फरवरी 2022 से जारी रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध चौथे वर्ष में प्रवेश कर चुका है। इस संघर्ष ने न केवल लाखों लोगों के जीवन को प्रभावित किया है, बल्कि विश्व राजनीति और अर्थव्यवस्था में भी गहरी उथल-पुथल पैदा कर दी है। लगातार लड़ाई, हजारों जानों का नुकसान, बुनियादी ढांचे का ध्वंस और यूरोप में व्यापक असुरक्षा ने दुनिया को मजबूर कर दिया है कि अब शांति के समाधान की दिशा में गंभीर प्रयास किए जाएं। इसी कोशिश का हिस्सा है जिनेवा में आयोजित एक महत्वपूर्ण बैठक, जहां यूक्रेन और उसके पश्चिमी सहयोगी अमेरिकी शांति प्रस्ताव पर चर्चा करने के लिए इकट्ठा हुए हैं।

यह बैठक सिर्फ कूटनीतिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि युद्ध समाप्ति की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है। संयुक्त राज्य अमेरिका ने 28 सूत्री शांति योजना प्रस्तावित की है, जो संघर्ष समाप्ति के लिए एक संभावित ढांचा तैयार करती है। हालांकि, यह योजना खुद में विवादों से घिरी है। यूक्रेन को डर है कि यह रूस के हितों को ज्यादा बढ़ावा दे सकती है और उसकी संप्रभुता के लिए खतरा बन सकती है। यही वजह है कि कीव इस समझौते के हर बिंदु पर बेहद सतर्कता से विचार कर रहा है।
बैठक की मुख्य भूमिका में यूक्रेन के शीर्ष प्रतिनिधि
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमीर जेलेंस्की के चीफ ऑफ स्टाफ आंद्रेई यरमक ने ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर के साथ महत्वपूर्ण वार्ताएं कीं। सोशल मीडिया पर अपने संदेश में यरमक ने कहा कि यह चर्चा किसी भी तरह रूस के साथ समझौते पर केंद्रित नहीं है। बल्कि, उद्देश्य यह है कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर और इंटरनेशनल लॉ के आधार पर एक संयुक्त वैश्विक दृष्टिकोण तैयार किया जाए।
यूक्रेन यह स्पष्ट संदेश दे रहा है कि युद्ध विराम का अर्थ किसी भी स्थिति में उसके क्षेत्रीय अधिकारों का नुकसान नहीं होना चाहिए। 2014 से रूस ने क्रीमिया को पहले ही अपने नियंत्रण में ले लिया था और अब वर्तमान युद्ध ने डोनबास के क्षेत्रों में व्यापक कब्जा कर लिया है। यूक्रेन इन क्षेत्रों को वापस पाने को अपनी संप्रभुता का मूल आधार मानता है और यहीं सबसे बड़ा मतभेद उत्पन्न होता है।
ट्रंप प्रशासन की भूमिका और संकेत
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो एक बार फिर व्हाइट हाउस में हैं, ने कहा है कि शांति वार्ता उनका उद्देश्य है और वर्तमान प्रस्ताव को अंतिम नहीं माना जाना चाहिए। ट्रंप के शब्दों ने दुनिया में हलचल मचा दी है, क्योंकि इससे लगता है कि अभी भी बातचीत के दरवाजे खुले हुए हैं और शर्तों में परिवर्तन की गुंजाइश है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यह युद्ध किसी न किसी तरीके से खत्म होना ही चाहिए।
विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप यूक्रेन को लम्बे समय तक समर्थन देने के पक्ष में नहीं हैं। अमेरिका की घरेलू राजनीति में युद्ध खर्च को लेकर आलोचना बढ़ रही है और ट्रंप अपने नेतृत्व में अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय संघर्षों से अधिक दूरी पर रखने की छाप छोड़ना चाहते हैं। लेकिन साथ ही वह खुलकर यह भी नहीं कह पा रहे कि रूस की बढ़त को यूं ही स्वीकार कर लिया जाए। यही राजनीतिक संतुलन उनका वास्तविक संकट है।
यूक्रेन पर दबाव बढ़ता हुआ महसूस हो रहा है
यूक्रेन युद्ध में अब थकान साफ दिखाई देने लगी है। सैन्य संसाधन कम हो रहे हैं, विदेशी सहायता घटने लगी है और सैनिक मोर्चों पर भारी नुकसान की खबरें बार-बार सामने आती हैं। जेलेंस्की स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि उन्हें अपने संप्रभु अधिकारों की रक्षा या फिर अमेरिकी सहायता पर निर्भर रहने में से एक फैसला चुनना पड़ सकता है। यह एक अत्यंत कठिन स्थिति है।
यूक्रेन के लिए यह युद्ध केवल सीमाओं के लिए संघर्ष नहीं है। यह स्वतंत्रता, लोकतंत्र और राष्ट्रीय अस्तित्व का प्रश्न बन चुका है। लेकिन वही युद्ध, जिसने कीव को वैश्विक सहानुभूति दिलाई थी, अब दुनिया को आर्थिक बोझ और भू-राजनीतिक तनाव के रूप में भारी लगने लगा है। इससे यूक्रेन पर दबाव बढ़ता जा रहा है कि वह किसी समझौते के करीब आए।
क्या रूस इस कूटनीतिक हलचल को गंभीरता से लेगा
जिनेवा की बैठक में रूस शामिल नहीं है। यह वार्ता सीधे मॉस्को के साथ बातचीत नहीं, बल्कि पश्चिमी देशों के बीच एक साझा रुख तैयार करने के प्रयास के रूप में देखी जा रही है। विशेषज्ञों की मानें तो रूस तभी गंभीरता से शांति वार्ता में शामिल होगा जब उसे लगेगा कि युद्ध में उसे ज्यादा नुकसान हो रहा है। अभी स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। रूस ने कुछ क्षेत्रों में बढ़त बनाई है और उसके पास ऊर्जा तथा सैन्य शक्ति का बड़ा भंडार है।
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने हाल ही में कहा था कि यूक्रेन और उसके सहयोगी भ्रम में जी रहे हैं और अंततः उन्हें रूस की शर्तें माननी ही होंगी। यह बयान स्पष्ट संकेत देता है कि क्रेमलिन अभी किसी कमजोर समझौते का इच्छुक नहीं है।
यूरोप के लिए युद्ध अब भयावह बोझ बनता जा रहा है
यूरोप में बिजली, रक्षा खर्च, शरणार्थी संकट और आर्थिक चुनौतियों ने लोगों को रूस-यूक्रेन युद्ध के खिलाफ खड़ा करना शुरू कर दिया है। फ्रांस, जर्मनी और ब्रिटेन लगातार इस चिंता में हैं कि यह युद्ध कहीं नाटो गठबंधन को सीधे संघर्ष में न बदल दे।
कई यूरोपीय विशेषज्ञ कहते हैं कि यह युद्ध जितना लंबा खिंचेगा, वैश्विक सुरक्षा उतनी ही अस्थिर होगी। दूसरी ओर यूक्रेन की सेना को तगड़ा समर्थन दिए बिना युद्ध का रुख बदलना भी असंभव दिखाई देता है। यही वह दुविधा है, जिसने यूरोपीय नेतृत्व को अमेरिकी शांति योजना पर गंभीरता से विचार करने पर मजबूर किया है।
जिनेवा बैठक से क्या उम्मीद की जाए
यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह बैठक तुरंत युद्ध समाप्त कर देगी। लेकिन यह निश्चित है कि यह संघर्ष को राजनीतिक समाधान की दिशा में धकेलने का महत्वपूर्ण कदम है। यदि राजनयिक प्रयास गंभीरता से जारी रहे, तो आने वाले महीनों में युद्धविराम की दिशा में कुछ ठोस संकेत मिल सकते हैं। परंतु सवाल यह है कि क्या यूक्रेन ऐसे किसी समझौते को स्वीकार करेगा जो उसके क्षेत्रीय दावों को कमजोर कर दे।
संयुक्त राज्य अमेरिका के इस प्रस्ताव ने यूक्रेन में चिंता ही नहीं, यूरोप में भी संशय पैदा किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका अब इस युद्ध को अपने कंधों पर और अधिक समय तक उठाना नहीं चाहता। इसलिए शांति के नाम पर ऐसा समाधान सामने लाया जा सकता है, जिसमें रूस को कुछ राजनीतिक जीत मिल जाए। और यही बात यूक्रेन स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है।
शांति की राह लंबी है, जटिल है और उसमें कई बार मोड़ भी आएंगे। लेकिन यह साफ दिख रहा है कि दुनिया अब इस युद्ध को अंतहीन रूप से लंबा खींचने के पक्ष में नहीं है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की नजरें जिनेवा पर टिकी हैं। आने वाले समय में वहीं से युद्ध समाप्ति की किरण भी निकल सकती है या नया संकट भी जन्म ले सकता है।
