भारत के कॉरपोरेट इतिहास में ऐसे कई मौके आए हैं, जब दिवालिया हो चुकी कंपनियों पर दिग्गजों के बीच रस्साकशी देखने को मिली है। लेकिन जयप्रकाश एसोसिएट्स (JAL) पर हुई यह जंग अलग थी—यह केवल बोली की ऊंचाई या पैसों का खेल नहीं था, बल्कि भरोसे, प्रीपेमेंट प्लानिंग और रणनीतिक दृष्टि की लड़ाई थी।
जेपी ग्रुप, जिसकी कभी देश में इन्फ्रास्ट्रक्चर की बादशाहत मानी जाती थी—सड़कों से लेकर स्टेडियम और बड़े पावर प्रोजेक्ट्स तक—वह आर्थिक संकटों से जूझते हुए दिवालिया प्रक्रिया में पहुंच चुका है। और इसी संकटग्रस्त कंपनी को खरीदने की होड़ में भारतीय बिज़नेस जगत के दो दिग्गज—गौतम अडानी और अनिल अग्रवाल—एक-दूसरे से टकराए।

इस प्रतिस्पर्धा का नतीजा चौंकाने वाला रहा—वेदांता की ₹17,000 करोड़ की बड़ी बोली को पीछे छोड़ते हुए छोटी बोली लगाने वाला अडानी ग्रुप जीत गया। क्यों? कैसे? क्रेडिटर्स ने क्या सोचा?और इसका भारतीय बिज़नेस पर क्या प्रभाव होगा?
इन्हीं सवालों का जवाब यह विस्तृत रिपोर्ट देती है।
जयप्रकाश एसोसिएट्स: कभी शिखर पर, आज संकट में
जेपी ग्रुप की स्थापना उद्योगपति जयप्रकाश गौड़ ने की थी। समय के साथ यह समूह देश के शीर्ष इन्फ्रास्ट्रक्चर खिलाड़ियों में शुमार हुआ।
कई पावर प्रोजेक्ट्स, बड़े हाईवे, स्टेडियम निर्माण, रियल एस्टेट प्रोजेक्ट, तथा 1000 हेक्टेयर में फैलाया गया ग्रेटर नोएडा का स्पोर्ट्स सिटी प्रोजेक्ट—यह सब इस कंपनी की ताकत का प्रमाण हैं।
लेकिन गलत निवेश, पावर सेक्टर के संकट, रियल एस्टेट मंदी और कर्ज का बढ़ता बोझ कंपनी को घुटनों पर ले आया।
2023 और 2024 में स्थिति इतनी बिगड़ी कि अंततः 2024 के जून में कंपनी के खिलाफ दिवालिया प्रोसिडिंग्स (Insolvency Proceedings) स्वीकार की गईं। कंपनी पर क्रेडिटर्स का कुल कर्ज ₹55,000 करोड़ था।
खरीदारी की जंग की शुरुआत
जैसे ही JAL दिवालिया प्रक्रिया में गई, भारत की कई बड़ी कंपनियों ने इसमें दिलचस्पी दिखाई। कारण था—जेपी ग्रुप की विविध संपत्तियां:
- सीमेंट प्लांट
- पावर जनरेशन यूनिट
- हॉस्पिटैलिटी व्यवसाय
- रियल एस्टेट प्रोजेक्ट
- इंजीनियरिंग डिवीज़न
- स्पोर्ट्स इन्फ्रास्ट्रक्चर
इन संपत्तियों का मूल्य भले घट चुका हो, लेकिन इसके पुनरुद्धार की संभावना विशाल थी।
इसलिए पाँच कंपनियां मैदान में उतरीं:
- अडानी एंटरप्राइजेज
- वेदांता ग्रुप (अनिल अग्रवाल)
- डालमिया भारत
- जिंदल पावर
- पीएनसी इन्फ्राटेक
लेकिन आखिरी राउंड में जंग दो कंपनियों के बीच रह गई—अडानी और वेदांता।
वेदांता की ₹17,000 करोड़ की बोली—फिर भी क्यों हारी?
ई-नीलामी में सबसे बड़ी बोली वेदांता ने लगाई थी—₹17,000 करोड़, जो अडानी से काफी अधिक थी। लेकिन इसके बावजूद क्रेडिटर्स का वोट सर्वसम्मति से अडानी के पक्ष में गया। क्यों?
➡️ 1. प्रीपेमेंट टर्म्स (Advance Payment Conditions)
सूत्रों के अनुसार,
अडानी एंटरप्राइजेज ने वेदांता की तुलना में बहुत बेहतर अग्रिम भुगतान (Upfront Payment) की पेशकश की थी।
क्रेडिटर्स का तर्क था—
कम बोली सही, पर ज्यादा तुरंत मिलने वाला पैसा बेहतर है।
➡️ 2. विश्वास और निष्पादन क्षमता
क्रेडिटर्स को लगता था कि:
- अडानी बड़े और जटिल प्रोजेक्ट्स को जल्दी पुनर्जीवित कर सकता है
- फाइनेंशियल क्षमता और ट्रैक रिकॉर्ड मजबूत है
- विवाद कम होंगे
- कंपनी तेजी से चालू हो जाएगी
➡️ 3. डालमिया भारत का हटना
शुरुआत में सबसे बड़ी बोली डालमिया भारत ने लगाई थी,
लेकिन उसकी बोली में कई शर्तें थीं जिसे क्रेडिटर्स ने स्वीकार नहीं किया।
इससे मैदान खुल गया और मुकाबला दो दिग्गजों में सिमट गया।
➡️ 4. NPV का खेल
हालकि अडानी की नेट प्रेजेंट वैल्यू (NPV) वेदांता से लगभग ₹500 करोड़ कम थी,
फिर भी तत्काल मिलने वाले पैसे ने क्रेडिटर्स का मन बदल दिया।
यह एक तरह से लंबी अवधि की योजना बनाम तुरंत कैश का संघर्ष था—और जीत कैश की हुई।
क्रेडिटर्स का विवादित ‘स्कोरिंग सिस्टम’
पिछले हफ्ते क्रेडिटर्स की कमेटी (CoC) ने बोली का मूल्यांकन करने के लिए एक ‘स्कोर शीट’ बनाई थी। इसमें अडानी एंटरप्राइजेज को सर्वाधिक अंक मिले—100 में से सबसे ऊंचा स्कोर। लेकिन कुछ क्रेडिटर्स ने इस मूल्यांकन प्रक्रिया पर सवाल उठाए:
- क्या स्कोरिंग पैरामीटर पारदर्शी थे?
- NPV कम होने के बावजूद अंक अधिक क्यों मिले?
- क्या अग्रिम भुगतान को अत्यधिक महत्व दिया गया?
आशंका है कि यह निर्णय कानूनी चुनौती का सामना कर सकता है।
NARCL: सबसे बड़ा कर्जदाता और निर्णायक भूमिका
नेशनल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड (NARCL) JAL का सबसे बड़ा क्रेडिटर है।
NARCL की सहमति का मतलब लगभग निर्णय तय हो जाना था।
और NARCL ने खुलकर अडानी को समर्थन दिया, क्योंकि:
- अग्रिम भुगतान तेज
- कर्ज वापसी का भरोसा अधिक
- कंपनी के पुनर्जीवन की रणनीति बेहतर
इससे अन्य छोटे क्रेडिटर्स भी उसी लाइन में खड़े हो गए।
प्रमोटर मनोज गौड़ की आखिरी कोशिश—18,000 करोड़ का प्रस्ताव
जेपी ग्रुप इस कंपनी को बचाने के लिए आखिरी दम तक लड़ा। ग्रुप के प्रमुख मनोज गौड़ ने:
- क्रेडिटर्स को ₹18,000 करोड़ का ‘सेटलमेंट ऑफर’ दिया
- दावा किया कि वे कंपनी को दिवालियापन से बाहर निकाल देंगे
लेकिन समस्या यह थी— मनोज गौड़ पर्याप्त वित्तीय सपोर्ट का प्रमाण पेश नहीं कर पाए। इस कारण क्रेडिटर्स ने उनके प्रस्ताव को खारिज कर दिया।
इस अधिग्रहण का प्रभाव: भारतीय बिजनेस पर क्या असर?
➡️ 1. अडानी ग्रुप का इन्फ्रास्ट्रक्चर साम्राज्य और बड़ा होगा
सीमेंट, पावर, हॉस्पिटैलिटी, स्पोर्ट्स इंफ्रा—JAL में ये सभी मौजूद हैं।
अडानी अपना वितरण बढ़ाने को तैयार है।
➡️ 2. वेदांता के लिए बड़ा झटका
अनिल अग्रवाल ने ऊंची बोली लगाई,
लेकिन प्रीपेमेंट पॉलिसी के कारण हार गए।
इससे भविष्य में बोली लगाने के तरीकों पर असर पड़ेगा।
➡️ 3. दिवालिया प्रक्रिया पर बड़ा संदेश
यह केस एक मिसाल बन सकता है—
सबसे बड़ी बोली हमेशा नहीं जीतती।
भरोसा, अग्रिम भुगतान, योजना—ये अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
निष्कर्ष: लड़ाई खत्म, लेकिन विवाद बाकी
हालाँकि क्रेडिटर्स ने सर्वसम्मति से अडानी को चुना है,
लेकिन कई विशेषज्ञ मानते हैं कि:
- बोली प्रक्रिया पर सवाल हैं
- अदालत में चुनौती दी जा सकती है
- वेदांता इस निर्णय के खिलाफ जा सकती है
लेकिन फिलहाल की सच्चाई यही है—
जेपी ग्रुप की यह दिग्गज कंपनी अडानी ग्रुप की झोली में गिरने को तैयार है।
और यह सौदा भारतीय कॉरपोरेट जगत में एक और ऐतिहासिक पल बन गया है।
