वैश्विक राजनीति के केंद्र में खड़ा ताइवान चीन के लगातार बढ़ते खतरे के बीच एक बड़ा कदम उठाने जा रहा है। ताइवानी राष्ट्रपति लाई चिंग ते ने हाल ही में घोषणा की कि उनकी सरकार अगले वर्षों में सुरक्षा और रक्षा को मजबूती देने के लिए 40 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च करेगी। यह कदम ताइवान की सैन्य तैयारियों को नया आयाम देगा और क्षेत्रीय तनाव को और बढ़ाएगा।
ताइवान का यह निर्णय उस समय आया है जब चीन लगातार अपने सैन्य बलों को बढ़ा रहा है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आक्रामक गतिविधियों को अंजाम दे रहा है। चीनी सेना ने ताइवान के आसपास न केवल सैन्य अभ्यास बढ़ाया है बल्कि अमेरिका, जापान और फिलीपींस तक को भी धमकी देने का प्रयास किया है। राष्ट्रपति लाई चिंग ते का कहना है कि ताइवान की राष्ट्रीय सुरक्षा, स्वतंत्रता और लोकतंत्र उसके समाज की नींव हैं और किसी भी तरह के समझौते के लिए कोई स्थान नहीं है।

ताइवान के लिए यह सिर्फ एक सैन्य संघर्ष नहीं है, बल्कि एक वैचारिक लड़ाई भी है। राष्ट्रपति ने कहा कि इतिहास ने यह साबित किया है कि आक्रामकता और समझौते के लिए तैयार होना केवल गुलामी की ओर ले जाता है। ताइवान इस कदम के माध्यम से यह संदेश देना चाहता है कि वह अपने लोकतांत्रिक अधिकारों और संप्रभुता की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है।
चीन ने इस निर्णय को ताइवान को तबाही की ओर ले जाने वाला कदम करार दिया है। चीन का मानना है कि ताइवान द्वारा हथियार खरीदना और रक्षा खर्च बढ़ाना क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल सकता है। चीनी प्रवक्ता ने कहा कि ताइवान अपने नागरिकों के जीवन स्तर को सुधारने और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के बजाय हथियार खरीदने पर खर्च कर रहा है।
ताइवान का रक्षा बजट अमेरिका की गारंटी से जुड़ा हुआ है, लेकिन अमेरिकी प्रशासन के निर्णय और डीलों ने सुरक्षा गारंटी पर सवाल खड़े किए हैं। ताइवान की अधिकांश हथियार खरीद अमेरिकी कंपनियों से होती है। ताइवान का लक्ष्य साल 2030 तक अपनी जीडीपी का 5 प्रतिशत रक्षा पर खर्च करना है, और वर्ष 2026 तक यह आंकड़ा 30 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा, जो जीडीपी का 3.32 प्रतिशत है।
इस स्थिति के चलते ताइवान और चीन के बीच तनाव बढ़ता जा रहा है। ताइवान के राष्ट्रपति ने पहले भी अमेरिका के बड़े अखबारों में लेख लिखकर यह स्पष्ट किया कि उनकी सरकार अपने रक्षा खर्च में वृद्धि कर रही है ताकि लोकतांत्रिक ताइवान और चीन के आक्रामक इरादों के बीच संतुलन कायम रखा जा सके।
चीन ने पिछले पांच वर्षों में लगातार ताइवान पर दबाव बढ़ाया है और अपने दावे को दोहराया है। यह क्षेत्रीय राजनीतिक तनाव वैश्विक राजनीति के लिए भी चुनौतीपूर्ण साबित हो सकता है। अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने ताइवान को अपने अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित करने में समर्थन देने की बात कही है।
हालांकि, ताइवान की योजना न केवल अपनी रक्षा को मजबूत करने की है, बल्कि यह क्षेत्रीय शक्ति संतुलन और वैश्विक सुरक्षा पर भी प्रभाव डाल सकती है। इस समय एशिया और हिंद-प्रशांत में सैन्य गतिविधियों का विस्तार लगातार जारी है। विशेषज्ञों का कहना है कि ताइवान और चीन के बीच बढ़ती सैन्य तैयारी, हथियार खरीद और रणनीतिक निर्णय भविष्य में क्षेत्रीय सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
