इंदौर — मध्यप्रदेश के सबसे समृद्ध और स्मार्ट सिटी की पहचान रखने वाले इंदौर में एक ऐसा सच सामने आया है, जिसने सामाजिक न्याय और सरकारी जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गरीब और ज़रूरतमंदों के लिए चलाई जा रही सरकारी मुफ़्त राशन योजना अब धनी लोगों की लूट का मैदान बनती जा रही है।

जिले में 25,356 अपात्र लोगों की पहचान हुई है, जिन्होंने पिछले तीन वर्षों में ₹57 करोड़ 60 लाख से अधिक का राशन सरकारी योजनाओं से उठा लिया। यह सिर्फ एक धोखाधड़ी नहीं — बल्कि गरीबों के मूल अधिकारों और जीवन की आवश्यकता की खुली चोरी है।
यह कैसी विडंबना?
जो लोग—
✔ लाखों का जीएसटी रिटर्न भरते हैं
✔ शहर में मकान, दुकान, कार और व्यवसाय के मालिक हैं
✔ बैंक खातों में उच्च ट्रांज़ैक्शन है
✔ आयकर रिटर्न में मोटी आय दिखाते हैं
वे भी गरीबी रेखा से नीचे (BPL) कार्ड बनवाकर महीने-दर-महीने मुफ्त राशन ले रहे हैं। इनके कारण उन हजारों गरीबों के पेट पर ठोकर लगी है, जो रोजाना की रोटी के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
जाँच कैसे शुरू हुई?
इंदौर जिला प्रशासन ने स्मार्ट ई-केवाईसी और डेटाबेस क्रॉस-लिंकिंग के जरिए विभिन्न सरकारी रिकॉर्ड खंगाले:
- जीएसटी विभाग
- नगर निगम संपत्ति रेकॉर्ड
- परिवहन विभाग से वाहन विवरण
- बैंकिंग ट्रांजैक्शन
- बिजली मीटर उपभोग
- आयकर विभाग के आंकड़े
इन सबने मिलकर दिखाया कि सिस्टम में बड़ा छेद है, जिसका सवाल जानकर फायदा उठाया गया।
प्रशासन का दावा: “शून्य सहनशीलता”
खाद्य विभाग द्वारा जारी आंकड़ों से पता चला कि—
| श्रेणी | संख्या | तीन साल का उठाया राशन मूल्य |
|---|---|---|
| मकान और बहुमंज़िला इमारत वाले | 10,812 | ₹18 करोड़+ |
| जीएसटी रिटर्न ≥ ₹25 लाख वाले | 5,203 | ₹21 करोड़+ |
| कार/लक्जरी वाहन मालिक | 7,141 | ₹12 करोड़+ |
| सरकारी कर्मचारी/पेंशनर्स | 2,200 | ₹6 करोड़+ |
इन सभी ने गरीब का हक डकार लिया।
एक गरीब की पीड़ा: “राशन खत्म हो गया, कहने पर बोला—सिस्टम में नाम नहीं…”
महू से 48 वर्षीय मजदूर रामकिशन बताते हैं—
“हमारे घर में तीन दिन तक चूल्हा नहीं जला। दुकान पर गया तो बोला आपका नाम लिस्ट में नहीं है। इतना बड़ा सिस्टम है, पर गरीब की कोई सुनवाई नहीं।”
जनप्रतिनिधियों की प्रतिक्रिया
विपक्ष का आरोप
यह सीधे-सीधे “प्रशासनिक मिलीभगत” और “सिस्टम की नाकामी” का परिणाम है।
सत्ता पक्ष का तर्क
“हमने घोटाले पर कार्रवाई शुरू की है; पुराने सरकारों की त्रुटियाँ उजागर हो रही हैं।”
क्या वसूली होगी?
जिला प्रशासन ने:
✔ अपात्र कार्ड धारकों की सूची अंतिम चरण में
✔ राशन कार्ड तुरंत निलंबित
✔ अवैध रूप से लिया राशन वसूलने की तैयारी
साथ ही, फेयर प्राइस शॉप्स (पीडीएस दुकानदारों) की भूमिका भी जांच के दायरे में है।
विशेषज्ञों की राय
आर्थिक विशेषज्ञ कहते हैं—
- सिस्टम बिना अपडेट किए मुफ्त राशन अनिश्चितकाल तक नहीं चल सकता
- पात्रता हर 2–3 वर्ष में रीवैलिडेट हो
- डिजिटल सत्यापन के साथ जियो-टैग्ड कार्डिंग लागू हो
तभी सही लाभार्थी तक योजना पहुँचेगी।
इंदौर में क्यों बढ़ा यह दुरुपयोग?
इंदौर आर्थिक और शहरी समृद्धि का केंद्र है — यहाँ:
- व्यापारिक गतिविधियाँ विशाल
- कर चोरी के अवसर अधिक
- “गरीब दिखने” की चालाकी आम
कई मामलों में:
जिनके बच्चों ने विदेशों में MBBS कर ली —
उनसे भी गरीबी दिखाने के लिए गरीबी कार्ड बरकरार!
सिस्टम की असली खामी
“गरीब” किसे कहा जाए? इसका जवाब भारत में हमेशा विवादित रहा है। कई लोग कागज़ों पर गरीब और जिंदगी में अमीर बने बैठे हैं।
प्रशासनिक स्रोत के अनुसार—
“हमें ऐसे मामले मिले जहाँ व्यक्ति के पास
3 दुकानें, कार, महंगी बाइक और फ्लैट —
फिर भी कार्ड BPL का।”
अब आगे क्या?
जिला प्रशासन:
➤ 30 दिनों में वसूली की प्रक्रिया
➤ दोषी दुकानदारों पर FIR
➤ पात्रता सत्यापन में AI आधारित सिस्टम लागू
सूत्रों का कहना है—
यह जाँच इंदौर तक सीमित नहीं
पूरे मध्यप्रदेश —
फिर पूरे देश में विस्तार होगा।
असल सवाल
✔ क्या सिस्टम दोषी?
✔ या वह मानसिकता — जो कहती है…
“फ्री है? तो ले लो!”
यह सिर्फ घोटाला नहीं — एक सामाजिक अपराध
गरीबों का राशन छीनना
उनकी थाली से निवाला छीनना
उनका भविष्य छीनना है
एक मजदूर परिवार के लिए
मुफ़्त राशन = जीवन-निर्वाह का आधार
और किसी अमीर का लिए
लूट का अवसर!
✔ यह अपराध सिर्फ कानून के खिलाफ नहीं
❌ मानवता के खिलाफ है।
निष्कर्ष:
इंदौर की यह सच्चाई पूरे देश के लिए चेतावनी है। जब तक—
- पात्रता की ईमानदार पहचान
- कड़े दंड
- और जागरूक समाज
नहीं बनता… तब तक गरीबों पर सबसे बड़ा डाका — गरीब बनकर ही लोग डालते रहेंगे।
