दुनिया की राजनीति कभी स्थिर नहीं रहती। बदलते समीकरण, बदलते हित, बदलती प्राथमिकताएँ ही विश्व व्यवस्था को हर पल आकार देती हैं। 19 नवंबर 2025 को व्हाइट हाउस में जो दृश्य देखा गया, उसने इस सत्य को फिर साबित कर दिया। सात वर्षों बाद जब सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान—MBS—अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मिलने पहुंचे, तो यह सिर्फ एक औपचारिक यात्रा नहीं थी। यह मुलाकात इतिहास की नई दिशा तय करने का संकेत दे चुकी थी। सैन्य गार्ड ऑफ ऑनर, तोपों की सलामी और अमेरिकी लड़ाकू विमानों की ओवरफ्लाई—इन सबने यह स्पष्ट कर दिया कि यह दिन दोनों देशों के रिश्तों के लिए बेहद अहम होने वाला है।

इस यात्रा का सबसे बड़ा परिणाम दुनिया के सामने तब आया जब राष्ट्रपति ट्रंप ने पुष्टि की कि अमेरिका सऊदी अरब को अपनी अत्याधुनिक 5वीं पीढ़ी के F-35 लड़ाकू विमान बेचने की तैयारी कर चुका है। 48 F-35 जेट की यह डील न केवल तकनीकी स्तर पर बड़ी है, बल्कि इससे मध्य पूर्व का भू-राजनीतिक संतुलन बुनियादी रूप से बदलने वाला है। वर्षों से इजरायल अकेला देश था जिसे F-35 ऑपरेट करने की अनुमति मिली थी, लेकिन अब सऊदी अरब भी उसी क्लब का हिस्सा बनने की ओर बढ़ चुका है।
यह खबर आते ही न सिर्फ इजरायल में बल्कि भारत में भी सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच चिंता की लहर दौड़ गई है। इसका कारण सिर्फ सऊदी की सैन्य शक्ति में वृद्धि नहीं, बल्कि उसके पाकिस्तान के साथ किए गए उस रक्षा समझौते से जुड़ा है जिसमें किसी एक पर हमला दूसरे पर हमला माना जाएगा। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इन अत्याधुनिक हथियारों का अप्रत्यक्ष लाभ पाकिस्तान को मिल सकता है?
व्हाइट हाउस में हुए ऐतिहासिक पल
जब MBS व्हाइट हाउस पहुंचे, तो यह सिर्फ एक औपचारिक स्वागत नहीं था। यह स्वागत एक संदेश था—अमेरिका और सऊदी अरब अपने संबंधों को एक नई ऊँचाई पर ले जाने वाले हैं। साउथ लॉन पर अमेरिकी सैन्य दस्तों ने मार्च किया, तोपों की सलामी दी गई, और ऊपर अमेरिकी लड़ाकू विमानों ने फ्लाईओवर किया। यह दृश्य किसी साधारण मेहमान का स्वागत नहीं था, यह दुनिया को दिखाने का तरीका था कि अमेरिका सऊदी अरब को एक रणनीतिक साझेदार के रूप में कितना महत्व देता है।
ओवल ऑफिस में दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत में सबसे महत्वपूर्ण क्षण वह था जब ट्रंप ने आधिकारिक रूप से F-35 डील का ऐलान किया। पत्रकारों ने जब उनसे पूछा कि इजरायल की क्वालिटेटिव मिलिट्री एडवांटेज (QME) नीति के बावजूद अमेरिका सऊदी अरब को यह तकनीक क्यों दे रहा है? ट्रंप ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया—“इजरायल और सऊदी दोनों ही हमारे करीबी साझेदार हैं। दोनों को बेहतरीन तकनीक मिले, यही सही है।”
उनके इस बयान के बाद कमरे में मौजूद पत्रकार समझ गए कि यह फैसला सिर्फ सैन्य तकनीक का मामला नहीं, बल्कि एक बड़े रणनीतिक पुनर्गठन का हिस्सा है।
इजरायल की बेचैनी: एकाधिकार खत्म होने का डर
इजरायल लंबे समय से अमेरिका का सबसे भरोसेमंद साझेदार रहा है। मध्य पूर्व में उसकी सैन्य बढ़त को बनाए रखना अमेरिकी नीति का हिस्सा भी रहा है। F-35 का ‘एकमात्र ऑपरेटर’ होना सिर्फ शक्ति का प्रदर्शन नहीं बल्कि सुरक्षा की गारंटी भी माना जाता था। लेकिन अब यह विशेषाधिकार खत्म होने जा रहा है।
इजरायल की चिंता दो स्तंभों पर आधारित है—पहला, F-35 की तकनीकी क्षमता और स्टेल्थ विशेषताओं से मिलने वाला सामरिक लाभ, और दूसरा, सऊदी अरब के साथ वर्षों से चले आ रहे तनावपूर्ण रिश्ते। इजरायल को लगता है कि यदि सऊदी ने इतनी बड़ी तकनीक हासिल कर ली, तो भविष्य में किसी भी संघर्ष की स्थिति में शक्ति संतुलन उसके खिलाफ झुक सकता है। हालांकि ट्रंप ने कहा कि इजरायल इस डील से “बहुत खुश” है, लेकिन इजरायली मीडिया और सुरक्षा विशेषज्ञों की टोन कुछ और ही संकेत देती है।
भारत की चिंता क्यों बढ़ी?
भारत को इस डील से चिंता इसलिए नहीं कि सऊदी मजबूत हो रहा है। भारत-सऊदी रिश्ते पिछले वर्षों में काफी बेहतर हुए हैं। असली चिंता पाकिस्तान से जुड़े उस रक्षा समझौते से जुड़ी है जिसमें कहा गया है कि अगर किसी एक देश पर हमला होता है तो दूसरा उसकी रक्षा करेगा। इसका मतलब है कि सऊदी अरब की सैन्य ताकत अप्रत्यक्ष रूप से पाकिस्तान के लिए सुरक्षा छाता बन सकती है।
यदि भविष्य में सऊदी अरब के पास F-35 जैसे अत्याधुनिक स्टेल्थ जेट होंगे, तो पाकिस्तान इस सहयोग का इस्तेमाल सामरिक दबाव बनाने के लिए कर सकता है। भारत की सामरिक चिंताएँ इसी संभावना से बढ़ी हैं। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि अमेरिका इतनी आसानी से किसी भी देश को दी गई तकनीक को दूसरे देश के साथ साझा या उपयोग करने की अनुमति नहीं देगा, लेकिन भू-राजनीति में कुछ भी असंभव नहीं होता।
क्या F-35 पाकिस्तान पहुंच सकता है?
सबसे बड़ा सवाल इसे लेकर है। अमेरिका F-35 के निर्यात पर बेहद सख्त नियंत्रण रखता है। एफ-35 कार्यक्रम दुनिया के सबसे संवेदनशील और सुरक्षित हथियार प्रोजेक्ट्स में से एक है। अमेरिका किसी भी देश को इसे खरीदने की अनुमति देने से पहले कई स्तरों की सुरक्षा गारंटी लेता है—डेटा सुरक्षा, मेंटेनेंस सुपरविजन, पार्ट्स एक्सेस कंट्रोल, हथियारों का स्थान ट्रैकिंग सिस्टम, और ऑपरेशनल डॉक्ट्रिन आदि।
इसके बावजूद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सऊदी के हथियारों का अप्रत्यक्ष लाभ पाकिस्तान को मिल सकता है? विशेषज्ञों का एक बड़ा वर्ग मानता है कि ऐसा सीधे तौर पर संभव नहीं है। लेकिन अप्रत्यक्ष तकनीकी सहयोग या सैन्य अभ्यासों के माध्यम से कुछ लाभ पाकिस्तान जरूर हासिल कर सकता है। यही भारत की चिंता का मुख्य आधार भी है।
अमेरिका-सऊदी संबंधों का नया अध्याय
MBS की इस यात्रा ने दोनों देशों के आर्थिक और सामरिक संबंधों को भी नई दिशा दी है। मुलाकात में उन्होंने घोषणा की कि सऊदी अरब अमेरिका में अपने नियोजित निवेश को 600 अरब डॉलर से बढ़ाकर एक ट्रिलियन डॉलर कर देगा। यह सिर्फ निवेश नहीं बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सऊदी के दीर्घकालिक दांव की पुष्टि है।
कम तेल कीमतों के दौर में भी इतनी बड़ी राशि का निवेश करना दर्शाता है कि सऊदी अपनी अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता से बाहर निकालने की प्रक्रिया में कितनी गंभीरता से लगा है। सेमीकंडक्टर, ग्रीन एनर्जी, टेक्नोलॉजी और डिफेंस मैन्यूफैक्चरिंग इसके प्रमुख स्तंभ बन रहे हैं।
ट्रंप ने गर्व से कहा कि उनकी नीतियों से साल के अंत तक 21 ट्रिलियन डॉलर की निवेश प्रतिबद्धताएँ अमेरिका में आ जाएँगी।
मध्य पूर्व की राजनीति पर असर
यह डील अकेले सऊदी-अमेरिका तक सीमित नहीं है। यह मध्य पूर्व के पूरे समीकरण को हिला देगी। इजरायल की सैन्य बढ़त अब खतरे में है। ईरान पहले ही चीन और रूस के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है। तुर्की NATO का हिस्सा होते हुए भी स्वतंत्र सैन्य नीति चला रहा है। ऐसे में सऊदी का F-35 क्लब में प्रवेश सभी पड़ोसी देशों के लिए चिंता का कारण बन सकता है।
अगर भविष्य में सऊदी अरब और इजरायल के बीच रिश्तों का सामान्यीकरण होता है, तो इसका लाभ क्षेत्र में स्थिरता के रूप में भी दिख सकता है। लेकिन यदि किसी वजह से रिश्ते बिगड़ते हैं, तो यही डील तनाव का सबसे बड़ा कारण भी बन सकती है।
भारत की रणनीतिक तैयारी
भारत ने पिछले एक दशक में अपनी रक्षा क्षमताओं को तेजी से बढ़ाया है—Rafale, S-400, Tejas MK-1A और आने वाले AMCA प्रोजेक्ट ने भारत को मजबूत स्थिति दी है। लेकिन F-35 अभी भी दुनिया का सबसे एडवांस मल्टीरोल स्टेल्थ फाइटर है। पाकिस्तान यदि किसी तरीके से भविष्य में इस तकनीक के आसपास भी पहुँच जाता है, तो भारत को अपनी रणनीतिक स्थिति का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ेगा।
इसीलिए भारत इस डील को सिर्फ मध्य पूर्व की घटना नहीं बल्कि एक वैश्विक रणनीतिक संदेश के रूप में देख रहा है।
