20 नवंबर 2025 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसा फैसला सुनाया, जिसने न सिर्फ संवैधानिक विमर्श में नई बहस को जन्म दिया, बल्कि राष्ट्रपति, राज्यपाल और न्यायपालिका की शक्तियों के संतुलन को लेकर वर्षों से चल रही अनिश्चितता को भी निर्णायक रूप से प्रभावित किया। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से 14 महत्वपूर्ण प्रश्नों पर सलाह मांगी थी—ये प्रश्न राज्यपालों और राष्ट्रपति द्वारा विधेयकों पर हस्ताक्षर करने या वापस भेजने के संबंध में थे।
यह रेफरेंस इसलिए भी ऐतिहासिक था क्योंकि यह सीधे-सीधे भारत की संघीय संरचना, विधायी प्रक्रिया और संवैधानिक प्रमुखों के अधिकारों को प्रभावित करता था। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट की दो-जजों की बेंच ने तमिलनाडु मामले में समय सीमा तय करने वाला महत्वपूर्ण फैसला दिया था, जिसमें कहा गया था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति को बिलों पर निर्णय लेने के लिए निर्धारित समय सीमा में ही कार्य करना होगा। वही फैसला अब पांच-जजों की संविधान पीठ ने असंवैधानिक बताया है।

राष्ट्रपति ने क्यों मांगी थी राय?
पिछले एक वर्ष में कई राज्यों—विशेषकर दक्षिण भारत के—में ऐसे अनेक मामले सामने आए, जहाँ राज्यपालों ने विधानसभा से पारित बिलों को लंबी अवधि तक रोककर रखा। इससे राज्य सरकारों और राज्यपालों के बीच टकराव की स्थिति बनी। कई बार राज्य सरकारों ने आरोप लगाया कि शासन संचालन में बाधा डालने के लिए बिलों पर जानबूझकर देरी की जा रही है।
जब सुप्रीम कोर्ट की दो-जजों की बेंच ने “बिना हस्ताक्षर किए बिलों को स्वीकृत माना” जाने का निर्देश दिया और राष्ट्रपति व राज्यपाल दोनों के लिए समय सीमा निर्धारित कर दी, तो इस फैसले को राष्ट्रपति ने संवैधानिक सीमाओं से बाहर माना। इसी संदर्भ में राष्ट्रपति ने संविधान की धारा 143 के तहत सुप्रीम कोर्ट से 14 प्रश्नों पर आधिकारिक राय मांगी।
संविधान पीठ का गठन और सुनवाई
मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. गवई की अध्यक्षता में पाँच-जजों की संविधान पीठ बनाई गई। इसमें शामिल थे—
- सीजेआई बी.आर. गवई
- जस्टिस सूर्य कांत (अगले चीफ जस्टिस)
- जस्टिस विक्रम नाथ
- जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा
- जस्टिस एस. चांदूरकर
सुनवाई दस दिनों तक चली, जिसमें केंद्र सरकार, कई विपक्ष शासित राज्यों और वरिष्ठ वकीलों ने अपने तर्क रखे।
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न – क्या समय सीमा तय की जा सकती है?
सुनवाई के दौरान सबसे बड़ा सवाल यह था कि क्या न्यायपालिका, राष्ट्रपति और राज्यपाल जैसे संवैधानिक पदों पर ‘समय सीमा’ लगाने का अधिकार रखती है?
दो समस्या-स्थितियाँ बार-बार सामने आईं—
1️⃣ राज्यपाल द्वारा बिल अनिश्चित समय तक रोककर रखना
2️⃣ राष्ट्रपति द्वारा राज्यों से आए बिलों पर लंबा इंतज़ार
दोनों स्थितियाँ लोकतांत्रिक शासन प्रणाली को प्रभावित करती हैं। लेकिन क्या अदालत हस्तक्षेप कर सकती है? संविधान पीठ ने इस प्रश्न का उत्तर दृढ़ता से दिया—
सुप्रीम कोर्ट का फैसला: समय सीमा तय करना असंवैधानिक
संविधान पीठ ने स्पष्ट कहा कि—
न्यायालय राष्ट्रपति या राज्यपाल के लिए विधेयकों पर निर्णय लेने की समय सीमा तय नहीं कर सकता। ऐसा करना संवैधानिक ढांचे के खिलाफ होगा।
इस प्रकार तमिलनाडु मामले में दो-जजों की बेंच द्वारा समय सीमा तय करने वाला फैसला असंवैधानिक घोषित कर दिया गया।
विवेकाधिकार सीमित नहीं किया जा सकता
संविधान पीठ ने कहा—
- राज्यपाल के पास यह अधिकार है कि वह बिल को
- स्वीकृत करें
- अस्वीकृत करें
- टिप्पणी के साथ वापस भेजें
- या राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए सुरक्षित रखें
- इस संवैधानिक विवेक को किसी समय सीमा से सीमित नहीं किया जा सकता।
लेकिन राज्यपाल अनिश्चितकाल तक बिल रोक नहीं सकते
यहाँ सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण संतुलन दिखाया।
उन्होंने कहा—
राज्यपाल अनिश्चितकाल तक बिल रोककर नहीं रख सकते। यह संविधान के सहकारी संघवाद के सिद्धांत के खिलाफ है।
साथ ही यह भी कहा गया कि राज्यपाल को obstructionist (अवरोधक) भूमिका नहीं निभानी चाहिए और सदन के साथ संवाद बनाए रखना चाहिए।
क्या अनुच्छेद 361 न्यायिक समीक्षा रोक देता है?
कई लोग मानते हैं कि अनुच्छेद 361 राष्ट्रपति और राज्यपाल को न्यायिक कार्यवाही से मुक्त कर देता है। लेकिन अदालत ने स्पष्ट किया—
- उनके कार्यों की मंशा या निज़ी जिम्मेदारी की समीक्षा नहीं हो सकती
- लेकिन उनके संवैधानिक कर्तव्यों से संबंधित कार्रवाइयाँ न्यायिक समीक्षा के दायरे में आती हैं
केंद्र और विपक्ष शासित राज्यों के तर्क
केंद्र का तर्क
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा—
- न्यायपालिका समय सीमा निर्धारित नहीं कर सकती
- संविधान में संशोधन करना संसद का काम है
- अदालत द्वारा समय सीमा तय करना “समानांतर शासन” जैसा होगा
विपक्ष शासित राज्यों का तर्क
सीनियर अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा—
- राज्यपाल जानबूझकर बिल रोककर चुनी सरकार की योजनाओं को बाधित करते हैं
- राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए समय सीमा तय होना चाहिए
- लेकिन दो-जजों की बेंच द्वारा बिलों को स्वीकृत माना जाना गलत है
क्यों माना गया तमिलनाडु वाला आदेश असंवैधानिक?
दो-जजों की बेंच ने कहा था—
- बिना स्वीकृति के बिल स्वतः पास मान लिए जाएँ
- राष्ट्रपति और राज्यपाल समय सीमा में निर्णय लें
संविधान पीठ ने इसे असंवैधानिक कहा क्योंकि—
- अदालत संविधान में नई व्यवस्था नहीं जोड़ सकती
- विधायी प्रक्रिया बदलना संसद का अधिकार है
- यह संवैधानिक संतुलन के विरुद्ध है
इस निर्णय के दूरगामी प्रभाव
यह फैसला आने वाले वर्षों की राजनीति, प्रशासन और विधायी प्रक्रिया पर कई तरह से असर डालेगा—
1️⃣ राज्यपाल द्वारा राजनीतिक दबाव के आरोप कम होंगे
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि राज्यपाल संवाद करें, अवरोध न पैदा करें।
2️⃣ राज्यों और केंद्र के बीच टकराव घटेगा
कई राज्यों में महीनों तक बिल अटके रहते थे, जिससे टकराव बढ़ता था।
3️⃣ न्यायपालिका ने अपनी सीमाएँ रेखांकित कीं
अदालत ने माना कि वह संविधान के ऊपर नहीं है, वह केवल उसका व्याख्यान करती है।
4️⃣ राष्ट्रपति और राज्यपाल की भूमिका स्पष्ट
अब यह स्पष्ट है कि वे न तो अनंत देरी कर सकते हैं और न उन्हें अदालत किसी समय सीमा में बाँध सकती है।
इस मामले से लोकतंत्र ने क्या सीखा?
यह फैसला तीन महत्वपूर्ण बातों को मजबूत करता है—
1️⃣ संविधान सर्वोपरि है—न संसद, न न्यायपालिका, न कार्यपालिका उससे ऊपर है।
2️⃣ सहकारी संघवाद—राज्यपाल और राज्य सरकार के संबंध संतुलित रहने चाहिए।
3️⃣ न्यायपालिका की मर्यादा—अदालतें संविधान के भीतर रहकर ही काम करेंगी।
