इस महीने वॉशिंगटन में हुई एक अहम बैठक ने मध्यपूर्व की राजनीति में नया मोड़ ला दिया। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने वाइट हाउस में आमने-सामने बातचीत की। सार्वजनिक स्तर पर यह बैठक काफी दोस्ताना और सहयोगपूर्ण दिखाई दी, दोनों नेताओं ने एक-दूसरे की सराहना की और भविष्य में सहयोग के संकेत दिए।

हालांकि, जब यह बातचीत बंद कमरे में चली गई, तब हालात अचानक बदल गए। इस दौरान सबसे बड़ा मुद्दा बना इजरायल को मान्यता देने वाला अब्राहम अकॉर्ड। ट्रंप चाहते थे कि सऊदी अरब इस समझौते का हिस्सा बने और मध्यपूर्व में सामान्यीकरण की प्रक्रिया तेज हो। लेकिन क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने स्पष्ट कर दिया कि उनका देश फिलहाल इस कदम के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि गाजा में इजरायल-हमास संघर्ष के बाद सऊदी जनता का रुख इजरायल के खिलाफ बहुत मजबूत है।
एक अमेरिकी अधिकारी के हवाले से यह भी जानकारी मिली कि सऊदी अरब का समाज इजरायल के साथ रिश्तों के सामान्यीकरण के लिए पर्याप्त सहमति नहीं रखता। ट्रंप ने बार-बार कोशिश की और दबाव बनाया, लेकिन प्रिंस सलमान ने अपनी स्थिति पर अडिग रहकर दो-राज्य समाधान की शर्त रखी। उन्होंने स्पष्ट किया कि इजरायल को तय करना होगा कि फिलीस्तीन का निर्माण कब और कैसे होगा, उसकी सीमाएं स्थायी होंगी और इसमें कोई बदलाव नहीं किया जा सकेगा।
अब्राहम अकॉर्ड और मध्यपूर्व की जटिल राजनीति
अब्राहम अकॉर्ड एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है, जिसका मकसद इजरायल और अरब देशों के बीच सामान्यीकरण और शांति को बढ़ावा देना है। ट्रंप प्रशासन इसे मध्यपूर्व में स्थायी शांति का आधार मानता है, खासकर गाजा में संघर्ष समाप्त होने और ईरान के न्यूक्लियर कार्यक्रम में देरी के बाद।
सऊदी अरब की ओर से कहा गया कि वे अकॉर्ड में शामिल होना चाहते हैं, लेकिन दो-राज्य समाधान की शर्त के साथ। यह शर्त इस बात की गवाही देती है कि सऊदी विदेश नीति केवल अस्थायी दोस्ती या दबाव पर आधारित नहीं है, बल्कि उनके देश और जनता के हितों पर आधारित है।
विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप का दृष्टिकोण यह था कि सभी मध्यपूर्वी देश अब्राहम अकॉर्ड में शामिल हों और क्षेत्रीय सामान्यीकरण को तेजी से लागू किया जाए। लेकिन सऊदी अरब ने स्पष्ट किया कि उनके लिए जनता की भावनाएं और फिलीस्तीन का भविष्य सर्वोपरि है। इस बातचीत ने यह भी दिखाया कि सार्वजनिक मंच और बंद कमरे में बातचीत में अंतर होता है।
राजनीतिक और वैश्विक निहितार्थ
इस घटना के वैश्विक प्रभाव व्यापक हैं। अमेरिका और सऊदी अरब के बीच संबंध हमेशा मजबूत रहे हैं, लेकिन मध्यपूर्व की जटिल राजनीति और जनता की भावनाएं ऐसे मुद्दों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। ट्रंप प्रशासन के लिए यह संदेश गया कि किसी भी समझौते में केवल दबाव और सत्ता के बल से सफलता नहीं मिल सकती।
सऊदी अरब ने इस बैठक में यह भी संकेत दिया कि वे अपने निर्णयों में स्वतंत्र हैं और किसी भी वैश्विक दबाव के सामने झुकेंगे नहीं। यह मध्यपूर्व में अमेरिका की रणनीति और क्षेत्रीय शांति प्रयासों के लिए भी एक नई चुनौती है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यह घटना केवल अब्राहम अकॉर्ड या इजरायल-सऊदी संबंध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे मध्यपूर्व के शांति प्रयासों और वैश्विक कूटनीति के लिए संकेत देती है।
