पश्चिम अफ्रीका का छोटा लेकिन महत्वपूर्ण देश गिनी-बिसाऊ, जो अपनी राजनीतिक अस्थिरता और गरीबी के लिए जाना जाता है, एक बार फिर सेना के तख्तापलट का केंद्र बन गया है। यहां हाल ही में हुए घटनाक्रम ने पूरी दुनिया का ध्यान इस छोटे देश की ओर खींचा है। रविवार को आयोजित राष्ट्रपति चुनाव के कुछ ही दिनों बाद, सेना ने सत्ता पर कब्जा कर लिया। गिनी-बिसाऊ में लगभग 45–50 प्रतिशत मुस्लिम आबादी रहती है, जबकि 20–22 प्रतिशत क्रिश्चियन और लगभग 30 प्रतिशत अन्य पारंपरिक धर्मों के लोग हैं। यह देश धार्मिक और जातीय विविधता के लिए जाना जाता है, लेकिन लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता के चलते इसे सुरक्षित और स्थिर नहीं माना जाता।

चुनाव से पहले राजनीतिक तनाव और बढ़ती अराजकता
रविवार को राष्ट्रपति चुनाव हुए थे। चुनाव परिणाम गुरुवार को घोषित होने थे, लेकिन पहले ही माहौल तनावपूर्ण हो गया। दोनों शीर्ष उम्मीदवार, मौजूदा राष्ट्रपति उमरो सिसोको एम्बालो और उनके प्रतिद्वंद्वी फर्नांडो डायस ने बिना किसी आधिकारिक प्रमाण के खुद को विजेता घोषित कर दिया। विपक्ष और नागरिक समाज ने चुनाव की ईमानदारी पर सवाल उठाए, क्योंकि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी PAIGC को उम्मीदवार खड़ा करने से रोक दिया गया था। इस स्थिति ने तनाव को चरम सीमा तक पहुंचा दिया और सेना ने इस मौके का फायदा उठाकर सत्ता पर कब्जा कर लिया।
सेना का सत्ता पर कब्जा और कर्फ्यू लागू
बुधवार को राजधानी बिसाऊ में अचानक गोलियों की आवाजें गूंजने लगीं। चुनाव आयोग, राष्ट्रपति भवन और गृह मंत्रालय के आस-पास फायरिंग और धुआं फैला। टीवी पर दिखाई गई सेना के अफसरों की टीम ने खुद को देश की व्यवस्था बहाल करने वाला बताकर सत्ता पर कब्जा करने की घोषणा की। उन्होंने तीन महत्वपूर्ण निर्णय लिए: चुनाव प्रक्रिया को अगले आदेश तक निलंबित करना, देश की सभी सीमाओं को बंद करना, और रात का कर्फ्यू तुरंत लागू करना।
सेना के इस कदम ने स्पष्ट कर दिया कि यह सीधे-सीधे सत्ता पर कब्जे का प्रयास था। राष्ट्रपति और मुख्य विपक्षी नेता दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया। विशेष बात यह थी कि तख्तापलट का नेतृत्व कर रहे अफसर डेनिस एन’काना वही व्यक्ति था जो राष्ट्रपति का सुरक्षा प्रमुख था। इसका मतलब है कि राष्ट्रपति को उसी व्यक्ति ने हिरासत में लिया, जिसे उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी दी गई थी।
देश में लोकतंत्र पर खतरा और ऐतिहासिक संदर्भ
गिनी-बिसाऊ ने 1974 में पुर्तगाल से स्वतंत्रता प्राप्त की थी, लेकिन तब से लेकर अब तक कई बार तख्तापलट हो चुके हैं। यह देश राजनीतिक अस्थिरता और चुनावी विवादों का लंबे समय से शिकार रहा है। 2019 के राष्ट्रपति चुनाव में भी इसी प्रकार का संकट उत्पन्न हुआ था, जब दोनों मुख्य उम्मीदवारों ने खुद को विजेता घोषित कर दिया था और देश चार महीने तक राजनीतिक संकट में रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि तख्तापलट का यह कदम चुनावी विवाद और राजनीतिक अराजकता का परिणाम है।
जनता पर प्रभाव और सामाजिक असुरक्षा
सेना के सत्ता पर कब्जे और कर्फ्यू के कारण आम जनता की जीवनशैली प्रभावित हुई है। इंटरनेट बंद करने की कोशिशें की जा रही हैं। नागरिकों में डर और असुरक्षा का माहौल फैल गया है। धार्मिक और जातीय समूहों के बीच तनाव बढ़ सकता है क्योंकि देश का मिश्रित और सेकुलर पहचान अब अस्थिर हो गई है। आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हो रही हैं और स्थानीय व्यापारिक गतिविधियों में मंदी दिखाई दे रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि तख्तापलट ने गिनी-बिसाऊ में लोकतंत्र की जड़ें कमजोर कर दी हैं और राजनीतिक संकट लंबे समय तक जारी रह सकता है। सेना का दावा है कि उनका उद्देश्य व्यवस्था बहाल करना है, लेकिन यह कदम लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए खतरा है।
भविष्य की राजनीतिक स्थिति और अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया
इस तख्तापलट ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय में चिंता पैदा कर दी है। पश्चिमी देशों और अफ्रीकी संघ ने स्थिति पर नजर रखी है और लोकतंत्र की बहाली की मांग की है। गिनी-बिसाऊ की अंतरराष्ट्रीय छवि प्रभावित हुई है, और विदेशी निवेश भी अस्थिर हो सकता है। देश के भविष्य की राजनीतिक दिशा अभी अनिश्चित है और स्थिति पर नजर बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।
देश की जनता, जो लंबे समय से राजनीतिक अस्थिरता का सामना कर रही है, अब एक बार फिर सैनिक सत्ता के दबाव में आ गई है। भविष्य में लोकतंत्र को बहाल करने और चुनावी प्रक्रिया को सुरक्षित बनाने के लिए प्रशासनिक और अंतरराष्ट्रीय दबाव आवश्यक होगा।
