दक्षिण एशिया और मध्य एशिया की भू-राजनीति इन दिनों एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच लगातार बढ़ते तनाव के बीच तालिबान सरकार ने अब भारत की तरफ दोस्ती का हाथ और अधिक मजबूत कर दिया है। यह वही अफगानिस्तान है जो दो दशक तक युद्ध, राजनीतिक अस्थिरता और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच उलझा रहा, लेकिन अब उसने अपने व्यापार, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संपर्कों में बड़ा बदलाव शुरू कर दिया है।
पाकिस्तान के साथ लगभग हर महीने किसी न किसी मुद्दे पर होने वाले सीमा विवादों और कूटनीतिक तकरार से परेशान अफगानिस्तान अब अपने आर्थिक भविष्य को पाकिस्तान के भरोसे छोड़ने को तैयार नहीं है। तालिबान सरकार ने साफ संकेत दे दिया है कि वह क्षेत्रीय राजनीति में अपनी निर्भरता बदलना चाहती है, और इस बदलाव का सबसे बड़ा लाभार्थी है — भारत।

भारत–अफगानिस्तान: पुराना रिश्ता, नया अध्याय
भारत और अफगानिस्तान का रिश्ता कोई नया नहीं है। प्राचीन काल में गंधार सभ्यता से लेकर आज तक दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक और आर्थिक संबंध रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह रिश्ता भले ही धीमा पड़ा था, परंतु अब इसमें तेजी से पुनर्जीवन देखने को मिल रहा है।
तालिबान सरकार के सत्ता में आने के बाद भारत ने अपनी भूमिका काफी सावधानी से निभाई, लेकिन हाल के महीनों में यह स्पष्ट हो गया है कि अफगानिस्तान पाकिस्तान से दूरी बनाकर भारत को एक भरोसेमंद और स्थिर साझेदार के रूप में देख रहा है।
व्यापारिक समीकरण का बदलना — पाकिस्तान का प्रभाव समाप्त?
अफगानिस्तान के लिए पाकिस्तान का महत्व हमेशा से उसकी सीमाओं और भूगोल के कारण रहा है। अफगानिस्तान समुद्री मार्ग से कटे होने के कारण लगभग हर व्यापार के लिए कराची बंदरगाह और पाकिस्तान की सीमा पर निर्भर रहता था। लेकिन यह रिश्ता लगातार झटके खाता रहा क्योंकि—
- पाकिस्तान मनमाने समय पर सीमा बंद कर देता था
- तोरखम और चमन बॉर्डर पर लगातार झड़पें जारी रहती थीं
- ट्रकों को रोका जाता था, कार्गो लटकता रहता था
- राजनीतिक विवाद व्यापार को प्रभावित करता था
पाकिस्तान की यही अप्रत्याशित नीति अब अफगानिस्तान को बोझ लगने लगी है।
तालिबान सरकार ने अब खुलकर भारत और ईरान को विकल्प के रूप में अपनाना शुरू कर दिया है।
कार्गो दरों में भारी कटौती — भारत से व्यापार के लिए बड़ा फैसला
अरियाना अफगान एयरलाइंस ने एक बेहद महत्वपूर्ण घोषणा की है।
पहले दिल्ली–काबुल कार्गो दर 2 डॉलर प्रति किलो थी।
अब इसे घटाकर 0.80 डॉलर (दिल्ली से काबुल) और 1 डॉलर (काबुल से दिल्ली) कर दिया गया है।
यह कटौती सिर्फ आर्थिक कदम नहीं है, बल्कि भारत को व्यापारिक प्राथमिकता देने का वैश्विक संदेश भी है।
इस निर्णय से अफगानिस्तान भारत को अपने प्रमुख निर्यात जैसे—
- सूखे मेवे
- पिस्ता
- केसर
- कालीन
- रत्न
- हर्बल उत्पाद
बहुत कम लागत और तेज समय में भेज सकेगा।
भारत ने फिर खोला दूतावास — कूटनीतिक भरोसे का संकेत
तालिबान शासन को लेकर भारत का रुख हमेशा सावधानी भरा रहा है, लेकिन भारत यह भी समझता है कि अफगानिस्तान का भविष्य एशिया की स्थिरता से जुड़ा है।
काबुल में भारतीय दूतावास का दोबारा खुलना एक बहुत बड़ा संकेत है कि—
- भारत अफगानिस्तान को लेकर अपनी कूटनीतिक रणनीति में सक्रिय होना चाहता है
- मानवीय सहायता एवं व्यापार फिर से गति पकड़ेगा
- दोनों देशों के बीच संपर्क बढ़ेगा
- पाकिस्तान को पूरी तरह किनारे किया जा रहा है
अफगानिस्तान का यह झुकाव भारत के लिए सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक रूप से भी अत्यंत लाभकारी है।
चाबहार बंदरगाह — पाकिस्तान पर निर्भरता खत्म करने का हथियार
भारत और ईरान के बीच चाबहार बंदरगाह वर्षों से चर्चा में रहा है। इसका मकसद था—
अफगानिस्तान को पाकिस्तान को बायपास करके समुद्री मार्ग देना।
अफगानिस्तान–ईरान व्यापार बढ़कर
1.626 अरब डॉलर
तक पहुंच गया है, जो पाकिस्तान के साथ उसके
1.108 अरब डॉलर
के मुकाबले कहीं अधिक है।
यह बदलाव सिर्फ व्यापार का आंकड़ा नहीं, बल्कि भू-राजनीति में पाकिस्तान के प्रभाव के खत्म होने का सबूत है।
तालिबान की रणनीति: “पाकिस्तान अब भरोसेमंद नहीं”
पाकिस्तान द्वारा सीमा बंद करने, अफगान नागरिकों को प्रताड़ित करने और व्यापारिक बाधाएं पैदा करने से तालिबान सरकार बेहद नाराज है।
काबुल की राजनीति में यह संदेश अब आम हो गया है कि—
पाकिस्तान बार-बार अफगानिस्तान पर दबाव बनाता है, जबकि भारत और ईरान उसे सम्मानपूर्वक समान साझेदार की तरह देखते हैं।
तालिबान नेतृत्व यह भी समझने लगा है कि—
- भारत वैश्विक स्तर पर स्थिर और जिम्मेदार साझेदार है
- पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय संगठनों में अलग-थलग पड़ रहा है
- भारत अफगानिस्तान के लिए खाद्य, मेडिकल और व्यापारिक सहयोग का बड़ा स्रोत बन सकता है
अफगानिस्तान के लिए भारत क्यों ज़रूरी?
1. भू-राजनीतिक समर्थन
भारत संयुक्त राष्ट्र सहित विश्वभर में प्रभावशाली है।
2. व्यापार का बड़ा बाजार
भारत अफगानिस्तान के उत्पादों के लिए सबसे बड़ा उपभोक्ता बाजार है।
3. चाबहार मार्ग का उपयोग
इससे पाकिस्तान पर निर्भरता समाप्त होती है।
4. मानवीय सहायता
भारत हमेशा से—
- गेहूं
- दवाइयाँ
- शिक्षा
- स्वास्थ्य
के माध्यम से मदद करता रहा है।
5. आर्थिक स्थिरता
अफगान उत्पाद भारत में अधिक मूल्य पर आसानी से बिकते हैं।
पाकिस्तान की चिंता — अफगानिस्तान हाथ से निकलता जा रहा है?
पाकिस्तानी मीडिया में इस मुद्दे को लेकर पहले ही चिंता जताई जा रही है।
टिप्पणियाँ कुछ ऐसी हैं—
- “अफगानिस्तान हमसे दूर जा रहा है…”
- “भारत–ईरान गठबंधन ने पाकिस्तान को किनारे कर दिया…”
- “आर्थिक नुकसान झेलना पड़ेगा…”
कारण है—
- सीमा बंद करना उल्टा पाकिस्तान पर भारी पड़ रहा है
- अफगान निर्यात अब भारत–ईरान की ओर बह रहा है
- कराची बंदरगाह का महत्व कम हो रहा है
- तालिबान का भरोसा खत्म हो रहा है
पाकिस्तान ने हमेशा अफगानिस्तान को “रणनीतिक गहराई” माना, लेकिन अब वही अफगानिस्तान भारत का निकट साझेदार बन रहा है।
निष्कर्ष — दक्षिण एशिया में नया भू-राजनीतिक समीकरण तैयार
अफगानिस्तान का भारत की ओर झुकाव और पाकिस्तान से दूरी एक बड़ी भू-राजनीतिक घटना है। आने वाले वर्षों में—
- भारत–अफगानिस्तान व्यापार तेजी से बढ़ेगा
- पाकिस्तान का प्रभाव लगभग खत्म हो जाएगा
- ईरान–अफगानिस्तान–भारत त्रिकोण व्यापार का नया केंद्र बन जाएगा
- दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा
यह सिर्फ दोस्ती नहीं, एक रणनीतिक साझेदारी की शुरुआत है, जो आने वाले दशक को परिभाषित करेगी।
