, दतिया और देवास के मामलों में मजदूरों की मुक्ति के बाद प्रमाणपत्र और पुनर्वास सहायता नहीं मिलने के आरोप हैं।
- मई 2026 में केंद्र सरकार ने बंधुआ मजदूरों की पहचान, मुक्ति और पुनर्वास के लिए संशोधित एसओपी जारी की थी।
- नई प्रक्रिया में 48 घंटे के भीतर रिलीज सर्टिफिकेट और एक सप्ताह में सहायता राशि देने का प्रावधान बताया गया है।

मध्य प्रदेश में बंधुआ मजदूरी को लेकर सरकारी आंकड़ों और जमीनी स्तर पर सामने आ रही घटनाओं के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। सरकारी रिकॉर्ड में प्रदेश में बंधुआ मजदूरी के मामले शून्य बताए जा रहे हैं, जबकि पिछले सात महीनों के दौरान अलग-अलग जिलों से मजदूरों को कर्ज, कम मजदूरी और कथित बंधक जैसी परिस्थितियों से मुक्त कराने के मामले सामने आए हैं। इन घटनाओं में सबसे गंभीर सवाल यह है कि मजदूरों को काम से छुड़ाने के बाद क्या उन्हें कानून के तहत बंधुआ मजदूर के रूप में मान्यता और पुनर्वास का लाभ मिल रहा है?
दैनिक भास्कर की 29 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, रायसेन, रतलाम, दतिया और देवास में सामने आए मामलों में मजदूरों की स्थिति और प्रशासनिक कार्रवाई को लेकर सवाल उठे हैं। कुछ मामलों में बकाया मजदूरी दिलाकर कार्रवाई पूरी कर दी गई, तो कहीं मुक्त कराए गए लोगों को रिलीज सर्टिफिकेट और पुनर्वास सहायता नहीं मिलने की बात कही गई है।
इसका सीधा असर उन मजदूरों पर पड़ सकता है, जिन्हें कथित शोषण से बाहर निकालने के बाद भी सरकारी सहायता और सुरक्षित जीवन की जरूरत है। बंधुआ मजदूरी की पहचान केवल किसी व्यक्ति को काम की जगह से छुड़ाने तक सीमित नहीं है। उसकी कानूनी स्थिति तय करना और पुनर्वास सुनिश्चित करना भी इस प्रक्रिया का अहम हिस्सा है।
सरकारी आंकड़ों और घटनाओं में अंतर
रिपोर्ट के मुताबिक, मध्य प्रदेश में सरकारी रिकॉर्ड बंधुआ मजदूरी के मामलों की संख्या शून्य दिखाता है। दूसरी ओर, सात महीने के भीतर कई जिलों में ऐसे मामले सामने आने का दावा किया गया है। रिपोर्ट की शुरुआती जानकारी में पांच मामलों का उल्लेख है, जबकि उसमें विस्तार से चार घटनाओं का विवरण दिया गया है। इसलिए पांचों मामलों की पूरी जानकारी उपलब्ध नहीं है।
यह अंतर केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि मजदूरों की पहचान और उन्हें मिलने वाली कानूनी सुरक्षा का भी है। यदि किसी मजदूर को कर्ज चुकाने के नाम पर लंबे समय तक काम करने के लिए मजबूर किया गया है, या उसे नाममात्र की मजदूरी देकर श्रम कराया जा रहा है, तो मामले की परिस्थितियों की गंभीरता से जांच जरूरी है।
रिपोर्ट में रायसेन के बाबई गांव के मनोज रावत का उदाहरण दिया गया है। उन्होंने कथित तौर पर करीब 15 साल पहले 18 हजार रुपये उधार लिए थे। आरोप है कि इसके बाद उनसे 15 साल तक हर महीने 3,500 रुपये मजदूरी कराई गई, लेकिन इसके बावजूद उन पर लगभग डेढ़ लाख रुपये का कर्ज बताया जाता रहा। शिकायत की जांच के बाद प्रशासन ने इसे बंधुआ मजदूरी के बजाय कम मजदूरी से जुड़ा मामला माना।
इस वर्गीकरण का महत्व इसलिए है क्योंकि किसी मामले को केवल कम मजदूरी का विवाद मानने और बंधुआ मजदूरी के रूप में पहचानने के कानूनी परिणाम अलग हो सकते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मनोज रावत को बंधुआ मजदूर के रूप में रिलीज सर्टिफिकेट और उससे जुड़ी सरकारी सहायता नहीं मिली।
चार जिलों के मामलों ने उठाए सवाल
रतलाम में मजदूरी देकर कार्रवाई पूरी
रतलाम की पूर्वा ग्रीन विंड मिल साइट पर बिहार के 10 मजदूरों को कथित तौर पर बंधक जैसी परिस्थितियों में पाया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों ने मजदूरों को 50,350 रुपये की बकाया मजदूरी दिलाई, लेकिन उन्हें रिलीज सर्टिफिकेट और तत्काल पुनर्वास सहायता नहीं दी गई।
यहां मुख्य सवाल यह है कि क्या बकाया मजदूरी का भुगतान ही पूरी कार्रवाई के लिए पर्याप्त था? यदि जांच में बंधुआ मजदूरी की पुष्टि होती है, तो मजदूरों की औपचारिक मुक्ति और पुनर्वास से जुड़ी प्रक्रिया भी पूरी होनी चाहिए।
दतिया में चार मजदूरों का मामला
दतिया जिले के लक्ष्मणपुरा में मानसिक रूप से अस्वस्थ चार मजदूरों से कथित तौर पर खेतों और घरों में बेगार कराई जा रही थी। रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें वहां से मुक्त कराकर अस्पताल भेजा गया।
हालांकि, इन मजदूरों को विशेष श्रेणी के पुनर्वास पैकेज और सुरक्षित आश्रय की सुविधा नहीं मिलने की बात सामने आई है। यह मामला उन लोगों के लिए पुनर्वास व्यवस्था की अहमियत दिखाता है, जो अपनी स्थिति के कारण शोषण का विरोध करने या मदद मांगने में कठिनाई महसूस कर सकते हैं।
रायसेन में मुक्ति के बाद मजदूर की मौत
रायसेन में फरवरी 2026 में 74 बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराने का मामला सामने आया था। रिपोर्ट के मुताबिक, इन मजदूरों में शामिल 26 वर्षीय प्रकाश आदिवासी की उसी ईंट भट्ठे पर करंट लगने से मौत हो गई, जहां वह काम करता था।
इस मामले में एक और महत्वपूर्ण तथ्य यह बताया गया है कि मुक्त कराए गए 74 मजदूरों में से केवल 10 को ही रिलीज सर्टिफिकेट मिला। उपलब्ध जानकारी से यह स्पष्ट नहीं होता कि बाकी मजदूरों को प्रमाणपत्र क्यों नहीं दिए गए या प्रकाश आदिवासी की मौत के मामले में अलग से क्या कार्रवाई हुई।
देवास में कर्ज और इलाज का गंभीर आरोप
देवास जिले का मामला मानवीय दृष्टि से बेहद गंभीर है। रिपोर्ट के अनुसार, रवि रघुवंशी को 70 हजार रुपये के कर्ज के बदले कथित तौर पर बंधक बनाकर रखा गया था। आरोप है कि मालिक ने उन्हें अस्पताल जाने से रोका।
इसी दौरान उनकी नवजात बेटी की आईसीयू में भर्ती रहने के बाद मौत हो गई। रिपोर्ट में बताया गया है कि बेटी की मृत्यु के चार दिन बाद रवि उसका शव लेने अस्पताल पहुंचे। इस घटना से जुड़े आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और प्रशासनिक जांच का विस्तृत विवरण उपलब्ध सामग्री में नहीं दिया गया है।
नई एसओपी में क्या बदला है?
केंद्र सरकार के श्रम मंत्रालय ने मई 2026 में बंधुआ मजदूरों की पहचान, मुक्ति और पुनर्वास से जुड़ी संशोधित मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी जारी की थी। इसके बाद मध्य प्रदेश के श्रमायुक्त कार्यालय ने 15 जुलाई 2026 को सभी कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को निर्देश दिए कि नई प्रक्रिया का सख्ती से पालन किया जाए।
रिपोर्ट में एसओपी के प्रावधानों के अनुसार, कर्ज के बदले किसी व्यक्ति से काम कराना या उससे नाममात्र की मजदूरी पर श्रम कराना बंधुआ मजदूरी की पहचान के दायरे में आ सकता है। ऐसे मामलों में केवल मजदूर को काम की जगह से छुड़ाना पर्याप्त नहीं माना गया है।
रिपोर्ट के मुताबिक, मजदूर को रेस्क्यू किए जाने के 48 घंटे के भीतर रिलीज सर्टिफिकेट जारी करना और एक सप्ताह के भीतर सहायता राशि उपलब्ध कराना अनिवार्य बताया गया है। इसके अलावा प्रत्येक जिले में 10 लाख रुपये का पुनर्वास कोष रखने का प्रावधान है। इस कोष से पात्र मुक्त मजदूर को तत्काल 30 हजार रुपये की अंतरिम सहायता दिए जाने की व्यवस्था बताई गई है।
इन प्रावधानों का उद्देश्य यह है कि शोषण से मुक्त होने के बाद मजदूर को शुरुआती जरूरतों के लिए तत्काल आर्थिक मदद मिल सके। इसके साथ ही उसे आगे के पुनर्वास और सुरक्षित जीवन की दिशा में सहायता मिले।
प्रमाणपत्र नहीं मिलने से क्या असर पड़ता है?
रिलीज सर्टिफिकेट केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज नहीं है। बंधुआ मजदूरी के मामले में यह व्यक्ति की मुक्ति और उसकी कानूनी स्थिति से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रमाण माना जाता है। इसके आधार पर संबंधित व्यक्ति को निर्धारित सरकारी पुनर्वास सहायता और अन्य लाभ प्राप्त करने की प्रक्रिया में मदद मिलती है।
यदि किसी मजदूर को मुक्त तो करा दिया जाए, लेकिन उसके मामले को बंधुआ मजदूरी के रूप में दर्ज न किया जाए, तो वह संबंधित राहत और पुनर्वास व्यवस्था से बाहर रह सकता है। रायसेन और रतलाम के मामलों में प्रमाणपत्र नहीं मिलने की जानकारी इसी चिंता को सामने लाती है।
इसलिए प्रशासन के सामने केवल रेस्क्यू की कार्रवाई पूरी करने की जिम्मेदारी नहीं है। मामले की सही पहचान, जरूरी दस्तावेज, आर्थिक सहायता और पुनर्वास की निगरानी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
जिलों में फंड और जांच की स्थिति पर सवाल
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कई जिलों में पुनर्वास कोष का उपयोग नहीं हो रहा है। साथ ही, रेस्क्यू के तीन महीने के भीतर समरी ट्रायल पूरा करने से जुड़ा रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं होने की बात कही गई है।
यदि इन प्रक्रियाओं का पालन नहीं हो रहा है, तो नई एसओपी के प्रावधानों का वास्तविक लाभ मजदूरों तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि कितने जिलों ने पुनर्वास कोष बनाया है, किन जिलों में कितनी राशि खर्च हुई और कितने मामलों में निर्धारित समयसीमा का उल्लंघन हुआ।
मध्य प्रदेश के श्रम विभाग के सचिव रघुराज एमआर ने रिपोर्ट के अनुसार, सामने आए मामलों का परीक्षण कराने की बात कही है। यह जांच महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि किन मामलों में बंधुआ मजदूरी के पर्याप्त संकेत थे और प्रशासनिक स्तर पर क्या कार्रवाई की जानी चाहिए थी।
सबसे बड़ा सवाल पहचान और पुनर्वास का
मध्य प्रदेश में बंधुआ मजदूरी के सरकारी आंकड़े शून्य होने और अलग-अलग जिलों से सामने आ रही घटनाओं के बीच अंतर को समझने के लिए पारदर्शी जांच और स्पष्ट आंकड़ों की जरूरत है। यह जानना जरूरी है कि कितने मजदूरों को मुक्त कराया गया, कितनों को कानूनी रूप से बंधुआ मजदूर माना गया, कितनों को रिलीज सर्टिफिकेट मिला और कितने लोगों तक पुनर्वास सहायता पहुंची।
किसी मजदूर को काम की जगह से बाहर निकाल देना राहत की शुरुआत हो सकती है, लेकिन उसकी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित किए बिना मुक्ति की प्रक्रिया अधूरी रह सकती है। नई एसओपी के प्रावधान तभी प्रभावी होंगे, जब जिला प्रशासन उनकी समयबद्ध निगरानी करे और हर शिकायत का निष्पक्ष परीक्षण हो।
स्रोत और सत्यापन संबंधी नोट
यह रिपोर्ट दैनिक भास्कर की 29 अक्टूबर 2026 की प्रकाशित खबर में उपलब्ध तथ्यों पर आधारित है। इस उत्तर में स्वतंत्र लाइव इंटरनेट सत्यापन उपलब्ध नहीं था। इसलिए घटनाओं, प्रशासनिक कार्रवाई और एसओपी के प्रावधानों को स्रोत रिपोर्ट के अनुसार प्रस्तुत किया गया है। संबंधित विभागों के मूल आदेश, जिला प्रशासन के रिकॉर्ड और मामलों की जांच रिपोर्ट उपलब्ध होने पर इन तथ्यों की अतिरिक्त पुष्टि की जानी चाहिए।
FAQ’s
1. मध्य प्रदेश में बंधुआ मजदूरी के सरकारी आंकड़े क्या बताते हैं?
दैनिक भास्कर की 29 अक्टूबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, सरकारी रिकॉर्ड में मध्य प्रदेश में बंधुआ मजदूरी के मामले शून्य बताए गए हैं। हालांकि, इसी रिपोर्ट में पिछले सात महीनों के दौरान अलग-अलग जिलों से कई घटनाएं सामने आने का उल्लेख है। सरकारी आंकड़ों और इन घटनाओं के बीच अंतर की आधिकारिक वजह उपलब्ध जानकारी में स्पष्ट नहीं है।
2. बंधुआ मजदूर को रिलीज सर्टिफिकेट क्यों दिया जाता है?
रिलीज सर्टिफिकेट किसी व्यक्ति की बंधुआ मजदूरी से मुक्ति की आधिकारिक पहचान से जुड़ा दस्तावेज है। इससे पात्र व्यक्ति को निर्धारित पुनर्वास सहायता और अन्य सरकारी लाभ प्राप्त करने की प्रक्रिया में मदद मिलती है। केवल काम की जगह से छुड़ा देना और कानूनी रूप से मुक्ति दर्ज करना एक जैसी कार्रवाई नहीं हैं।
3. नई एसओपी के तहत कितने समय में सहायता मिलनी चाहिए?
स्रोत रिपोर्ट के अनुसार, संशोधित एसओपी में रेस्क्यू के 48 घंटे के भीतर रिलीज सर्टिफिकेट और एक सप्ताह के भीतर सहायता राशि देने का प्रावधान बताया गया है। प्रत्येक जिले में 10 लाख रुपये का पुनर्वास कोष रखने और पात्र मजदूर को 30 हजार रुपये की अंतरिम सहायता देने की व्यवस्था का भी उल्लेख है।
4. क्या कम मजदूरी देना भी बंधुआ मजदूरी माना जा सकता है?
हर कम मजदूरी का मामला अपने आप बंधुआ मजदूरी नहीं बन जाता। लेकिन यदि किसी व्यक्ति से कर्ज के बदले काम कराया जा रहा हो, उसे नाममात्र भुगतान दिया जा रहा हो या परिस्थितियां उसकी स्वतंत्रता को सीमित कर रही हों, तो मामले की जांच जरूरी है। अंतिम कानूनी निष्कर्ष तथ्यों और लागू कानून के आधार पर तय होता है।
5. बंधुआ मजदूरी से मुक्त व्यक्ति को किस तरह की सहायता मिल सकती है?
स्रोत रिपोर्ट में अंतरिम आर्थिक सहायता, पुनर्वास पैकेज और सुरक्षित आश्रय जैसी व्यवस्थाओं का उल्लेख है। सहायता का स्वरूप व्यक्ति की पात्रता और मामले की श्रेणी पर निर्भर कर सकता है। मानसिक रूप से अस्वस्थ या विशेष परिस्थितियों में रहने वाले मजदूरों के लिए सुरक्षित आवास और देखभाल की जरूरत भी महत्वपूर्ण है।
6. मध्य प्रदेश में इन मामलों पर सरकार की क्या प्रतिक्रिया है?
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, श्रम विभाग के सचिव रघुराज एमआर ने सामने आए मामलों का परीक्षण कराने की बात कही है। उपलब्ध सामग्री में जांच के नतीजे, संबंधित जिलों से मिली विस्तृत रिपोर्ट या किसी निश्चित कार्रवाई की समयसीमा का उल्लेख नहीं है।




