भारत में धार्मिक चेतना और सामाजिक एकता की मिसाल बनने वाली घटनाओं में हाल ही में एक और ऐतिहासिक अध्याय जुड़ा है। बागेश्वर धाम सरकार के प्रमुख धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने अपनी सनातन हिंदू एकता पदयात्रा को दिल्ली से शुरू करके वृंदावन में पूरा किया। यह यात्रा केवल धार्मिक या आध्यात्मिक कार्यक्रम नहीं थी, बल्कि इसके माध्यम से उन्होंने हिंदू राष्ट्र, सनातन धर्म और सामाजिक एकता के संदेश को व्यापक रूप से फैलाने का काम किया।
पदयात्रा की शुरुआत दिल्ली से हुई और यह लगभग 10 दिन और 150 किलोमीटर लंबी रही। इस दौरान हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के विभिन्न हिस्सों में श्रद्धालुओं ने धीरेंद्र शास्त्री का समर्थन किया। हरियाणा और यूपी में जगह-जगह भक्तों और संत-साधुओं का हुजूम इस यात्रा को ऐतिहासिक बना गया।

वृंदावन में पदयात्रा का समापन और भक्तों की भावनाएँ
वृंदावन पहुंचते ही धीरेंद्र शास्त्री अत्यंत भावुक हो गए। ब्रज की पवित्र धरती पर पैर रखते ही उनकी आँखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। मंच पर उपस्थित संत और साधु श्रद्धालुओं के बीच खड़े होकर उन्होंने सनातन धर्म, हिंदू एकता और भारतीय संस्कृति पर गहरी बातें कीं। उनका कहना था कि सनातन धर्म का मूल उद्देश्य समाज में एकता, सद्भावना और नैतिक मूल्यों को बनाए रखना है।
मंच पर उन्होंने हिंदू राष्ट्र के महत्व पर जोर दिया और कहा कि एक मजबूत हिंदू राष्ट्र होने से भारत में न केवल सुरक्षा बढ़ेगी बल्कि आतंकवादी गतिविधियों पर भी रोक लगेगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदू राष्ट्र का मतलब किसी अन्य धर्म के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह देश की सुरक्षा और सांस्कृतिक अखंडता को सुनिश्चित करने का माध्यम है।
धीरेंद्र शास्त्री के पांच संकल्प
धीरेंद्र शास्त्री ने अपने संदेश में पाँच प्रमुख संकल्पों का उल्लेख किया, जो उनके अनुसार सनातन धर्म और हिंदू एकता के मूल आधार हैं। ये संकल्प हैं:
- धर्म का पालन और सम्मान: प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म और संस्कृति का सम्मान करना चाहिए।
- सामाजिक एकता: जाति, वर्ग या क्षेत्र के भेदभाव के बिना सभी हिंदुओं को एकजुट होना चाहिए।
- शिक्षा और जागरूकता: सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के महत्व को युवा पीढ़ी तक पहुँचाना।
- सकारात्मक दृष्टिकोण: हिंसा और नकारात्मकता से दूर रहते हुए समाज में सद्भाव और सहयोग बढ़ाना।
- राष्ट्रीय सुरक्षा और जागरूकता: धर्म और संस्कृति के संरक्षण के लिए देश की सुरक्षा और जागरूकता को बढ़ावा देना।
इन संकल्पों को धीरेंद्र शास्त्री ने न केवल शब्दों में बताया, बल्कि पदयात्रा के दौरान व्यवहार और कार्यक्रमों में भी इन्हें दर्शाया।
श्रद्धालुओं का उमड़ा हुजूम
पदयात्रा के दौरान श्रद्धालुओं की संख्या आश्चर्यजनक रूप से बढ़ी। दिल्ली से वृंदावन तक विभिन्न शहरों और गाँवों में लोग सड़कों पर उतरकर उनका स्वागत करते रहे। हरियाणा, उत्तर प्रदेश और दिल्ली के लोगों ने श्रद्धा और उत्साह के साथ धीरेंद्र शास्त्री का मार्गदर्शन किया। विशेष रूप से वृंदावन के मंच पर लाखों भक्तों ने उनके स्वागत में जुटकर हिंदू राष्ट्र और सनातन धर्म के समर्थन में अपनी आस्था व्यक्त की।
मध्य प्रदेश सीएम मोहन यादव का समर्थन
धीरेंद्र शास्त्री की पदयात्रा में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव भी शामिल हुए। उन्होंने दिल्ली-आगरा नेशनल हाईवे पर सड़कों पर बैठकर धीरेंद्र शास्त्री के साथ प्रसाद ग्रहण किया और पदयात्रा में शामिल होकर समर्थन का परिचय दिया। इस दृश्य ने भक्तों और मीडिया के लिए खास आकर्षण का केंद्र बना।
सुरक्षा और प्रधानमंत्री का समर्थन
धीरेंद्र शास्त्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हुए कहा कि दिल्ली आतंकी हमले के बाद पदयात्रा के लिए सुरक्षा का पूरा प्रबंध किया गया। पीएम मोदी की देखरेख और सुरक्षा के इंतजामों के कारण पदयात्रा में कोई बाधा नहीं आई और सभी श्रद्धालु सुरक्षित रूप से हिस्सा ले सके।
आतंकवाद और धार्मिक चेतावनी
वृंदावन में भाषण के दौरान धीरेंद्र शास्त्री ने आतंकवाद और सुरक्षा के मुद्दों पर भी तंज कसा। उन्होंने कहा कि वे किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन यह चिंता का विषय है कि कुछ पढ़े-लिखे लोग आतंकवाद में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने दिल्ली आतंकवादी हमले का उदाहरण देते हुए बताया कि देश की सुरक्षा के लिए सतर्क रहना कितना आवश्यक है।
हिंदू राष्ट्र का संदेश और देश की सुरक्षा
धीरेंद्र शास्त्री ने मंच पर स्पष्ट किया कि यदि भारत हिंदू राष्ट्र बनेगा, तो देश में न केवल आंतरिक हिंसा कम होगी बल्कि विदेशी और आतंकी हमलों से सुरक्षा सुनिश्चित होगी। उन्होंने अपने भाषण में हिंदू धर्म के ग्रंथों और परंपराओं की रक्षा की आवश्यकता को भी रेखांकित किया।
वृंदावन में भावनात्मक समापन
वृंदावन पहुँचते ही धीरेंद्र शास्त्री भावुक हो गए। मंच पर उपस्थित संतों, साधुओं और लाखों श्रद्धालुओं के बीच उन्होंने अपनी भावनाओं को साझा किया। पदयात्रा का यह अंतिम चरण विशेष रूप से मीडिया और भक्तों के लिए ऐतिहासिक बना, क्योंकि ब्रज की पवित्र भूमि पर हजारों लोगों ने एकजुट होकर हिंदू धर्म और सांस्कृतिक चेतना का समर्थन किया।
