आधुनिक वैश्विक राजनीति में रूस और चीन के बीच रिश्ते पहले जैसे नहीं रहे। दोनों देश बाहर से मजबूत दोस्ती का प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन अंदरूनी तौर पर अविश्वास और प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। यही स्थिति आर्कटिक में भारत की रणनीतिक भूमिका को बढ़ाने का अवसर प्रस्तुत कर रही है। रूस, जो पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों और यूक्रेन संकट के कारण वैश्विक अलगाव में है, अब भारत के साथ आर्कटिक सहयोग के लिए विशेष रूप से सक्रिय हो रहा है।

भारत और रूस के बीच आर्कटिक सहयोग का केंद्र बिंदु नॉर्दर्न सी रूट (NSR) है। भारत इस क्षेत्र में खोजी और व्यापारिक मिशनों में सक्रिय है, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन में उसकी महत्वपूर्ण उपस्थिति सुनिश्चित हो रही है। रूस ने भारत के इस जुड़ाव की खुले तौर पर सराहना की है और उसे आर्कटिक सहयोग के लिए एक अहम साझेदार माना है। इस कदम से यह स्पष्ट होता है कि रूस पारंपरिक आर्कटिक संस्थाओं से आगे बढ़कर अपनी रणनीतिक पार्टनरशिप को फिर से सुदृढ़ करना चाहता है।
रूस का आर्कटिक में विशेष अधिकार और रणनीति
परंपरागत रूप से, रूस ने आर्कटिक को अपने प्रभुत्व वाला क्षेत्र माना है। आर्कटिक काउंसिल में चीन को ऑब्जर्वर स्टेटस देने के बाद भी रूस अपनी प्राथमिकताओं को राष्ट्रीय परियोजनाओं के अनुसार निर्धारित करता रहा है। 2022 के बाद पश्चिमी देशों ने रूस के साथ सहयोग में रुकावटें डालीं, जिससे रूस ने अपनी आर्कटिक नीतियों में चीन के प्रभाव को संतुलित करने की जरूरत महसूस की। इस परिप्रेक्ष्य में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। भारत न केवल पारंपरिक पश्चिमी प्रभुत्व को चुनौती दे सकता है बल्कि रूस और उसके सहयोगियों के साथ मिलकर बहुपक्षीय रणनीति को भी सशक्त बना सकता है।
रूस के विशेष प्रतिनिधि व्लादिमीर पानोव ने स्पष्ट किया कि NSR के विकास में भारत की सक्रिय भागीदारी को रूस पूरी तरह समर्थन देता है। यह संकेत है कि रूस भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को चीन के मुकाबले अधिक विविध और संतुलित बनाना चाहता है। आर्कटिक में भारत की उपस्थिति ऊर्जा, समुद्री और पोलर डोमेन में सहयोग को बढ़ाएगी, जो वैश्विक भू-राजनीति में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकती है।
भारत की रणनीतिक लाभ और वैश्विक प्रभाव
भारत के लिए आर्कटिक में सक्रिय भूमिका केवल व्यापार या खोजी मिशनों तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक शक्ति संतुलन में उसकी भागीदारी को मजबूत करती है। आर्कटिक में भारत की उपस्थिति रूस को पश्चिमी दबाव और चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षा के बीच संतुलन बनाने में मदद करती है। यह रणनीति न केवल ऊर्जा और लॉजिस्टिक्स में महत्वपूर्ण है, बल्कि सुरक्षा, तकनीकी सहयोग और भू-राजनीतिक प्रभाव के लिए भी अहम है।
चीन और रूस की साझेदारी, हालांकि बाहरी रूप से मजबूत दिखती है, पर इसमें साफ़ सीमाएं हैं। एनर्जी प्रोजेक्ट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर में चीन के निवेश के बावजूद रूस अपनी आर्कटिक प्राथमिकताओं को राष्ट्रीय हितों के अनुसार रखता है। यही कारण है कि भारत को अब इस रणनीतिक जगह में महत्व दिया जा रहा है। रूस का भारत पर भरोसा और साझेदारी चीन के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश का हिस्सा है।
भविष्य की संभावनाएँ और वैश्विक राजनीति में असर
भविष्य में, भारत और रूस की साझेदारी आर्कटिक काउंसिल और BRICS जैसे बहुपक्षीय फोरम में भी मजबूत हो सकती है। यह न केवल पश्चिमी देशों के प्रभुत्व को चुनौती देगा, बल्कि वैश्विक ऊर्जा, व्यापार और सुरक्षा में भारत की भूमिका को भी प्रमुख बनाएगा। रूस और भारत का यह सहयोग चीन के बढ़ते दबाव को कम करने और आर्कटिक में बहुपक्षीय दृष्टिकोण स्थापित करने में मदद करेगा।
भारत की सक्रिय भागीदारी और रूस की समर्थन नीति आर्कटिक में नयी वैश्विक शक्ति संरचना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगी। यह रणनीति आर्थिक, राजनीतिक और सैन्य दृष्टि से दोनों देशों के लिए फायदेमंद साबित हो सकती है।
