इंदौर के चंदन नगर क्षेत्र से सामने आया यह मामला एक बार फिर उस वास्तविकता को उजागर करता है, जो अक्सर घरेलू मामलों में गुम हो जाती है—कि अपराध हमेशा अज्ञात नहीं होते, कभी-कभी वह हमारे अपने ही घर की दीवारों के भीतर पनपते हैं। यह सिर्फ एक तीन साल के बच्चे के अपहरण का मामला नहीं, बल्कि पारिवारिक टूटन, रिश्तों की खाई, कानूनी अधिकारों और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी बेहद संवेदनशील जाँच है।

परिवार में उभरा विवाद—टूटे रिश्तों से जन्मी जटिल स्थिति
मामला उस समय शुरू हुआ जब बच्चे की माँ पति को छोड़कर अपने मायके चली गई थी। इसके बाद बच्चा अपने पिता और दादी के साथ रह रहा था।
इस स्थिति ने परिवार में भावनात्मक खाई को और गहरा कर दिया।
मामले से जुड़े मुख्य किरदार:
- बच्चा – 3 वर्ष
- पिता – शिकायतकर्ता
- दादी – घटना की प्रथम सूचना देने वाली
- माँ – लंबे समय से मायके में
- नाना – मुख्य आरोपी, जिन पर FIR दर्ज
अपहरण की घटना — दादी की शिकायत से शुरू हुई जाँच
घटना का क्रम पुलिस रिपोर्ट के अनुसार इस प्रकार है:
1. बच्चा अचानक गायब
शनिवार की शाम दादी ने देखा कि बच्चा घर से लापता है।
उन्होंने आसपास खोजबीन की, लेकिन बच्चा कहीं नहीं मिला।
2. किसी पर शक का कोई ठोस आधार नहीं
पहले चरण की खोज में परिवार को किसी पर तुरंत शक नहीं हुआ।
3. CCTV फुटेज की तलाश
लोगों ने आसपास के CCTV की जाँच शुरू की — यहीं से घटनाओं की दिशा बदलने लगी।
4. पिता को संदेह: कहीं नाना तो नहीं?
चूँकि मां मायके में रह रही थी, इसलिए प्रथम संदेह नाना पर गया।
पिता ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई।
5. FIR दर्ज
चंदन नगर पुलिस ने
✔ भारतीय दंड संहिता की धारा 363 (अपहरण)
के तहत मामला दर्ज कर लिया।
पुलिस की शुरुआती जाँच — क्या वास्तव में यह ‘अपहरण’ है?
क्राइम ब्रांच और चंदन नगर थाना पुलिस ने जाँच का पहला चरण शुरू किया। जाँच का फोकस इन बिंदुओं पर रहा:
✔ क्या बच्चे को जबरन ले जाया गया?
किसी भी प्रत्यक्षदर्शी के बयान अभी सामने नहीं आए।
✔ क्या बच्चे की माँ इस घटना में शामिल है?
ऐसे मामलों में अक्सर कस्टडी विवाद ही असली कारण बनता है। पहले यह जाँचना जरूरी है कि बच्चा
- माँ के साथ है
- या नाना अकेले ले गए
- या कोई और पक्ष भी शामिल है
✔ क्या नाना को कानूनी जानकारी थी की बच्चे की कस्टडी किसके पास है?
यदि माता-पिता कानूनी रूप से अलग नहीं हुए हैं, तो दोनों को बराबर अधिकार होते हैं — मगर बच्चे को बिना पिता की अनुमति ले जाना कानूनी रूप से अपराध बन सकता है।
✔ CCTV फुटेज और मोबाइल लोकेशन: केस का क्रिटिकल हिस्सा
फुटेज से यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि बच्चा किस दिशा में लिया गया।
साथ ही, पुलिस ने नाना का मोबाइल लोकेशन भी खंगाला है।
क्राइम इन्वेस्टिगेशन एंगल — पुलिस किन संभावनाओं पर काम कर रही है?
इस तरह के मामलों में पुलिस निम्नलिखित एंगल पर विचार करती है—
1. कस्टडी विवाद का एंगल
भारत में ऐसे 60% अपहरण मामलों में अपराधी कोई बाहरी नहीं बल्कि
रिश्तेदार ही होता है — वह भी कस्टडी के विवाद के चलते।
2. भावनात्मक आवेग
नाना, जिन्हें अपने नाती से लगाव हो, अचानक बच्चे को साथ ले गए हों।
3. माँ की संभावित भूमिका
क्या माँ ने बच्चे को अपने पास बुलवाया?
यदि हाँ, तो यह अपराध की प्रकृति बदल सकती है।
4. जान-बूझकर प्लांड अपहरण
यदि रिश्तों का झगड़ा गहरा है, तो यह भी संभावना है कि किसी ने जान-बूझकर बच्चे को छुपाया हो।
कानून क्या कहता है? – धारा 363 और पारिवारिक अपहरण
धारा 363 — अपहरण
सजा: 7 वर्ष तक की जेल
परिवार के सदस्य द्वारा बच्चे को ले जाना भी इस धारा के अंतर्गत आता है।
कस्टडी का कानून
यदि बच्चा पिता की कस्टडी में था, और नाना ने बिना अनुमति बच्चे को ले जाया— तो यह कानूनी रूप से अपहरण माना जाएगा।
सामाजिक विशेषज्ञों की राय
1. “यह पारिवारिक विघटन का परिणाम है”
काउंसलिंग विशेषज्ञ बताते हैं कि माँ के छोड़कर जाने के बाद रिश्तों में तनाव बढ़ा होगा।
2. “बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं”
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि बच्चा मानसिक रूप से असुरक्षित हो सकता है।
3. “कानूनी गाइडलाइंस की जानकारी की कमी”
अक्सर परिवार बिना कानूनी जानकारी के ऐसे कदम उठा लेते हैं, जो अपराध बन जाता है।
पुलिस अब आगे क्या करेगी?
- नाना की गिरफ्तारी या पूछताछ
- माँ से पूछताछ
- CCTV फुटेज का डिजिटल एनालिसिस
- मोबाइल लोकेशन ट्रैकिंग
- बच्चे की सुरक्षित बरामदगी
निष्कर्ष: रिश्तों, कानून और मासूमियत के बीच फँसी सच्चाई
यह मामला हमें बताता है कि अपराध सिर्फ नंबर नहीं होते — उनके पीछे टूटा हुआ परिवार, उलझे हुए रिश्ते और एक मासूम का भविष्य होता है। पुलिस की जाँच जारी है और उम्मीद यही है कि बच्चा सुरक्षित मिल जाए।
