फिल्म इंडस्ट्री में कपूर परिवार का नाम केवल एक खानदान नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा की धड़कन माना जाता है। इस परिवार का इतिहास केवल फिल्मों के सिल्वर स्क्रीन पर ही नहीं, बल्कि उनकी विरासत, घरों और उन दीवारों पर भी दर्ज है जिनमें सपने पनपे, रिश्ते खिले और यादें बसीं।
ऐसा ही एक घर था—देवनार कॉटेज—जहाँ राज कपूर जी की आत्मा बसती थी, जहाँ उनके बच्चों का बचपन गुज़रा, जहाँ हंसी की गूंज और रियल सिनेमा का जन्म हुआ। लेकिन समय ने करवट बदली और वह घर, जो कभी प्रेम और परंपरा का केंद्र था, अब किसी और का हो चुका है।
100 करोड़ रुपये में बिक चुका है वह पुश्तैनी बंगला जिसे कपूर परिवार अपना दिल मानता था।

पुश्तैनी घर—जहाँ सिर्फ ईंटें नहीं, भावनाएँ रहती हैं
कोई भी घर जब विरासत बनता है, तब उस घर में रहने वाले लोग केवल दीवारों के साथ नहीं, बल्कि अपनी स्मृतियों, अपनी परंपराओं और अपने अतीत के साथ जुड़ जाते हैं। कपूर परिवार के लिए देवनार कॉटेज:
- बचपन की हंसी-ठिठोली का स्थान
- राज कपूर के रचनात्मक सपनों का जन्मस्थल
- तीन पीढ़ियों की धड़कन
लेकिन कहते हैं— समय के साथ कुछ निर्णय ऐसे लेने पड़ते हैं जो दिल तोड़ देते हैं पर मजबूरी बन जाते हैं।
राज कपूर की पत्नी कृष्णा कपूर का संदेश—“दीवारों से मत चिपको”
रीमा जैन ने एक शो में खुलासा किया: उनकी मां कृष्णा कपूर ने हमेशा कहा था—
“मेरे जाने के बाद इन ईंटों से ज्यादा न चिपकना, क्योंकि घर बहुत बड़ा होगा, संभालना मुश्किल होगा।”
यही बात आगे चलकर हकीकत बनी। समय के साथ—
- बड़े परिवार का बंटवारा
- सदस्यों की जिम्मेदारियाँ
- तेजी से बढ़ता रखरखाव खर्च
इन सबने उस घर को बोझ बना दिया।
2017 की आग—RK स्टूडियो की यादें राख में बदल गईं
सितंबर 2017… एक भयावह तारीख जिसे कपूर परिवार कभी भूल नहीं सकता। आरके स्टूडियो में आग लगने से—
- ‘मेरा नाम जोकर’ का मास्क
- ‘आवारा’ का प्रसिद्ध पियानो
- फिल्मी इतिहास से जुड़ी अनगिनत चीज़ें
सब नष्ट हो गईं।
स्टूडियो वैसे भी घाटे में चल रहा था। नई तकनीक से पुनर्निर्माण करना—वित्तीय रूप से असंभव लग रहा था। उन विरासतों को बचाने की लड़ाई भी हारनी पड़ी।
कपूर परिवार की पीढ़ियों का संघर्ष—भावनाओं से ज्यादा भारी था खर्च
कहा जाता है— “जितनी बड़ी विरासत, उतनी बड़ी जिम्मेदारी।” कपूर परिवार का इतिहास इसका जीवंत उदाहरण है। दिल्ली, मुंबई, बंगलोर—सब शहरों में परिवार के सदस्य फैल चुके थे। सबके अपने करियर, अपनी प्राथमिकताएँ। किसी के पास—
- समय नहीं
- पैसे नहीं
- या उसे संभालने की क्षमता नहीं
रीमा जैन ने बताया कि—
“हम सब चाहते थे बचा लें, लेकिन सच यह है कि संभालना हमसे अकेले संभव नहीं था।”
देवनार कॉटेज तक पहुँची ‘Dining With The Kapoors’ टीम—यादें ताज़ा और आँखें नम
नेटफ्लिक्स डॉक्यूमेंट्री Dining With The Kapoors की शूटिंग के दौरान:
- करीना कपूर
- करिश्मा कपूर
- रणबीर कपूर
- रणधीर कपूर
- रीमा जैन
सभी बचपन की यादों में लौट गए। हर दीवार, हर दरवाज़ा… राज कपूर की उपस्थिति का एहसास कराता रहा। लेकिन उन आँखों में यह दर्द भी था— अब यह घर उनका नहीं रहा।
100 करोड़ का सौदा—क्या यह वाकई सौदा था?
डील भले ही बड़ी थी, पर घर की कीमत उससे कहीं ज्यादा थी— भावनाओं में।
सवाल यह है: क्या एक घर बिकने से इतिहास मिट जाता है? या फिर वह वहीँ रहता है जहाँ लोग उसे संजोकर रखते हैं? कपूर परिवार के लिए विरासत, अब ईंटों में नहीं— दिल की धड़कनों में बसी है।
विरासत का अर्थ बदल गया है—यादें अब स्क्रीन पर ज़िंदा रहेंगी
कपूर परिवार आज भी हिन्दी सिनेमा की पहचान है। उनका इतिहास—
- उनकी फिल्मों में
- उनके अभिनय में
- उनके प्रशंसकों की भावनाओं में
हमेशा जीवित रहेगा।
देवनार कॉटेज बिक गया, लेकिन राज कपूर— आज भी अमर हैं।
