देवी अहिल्या विश्वविद्यालय इंदौर में लॉ ऑफ क्राइम विषय की परीक्षा को लेकर पिछले कुछ दिनों से चल रहा विवाद अब विश्वविद्यालय के परीक्षा संचालन तंत्र के लिए गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। गलत सिलेबस से तैयार किए गए प्रश्नपत्र के कारण स्थगित हुई परीक्षा न केवल प्रशासनिक चूक का उदाहरण बन गई है, बल्कि इस घटना ने विश्वविद्यालय की जवाबदेही, कार्यप्रणाली और विभागीय समन्वय पर भी सवालों की बौछार कर दी है। यह मामला उन हजारों विद्यार्थियों से सीधे जुड़ा है जो सेमेस्टर परीक्षाओं की तैयारी में लगे हुए थे और जिन्हें अंतिम समय में परीक्षा टलने से भारी असुविधा उठानी पड़ी।

घटना की शुरुआत तब हुई जब लॉ ऑफ क्राइम विषय के लिए तैयार किए गए प्रश्नपत्र का सिलेबस विश्वविद्यालय के निर्धारित पैटर्न से मेल नहीं खा रहा था। वर्ष 2025-26 के लिए लागू किए गए नए पाठ्यक्रम के आधार पर पेपर तैयार किया गया, जबकि इस सत्र में इस विषय के लिए पुराने सिलेबस यानी भारतीय नागरिक संहिता से जुड़े अध्याय ही लागू थे। विद्यार्थियों के अनुसार जैसे ही उन्हें प्रश्नपत्र में नए सिलेबस के आधार पर पूछे गए प्रश्न दिखाई दिए, उनमें असमंजस की स्थिति बन गई। कई छात्रों ने परीक्षा केंद्रों पर ही संदेह जताया कि यह सिलेबस मेल नहीं खाता। मामला बढ़ा तो विश्वविद्यालय को परीक्षा निरस्त करने का निर्णय लेना पड़ा।
विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार इस पूरे प्रकरण की जांच पहले ही गठित की जाती, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि त्रुटि आखिर किस स्तर पर हुई। परीक्षा नियंत्रक कार्यालय, गोपनीय विभाग और पेपर सेट करने वाले विशेषज्ञों की भूमिका पर सवाल उठने लगे। इसके बाद जांच समिति का गठन किया गया और सात दिनों में रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया गया। हालांकि जांच समिति ने अब अतिरिक्त समय की मांग करते हुए बताया है कि त्रुटियों का दायरा व्यापक है और विभिन्न विभागों से स्पष्टीकरण लेने में अपेक्षा से अधिक समय लग रहा है।
जांच के दौरान प्रारंभिक रूप से यह सामने आया है कि पेपर सेट करने वाले विभाग तक गलत सिलेबस पहुंचा, और यह चूक शैक्षणिक विभाग से ही शुरू हुई। पेपर तैयार करने से पहले पुराने पाठ्यक्रम की जगह नया पाठ्यक्रम भेज दिया गया था। यह दस्तावेज परीक्षा विभाग और गोपनीय शाखा के स्तर पर भी बिना मिलान किए आगे बढ़ा दिया गया। विशेषज्ञों के अनुसार इतनी बड़ी चूक बिना बहुस्तरीय त्रुटियों के संभव नहीं। इसका मतलब है कि प्रशासनिक समन्वय, दस्तावेज सत्यापन और परीक्षा संचालन की प्रणाली में गंभीर कमियां मौजूद हैं।
विश्वविद्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों का कहना है कि यह चूक अनजाने में हुई, लेकिन इससे विद्यार्थियों को जिस असुविधा का सामना करना पड़ा है, उसकी भरपाई तत्काल जरूरी है। इसी कारण प्रशासन ने जल्दबाजी में पुराने सिलेबस के आधार पर नया प्रश्नपत्र तैयार करने का कार्य पूरा किया। अब 28 नवंबर को परीक्षा आयोजित करने का निर्णय लिया गया है, ताकि विद्यार्थियों का समय अधिक बर्बाद न हो।
लॉ ऑफ क्राइम विषय, जो कि भारतीय नागरिक संहिता और उससे जुड़े अपराध, दंड और न्यायिक संरचना को समझने का आधारभूत विषय है, उसके लिए पढ़ाई में एक-एक अध्याय की तैयारी बेहद महत्वपूर्ण होती है। यह विषय कानून की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए मूलभूत स्तंभों में से एक है। ऐसे में सिलेबस में गड़बड़ी और गलत पाठ्यक्रम के आधार पर पेपर बनना विद्यार्थियों में स्वाभाविक रूप से भ्रम और तनाव का कारण बना। कई छात्रों ने इस घटना को लेकर सोशल मीडिया पर भी अपनी नाराजगी जाहिर की।
उसी दौरान यह भी सामने आया कि कॉलेज स्तर पर भी सिलेबस को लेकर स्पष्टता नहीं थी। कई कॉलेजों के शिक्षकों ने स्वीकार किया कि विश्वविद्यालय ने पुराने और नए सिलेबस से संबंधित दस्तावेजों के बीच अंतर साफ तरीके से नहीं समझाया था। शिक्षकों का कहना है कि छात्रों को तैयार कराने में भी उन्हें समय-समय पर अस्पष्ट निर्देश मिले, जिससे स्थिति और उलझ गई। यह स्थिति केवल परीक्षा विभाग तक सीमित नहीं रही बल्कि शिक्षण स्तर पर भी भ्रम की स्थिति बनाई रही।
विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस पूरे मामले को गंभीरता से लेते हुए कहा है कि सिलेबस की पुष्टि करने और दस्तावेजों की पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए एक नई प्रणाली लागू की जाएगी। इसमें यह प्रावधान होगा कि हर विषय का सिलेबस तीन अलग-अलग विभागों की पुष्टि के बाद ही पेपर सेटर को भेजा जाएगा। इसके अलावा गोपनीय विभाग में दस्तावेजों की जांच के लिए अलग सेल गठित करने का भी प्रस्ताव रखा गया है।
इस घटना ने एक बार फिर शिक्षा संस्थानों में प्रशासनिक प्रक्रिया की जटिलता को सामने ला दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक परीक्षा संचालन विभाग विभिन्न शाखाओं के बीच तकनीकी और संवादात्मक समन्वय को सख्त नहीं करेगा, तब तक इस तरह की समस्याएं बनी रहेंगी। वहीं छात्र संगठनों ने मांग की है कि इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए।
छात्र संगठनों ने कहा कि यदि परीक्षा में ऐसी गड़बड़ी होती है तो इसका सीधा नुकसान छात्रों को होता है। कई छात्रों ने कहा कि परीक्षा से कुछ दिन पहले ही यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रश्नपत्र में बदलाव या त्रुटि है तो विश्वविद्यालय को तुरंत सूचना प्रसारित करनी चाहिए। इसके साथ ही, विश्वविद्यालय को सुनिश्चित करना चाहिए कि आगे के सत्रों में इस प्रकार की स्थिति दोबारा न उत्पन्न हो।
जांच समिति ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया है कि पेपर सेट करने वालों को भेजे गए निर्देशों में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि इस वर्ष पुराने सिलेबस को ही लागू माना जाएगा। यह एक ऐसी त्रुटि है जो दस्तावेजी सत्यापन के दौरान ही पकड़ में आ सकती थी। समिति के सदस्यों ने स्वीकार किया है कि पेपर सेटर, शैक्षणिक विभाग और परीक्षा शाखा, तीनों ही स्तरों पर इस गलती की अनदेखी हुई।
अब जब विश्वविद्यालय नया प्रश्नपत्र तैयार कर चुका है, छात्रों को यह उम्मीद है कि परीक्षा अब किसी बाधा के बिना पूरी होगी। प्रशासन के अनुसार पेपर पूरी तरह पुराने सिलेबस पर आधारित होगा और इसमें भारतीय नागरिक संहिता के मूल प्रावधानों को ही शामिल किया गया है। परीक्षा स्थगित होने से छात्रों की पढ़ाई और समय-सारणी प्रभावित हुई है, लेकिन नया प्रश्नपत्र जारी होने से अब स्थिति धीरे-धीरे सामान्य हो रही है।
हालांकि चर्चा यह भी है कि यदि विश्वविद्यालय समय रहते सिलेबस का क्रॉस-चेक कर लेता तो यह समस्या पैदा ही नहीं होती। छात्र बताते हैं कि विश्वविद्यालय स्तर पर सिलेबस अपलोड करने और अपडेट करने की प्रक्रिया पारदर्शी और त्वरित होनी चाहिए। अगर छात्र पोर्टल पर पुराने और नए सिलेबस दोनों उपलब्ध हैं और उनमें अंतर स्पष्ट रूप से नहीं बताया गया है तो भ्रम पैदा होना स्वाभाविक है।
यह घटना विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए एक चेतावनी भी है कि परीक्षा संचालन की प्रक्रिया में सुधार किस हद तक जरूरी है। कई शिक्षाविदों ने यह भी सुझाव दिया है कि विश्वविद्यालय को सिलेबस संबंधित निर्णयों को प्रत्येक कॉलेज तक अलग-अलग माध्यमों से पहुंचाना चाहिए, न कि केवल एक आधिकारिक नोटिस के माध्यम से। साथ ही, हर सत्र की शुरुआत में शिक्षकों और छात्रों को सिलेबस की पुष्टि हेतु एक संयुक्त ओपन मीटिंग या वेबिनार आयोजित किया जाना चाहिए।
इस बीच, कुलगुरु डॉ. राकेश सिंघई से भी जांच समिति ने अतिरिक्त समय की मांग की है। समिति का कहना है कि इस मामले की जड़ तक पहुंचने और सभी जिम्मेदार पक्षों से जवाब प्राप्त करने के लिए निर्धारित समय पर्याप्त नहीं था। यह मांग इसलिए भी की गई है क्योंकि कई विभागों से रिकॉर्ड और दस्तावेज समय पर उपलब्ध नहीं हो पाए।
अब विश्वविद्यालय की निगाहें 28 नवंबर को होने वाली नई परीक्षा पर टिकी हैं। प्रशासन का कहना है कि नए प्रश्नपत्र के तैयार हो जाने के बाद परीक्षा संचालन की व्यवस्थाएं भी सुदृढ़ कर दी गई हैं। छात्रों को आश्वासन दिया गया है कि इस बार परीक्षा सुचारू रूप से संचालित की जाएगी।
यह पूरा मामला केवल एक परीक्षा की गड़बड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उच्च शिक्षा संस्थानों में प्रणालीगत सुधार की आवश्यकता भी उजागर करता है। यदि विश्वविद्यालयों में संवाद, दस्तावेज़ सत्यापन, विभागीय समन्वय और परीक्षा संचालन की प्रणाली को आधुनिक तकनीक के माध्यम से सुदृढ़ किया जाए, तभी इस प्रकार की गलतियों को रोका जा सकता है।
