हरदा जिले में इस वर्ष संविधान दिवस का आयोजन एक विशेष गरिमा और भावनात्मक गहराई के साथ मनाया गया। सुबह से ही शहर के आंबेडकर चौक की वातावरण में एक अनोखी ऊर्जा महसूस की जा सकती थी। हल्की ठंड के बीच लोग अपने स्तर पर तैयारियां कर रहे थे, ताकि इस दिन को संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अंबेडकर की स्मृति में विशेष बनाकर मनाया जा सके। यह सिर्फ एक औपचारिक आयोजन नहीं था, बल्कि एक गहन सामाजिक संदेश से भरा हुआ वह क्षण था, जिसमें नागरिकों ने अपनी जिम्मेदारियों, अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति एक बार फिर जागरूक होने का संकल्प लिया।

दिन की शुरुआत उस समय हुई जब आजक्स और अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति विकास परिषद के पदाधिकारी अपने सदस्यों के साथ एकत्रित हुए। हाथों में दीप लेकर वे आंबेडकर चौक की ओर बढ़े, जहां बड़ी सादगी, श्रद्धा और सामूहिक ऊर्जा के साथ बाबा साहेब की प्रतिमा के समक्ष दीये प्रज्ज्वलित किए गए। यह दृश्य हर किसी के भीतर गहरी भावनाएं जगाने वाला था। लोगों ने इस कार्य को केवल एक परंपरा के रूप में नहीं अपनाया, बल्कि इसे एक प्रतीकात्मक यात्रा माना, जो आज के समय में संविधान की महत्ता को और अधिक दृढ़ता से दर्शाती है।
प्रतिमा पर माल्यार्पण करते समय सभी के चेहरों पर सम्मान और कृतज्ञता के भाव थे। यह वही स्थान था जहां लोग पिछले कई वर्षों से संविधान दिवस को नए अंदाज में मनाते आ रहे हैं, लेकिन इस बार माहौल में एक विशेष संजीदगी महसूस की जा सकती थी। कई नागरिकों ने यह कहा कि पिछले वर्षों की घटनाओं ने यह समझ और मजबूत कर दी है कि संविधान सिर्फ एक दस्तावेज नहीं, बल्कि एक जीवंत मार्गदर्शक है, जो समाज के हर हिस्से को जोड़ता और साथ लेकर चलता है।
कार्यक्रम की अगुवाई सीमा निराला ने की। उन्होंने अपने संबोधन में एक साफ, दृढ़ और प्रेरणादायक संदेश दिया। उनके शब्दों में नागरिकता का सार था, संविधान की आत्मा थी और बाबा साहेब के प्रति गहरा सम्मान भी। सीमा निराला ने कहा कि हर व्यक्ति को संविधान का सम्मान करना चाहिए और उसे जीवन के हर क्षेत्र में लागू करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि संविधान ने हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व का अधिकार दिया है, और इन मूल्यों को संरक्षित रखना देश के हर व्यक्ति की जिम्मेदारी है। उनके संबोधन ने वहां मौजूद हर व्यक्ति को यह एहसास दिलाया कि संविधान की रक्षा केवल सरकारों का काम नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है।
इसके बाद कार्यक्रम में मौजूद सदस्यों ने संविधान की प्रस्तावना का वाचन किया। यह क्षण अत्यंत भावुक और प्रेरणादायक था। प्रस्तावना को सामूहिक स्वर में पढ़ा गया, जिससे शब्दों की गूंज दूर तक फैलती हुई महसूस हुई। न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व का उच्चारण मानो वातावरण में एक नयी चेतना भर रहा था। यह वाचन केवल औपचारिकता नहीं थी, बल्कि एक ऐसी प्रतिज्ञा थी, जिसे हर व्यक्ति ने अपने हृदय में संजोकर दोहराया।
सभा स्थल पर खड़े लोग, चाहे वे युवा हों, बुजुर्ग हों या महिलाएं, सभी के भीतर संविधान की शक्ति और उसकी अनिवार्यता का एहसास स्पष्ट दिख रहा था। कुछ लोग चुपचाप बाबा साहेब की प्रतिमा के सामने खड़े होकर अपने विचारों में खोए हुए थे, मानो वे उस संघर्षपूर्ण यात्रा को महसूस कर रहे हों, जो संविधान को रूप देने में लगी थी। कई युवा इस आयोजन को रिकॉर्ड कर रहे थे ताकि वे इसे दूसरों तक भी पहुंचा सकें और संविधान के प्रति जागरूकता को और अधिक बढ़ा सकें।
सीमा निराला ने अपने वक्तव्य में सामाजिक एकता, संवैधानिक मूल्यों की रक्षा और अधिकारों के साथ कर्तव्यों के महत्व पर गहराई से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज के समय में संविधान को केवल पढ़ने या याद करने की नहीं, बल्कि उसके सिद्धांतों को अपने जीवन में लागू करने की आवश्यकता है। सामाजिक असमानताओं, भेदभाव और अन्याय को मिटाने की ताकत संविधान में है और इसे अपनाना हर नागरिक की जिम्मेदारी है।
उन्होंने बाबा साहेब को याद करते हुए यह भी कहा कि उनका संघर्ष केवल एक वर्ग के उत्थान के लिए नहीं था, बल्कि पूरे भारतीय समाज के लिए था। उन्होंने शिक्षा, समान अधिकारों और सामाजिक न्याय को शीर्ष प्राथमिकता दी और उनके इन विचारों ने भारत के लोकतंत्र को मजबूती दी। सीमाजी ने कहा कि आज की पीढ़ी को अंबेडकर के विचारों से प्रेरणा लेकर यह समझना चाहिए कि समाज में समानता और न्याय तभी संभव है जब हम संविधान को अपनी जिंदगी का मूल आधार मानें।
आयोजन के दौरान कई सामाजिक कार्यकर्ताओं ने भी अपने विचार साझा किए। उन्होंने संविधान की प्रासंगिकता, वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों में उसके महत्व और युवाओं की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संविधान दिवस केवल मनाने का विषय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का अवसर है। क्या हम अपने दैनिक जीवन में संविधान के बताए मार्ग का अनुसरण कर पा रहे हैं, यह सबसे बड़ा सवाल है। इस चिंतन ने लोगों को गहराई से प्रभावित किया।
कार्यक्रम के अंत में सामूहिक संकल्प भी लिया गया जिसमें सभी उपस्थित लोग इस बात पर सहमत हुए कि वे संविधान के मूल्यों को सुरक्षित रखेंगे, सामाजिक एकता और भाईचारे का संदेश फैलाएंगे और किसी भी प्रकार के भेदभाव का विरोध करेंगे। धीरे-धीरे कार्यक्रम समाप्त हुआ, लेकिन लोगों के चेहरों पर वह गंभीरता और जिम्मेदारी का भाव देर तक बना रहा।
शाम होते-होते कई नागरिक दोबारा आंबेडकर चौक पर लौटे। कुछ लोगों ने प्रतिमा के नीचे मोमबत्तियाँ रखीं, कुछ लोग शांत मन से बैठकर संविधान की पंक्तियों को पढ़ते रहे। यह दृश्य इस बात का प्रमाण था कि संविधान दिवस केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण का अवसर बन चुका है।
इस पूरे आयोजन ने न सिर्फ बाबा साहेब को श्रद्धांजलि दी, बल्कि यह भी सिद्ध किया कि आज भी संविधान लोगों के दिलों में जीवित है। उसकी शक्ति और आवश्यकता को लोग समझते हैं और समय-समय पर उसे याद करते हुए अपनी जिम्मेदारियों का एहसास भी करते हैं। हरदा में मनाया गया यह संविधान दिवस आने वाले वर्षों के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन गया है।
