दुनिया के दो सबसे महत्वपूर्ण और शक्तिशाली एशियाई देशों—चीन और जापान—के बीच tension आज की बात नहीं है। इतिहास, राजनीति, भूगोल, युद्ध, व्यापार, समुद्री दावे और खासकर ताइवान के मुद्दे ने दशकों से इन दोनों देशों को एक ऐसे भावनात्मक और सामरिक संघर्ष में बांध रखा है, जिसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। लेकिन नवंबर 2025 की यह मुलाकात इसलिए खास थी क्योंकि पिछले कई महीनों से दोनों देशों के बीच बयानों और धमकियों का जो दौर चल रहा था, उसने हालात को युद्ध जैसे तनाव तक पहुँचा दिया था।
जापान के प्रधानमंत्री साने ताकाइची के विवादित बयान के बाद चीन ने जिस तीखेपन के साथ प्रतिक्रिया दी, उससे यह साफ हो गया था कि बीजिंग इस मामले को हल्का मानने को तैयार नहीं। इस माहौल में जब पहली बार दोनों देशों के शीर्ष अफसरों ने आमने-सामने बैठकर बातचीत की, तो पूरी दुनिया की निगाहें इस बैठक पर टिकी थीं।

बीजिंग में तनाव भरी सुबह — जब चीन और जापान आमने-सामने आए
मंगलवार की सुबह बीजिंग के विदेश मंत्रालय परिसर के आसपास असामान्य हलचल देखी गई। मीडिया कैमरों की चकाचौंध, सुरक्षा का सख्त घेरा, और भीतर बंद कमरे में शुरू होने वाली वह मुलाकात—सब कुछ इशारा कर रहा था कि इस बैठक का वक्त बेहद संवेदनशील है।
जापान ने अपने विशेष प्रतिनिधि के तौर पर विदेश मंत्रालय के एशिया और ओशिनिया ब्यूरो के महानिदेशक मासाकी कनाई को भेजा था। उनकी मुलाकात चीनी विदेश मंत्रालय के एशियाई मामलों के महानिदेशक लियू जिनसोंग से होनी थी। दोनों ही अधिकारी अपने-अपने देशों के कूटनीतिक दिमाग माने जाते हैं।
बैठक शुरू होते ही जो माहौल बना, वह किसी सामान्य कूटनीतिक मुलाकात जैसा बिल्कुल नहीं था। चेहरे गंभीर थे, संक्षिप्त अभिवादन था, तनाव दृश्य था और ताइवान का मुद्दा जैसे कमरे के बीचों-बीच रखा हुआ एक विस्फोटक उपकरण हो।
ताईवान—चीन के दिल का मुद्दा, जापान की रणनीति का केंद्र
चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है—अटूट, अभिन्न और गैर-समझौताकारी। जापान ताइवान को औपचारिक रूप से देश नहीं मानता, लेकिन उसका आर्थिक, सामरिक और रणनीतिक महत्व जापान के लिए बहुत बड़ा है। यही कारण है कि जब प्रधानमंत्री ताकाइची ने अपने सांसदों से कहा कि—
“यदि चीन ताइवान पर हमला करता है, तो जापान के अस्तित्व को खतरा होगा और वह इसका जवाब देगा।”
तो बीजिंग में इसे चेतावनी नहीं, युद्ध जैसी धमकी माना गया। चीन के लिए यह बयान सिर्फ शब्द नहीं था—यह उसके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप की तरह था।
चीनी विदेश मंत्रालय का गुस्सा खुलकर सामने आया
चीनी मंत्रालय की प्रवक्ता माओ निंग ने जिस तीखे स्वर में बयान दिया, उसने इस मुलाकात के पीछे का असली माहौल जगजाहिर कर दिया।
माओ निंग ने कहा कि चीन ने जापान को साफतौर पर बता दिया है कि—
- ताकाइची का बयान अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है
- यह चीन-जापान संबंधों की राजनीतिक नींव को कमजोर करता है
- यह एक-चीन सिद्धांत के खिलाफ है
- और यह बयान चीनी जनता के सम्मान और संवेदनाओं पर चोट करता है
चीन ने यह भी कहा कि जापान ताइवान मुद्दे पर “उकसाने वाली भूमिका” निभा रहा है।
जापान के प्रतिनिधि पर दबाव
बीजिंग के कमरे में मौजूद सूत्रों के अनुसार चीनी अधिकारी लगातार एक ही बात पर जोर देते रहे कि जापान को यह बयान वापस लेना चाहिए। चीन के स्वर में न सिर्फ कठोरता, बल्कि यह संदेश भी साफ था कि यदि जापान ने बयान वापस नहीं लिया, तो दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट और गहराएगी।
जापानी प्रतिनिधि कनाई ने बैठक में शांत और संयत रहते हुए कहा कि उनके प्रधानमंत्री ने सिर्फ “संभावित सुरक्षा खतरों” को देखते हुए बयान दिया था। लेकिन चीन इस स्पष्टीकरण को किसी भी रूप में मानने को तैयार नहीं दिखाई दिया।
क्या इस मीटिंग से तनाव कम हुआ?
सवाल यही है—क्या यह मुलाकात तनाव कम करने का रास्ता बना सकी?
संक्षिप्त जवाब है: नहीं।
मुलाकात ने सिर्फ इतना दिखाया कि दोनों देशों के बीच बातचीत का दरवाज़ा खुला है, लेकिन दोनों अभी अपनी-अपनी स्थिति पर अड़े हुए हैं।
चीन चाह रहा है कि जापान बयान वापस ले और सार्वजनिक माफी मांगे।
जापान इसके लिए तैयार नहीं है, क्योंकि ऐसा करने से वह क्षेत्रीय स्तर पर कमज़ोर दिखेगा।
एशिया की समुद्री राजनीति—ताइवान है केंद्र में
ताइवान जापान के सबसे पश्चिमी द्वीपों से सिर्फ 110 किलोमीटर दूर है। तेल और गैस के सप्लाई मार्ग इसी समुद्री क्षेत्र से गुजरते हैं।
यदि चीन ताइवान पर हमला करे—
जैसा कि पिछले महीनों में चीन ने युद्धाभ्यास करके संकेत भी दिया—
तो जापान की ऊर्जा सप्लाई पर सीधा असर होगा।
इस कारण जापान की सुरक्षा रणनीति में ताइवान की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।
इसी वजह से ताकाइची ने यह विवादित बयान दिया था।
चीनी जनता आक्रोशित—बयान को राष्ट्रीय अपमान माना गया
माओ निंग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि चीनी लोग इस बयान से बेहद आहत हैं। चीन में सोशल मीडिया पर जापान के खिलाफ तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं।
हैशटैग चल पड़े—
“ताइवान चीन का है”,
“जापान उकसा रहा है”,
“चीन जवाब देगा”।
ये भावनाएँ चीन के कूटनीतिक तेवर को और कड़ा कर देती हैं।
आगे क्या?—दुनिया के लिए सबसे बड़ा सवाल
क्या चीन-जापान एक नए संघर्ष की ओर बढ़ रहे हैं?
या यह सिर्फ शब्दों की जंग है?
विशेषज्ञों का मानना है—
- इस बैठक ने तनाव कम नहीं किया
- दोनों ने अपनी-अपनी मांगों को खुलकर रखा
- संदेह बना हुआ है कि आने वाले महीनों में टकराव बढ़ सकता है
- समुद्री क्षेत्रों में नौसैनिक गतिविधियाँ बढ़ने की आशंका है
- अमेरिका भी इस समीकरण में शामिल होगा, जिससे मामला और पेचीदा बनेगा
यह स्थिति सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं—यह पूरे एशिया की स्थिरता का सवाल है।
