दुनिया पिछले तीन वर्षों से रूस और यूक्रेन के बीच चल रही भीषण जंग को देखते-देखते थक चुकी है। यह युद्ध न केवल यूरोप के भू-राजनीतिक संतुलन को चुनौती दे रहा है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा बाज़ार पर भी गहरा असर डाल चुका है। ऐसे माहौल में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि उनके पास इस युद्ध को रोकने का एक व्यापक और क्रांतिकारी समाधान तैयार है। उनके इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक नई बहस छेड़ दी है कि क्या यह युद्ध अब अपने अंत के करीब पहुंच गया है या फिर यह एक और जटिल मोड़ लेगा।

ट्रंप का कहना है कि वे रूस और यूक्रेन, दोनों के नेताओं से सीधे संवाद के लिए एक विशेष राजनयिक टीम भेज रहे हैं। उन्होंने घोषणा की कि दूत स्टीव विटकॉफ को मॉस्को में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से और सेना सचिव डैन ड्रिस्कॉल को यूक्रेन के रणनीतिक अधिकारियों से बातचीत के लिए भेजा जा रहा है। यह कदम अमेरिका के पिछले प्रयासों से कहीं ज्यादा मजबूत, केंद्रीकृत और आक्रामक माना जा रहा है।
ट्रंप ने संकेत दिया कि यदि वार्ता में सकारात्मक प्रगति जारी रही, तो वे स्वयं पुतिन और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से आमने-सामने मुलाकात करने पर विचार कर सकते हैं। यह संभावना आगे चलकर शांति के नए अध्याय की शुरुआत बन सकती है, क्योंकि संकट की घड़ी में बड़े नेताओं की सीधी बातचीत विश्व राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाती रही है।
ट्रंप प्रशासन में तेज हुआ वार्ता चक्र
अमेरिका में हर बड़े कदम के पीछे एक मजबूत प्रशासनिक समर्थन होता है। राष्ट्रपति ने यह स्पष्ट किया कि उनके साथ उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, विदेश मंत्री मार्को रुबियो, युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ और व्हाइट हाउस की चीफ ऑफ स्टाफ सूज़ी वाइल्स पूरी स्थिति की निगरानी कर रहे हैं।
सेना सचिव ड्रिस्कॉल पहले ही अबू धाबी में रूसी अधिकारियों से महत्वपूर्ण बातचीत कर चुके हैं। बताया गया कि उन्होंने रात तक चली लंबी बैठकों में रूस से कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर बात की, जिनमें संघर्षविराम की व्यवहारिकता, विवादित क्षेत्रों की सुरक्षा और युद्ध के बाद पुनर्निर्माण से जुड़े पहलू भी शामिल हैं।
अमेरिकी रक्षा विभाग की ओर से लेफ्टिनेंट कर्नल जेफ टोलबर्ट ने बताया कि वार्ता सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही है और ट्रंप प्रशासन उम्मीद कर रहा है कि यह कोशिश जल्द किसी सार्थक मोड़ पर पहुंचेगी।
लेकिन इसी बीच रूस ने कीव पर रात में कई मिसाइलें दागीं, जिनमें कम से कम सात लोगों की मौत हुई, जबकि यूक्रेन के प्रतिआक्रमण में दक्षिणी रूस में तीन लोगों की मौत की खबर आई। यह घटनाएं बताती हैं कि सीमाओं पर तनाव अभी भी तेज है और किसी भी तरह का समाधान हथियारों की आवाज़ के बीच ढूंढना बेहद चुनौतीपूर्ण होगा।
ट्रंप की योजना पर यूरोप की चिंता बढ़ी
ट्रंप की शांति योजना ने यूरोपीय देशों की धड़कनें तेज कर दी हैं। वे आशंकित हैं कि कहीं यह योजना रूस के हितों के ज्यादा करीब न हो। दरअसल, पिछले सप्ताह जिस प्रारंभिक योजना के लीक होने की खबर आई, उसमें ऐसी संभावनाएं सामने आईं कि यदि यूक्रेन कुछ शर्तें मान ले, तो रूस युद्ध विराम पर सहमत हो सकता है।
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इसे एक निर्णायक समय बताया। उन्होंने कहा कि संघर्ष को रोकने के लिए अब तेज और साहसिक कूटनीतिक कदमों की आवश्यकता है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री केअर स्टॉर्मर ने भी इसे सकारात्मक बताया, लेकिन दोनों देशों ने एक सुर में कहा कि यूक्रेन की संप्रभुता किसी भी शांति समझौते की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिला रहेगी।
यूक्रेन के प्रतिनिधि ओलेक्ज़ेंडर बेव्ज ने हालांकि साफ कहा कि किसी भी अंतिम सहमति की बात अभी जल्दबाजी होगी। यूक्रेन का रुख है कि कोई भी समझौता ऐसा नहीं होना चाहिए जिसमें उसकी जमीन या नाटो सदस्यता की संभावनाओं पर समझौता किया जाए।
यही स्ट्रेटेजिक टकराव इस वार्ता प्रक्रिया की सबसे बड़ी चुनौती है।
रूस की रणनीति, यूक्रेन का दबाव और अमेरिका की दिलचस्पी
रूस शुरुआत से ही चाहता है कि यूक्रेन पूर्वी इलाकों, खासकर डोनबास जैसे क्षेत्रों पर रूस के प्रभाव को स्वीकार करे। दूसरी ओर यूक्रेन किसी भी तरह की रियायत देने को तैयार नहीं है।
युद्ध के दौरान रूस ने अपनी सैन्य ताकत दिखाई, लेकिन यूक्रेन को पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका से मिला समर्थन उसकी हिम्मत बनाए हुए है। इसी समर्थन ने यूक्रेन को भारी क्षति सहने के बावजूद संघर्ष जारी रखने के लिए प्रेरित किया।
अमेरिका के लिए यह युद्ध केवल यूरोप का मुद्दा नहीं है। यहां दो बड़ी रणनीतिक चिंताएं हैं।
पहली यह कि रूस को रोक कर अमेरिका यूरोप को भरोसा दिला सकता है कि वह नाटो की केंद्रीय शक्ति है।
दूसरी यह कि चीन और रूस की बढ़ती नजदीकियों के दौर में इस युद्ध को नियंत्रित करना अमेरिका की वैश्विक शक्ति का सबूत भी बनेगा।
ट्रंप के लिए यह मामला राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। वे अपनी नेतृत्व क्षमता को मजबूत दिखाना चाहते हैं, खासकर तब जब देश के भीतर कई मुद्दों पर उनसे कड़े सवाल पूछे जा रहे हैं। यदि वे इस युद्ध को रोकने का श्रेय अपने नाम कर पाते हैं, तो यह उनकी विदेश नीति का सबसे बड़ा उपलब्धि बन सकती है।
युद्ध का मानवीय पहलू, जिससे दुनिया की आंखें नम
तीन साल से चल रहे संघर्ष ने लाखों लोगों की जिंदगी उथल-पुथल कर दी है। लाखों यूक्रेनी नागरिक अपनी जमीन छोड़कर भागने को मजबूर हुए। हजारों बच्चों ने अपने माता-पिता खो दिए और अनेक परिवार हमेशा के लिए बिखर चुके हैं।
रूस और यूक्रेन दोनों ही देशों की अर्थव्यवस्था युद्ध के बोझ तले दबती जा रही है। दुनिया भर में अनाज के दाम, ऊर्जा की कीमतें और आयात-निर्यात के पैटर्न बदल गए हैं। यह युद्ध केवल दो देशों की लड़ाई नहीं रहा, बल्कि यह पूरी दुनिया को प्रभावित करने वाला एक वैश्विक संकट बन चुका है।
ट्रंप के प्रयासों से शायद इस दुःखद कहानी का अंत करीब आए। हालांकि यह अभी कहना मुश्किल है कि दोनों देश किसी अंतिम समझौते पर पहुंच पाएंगे या नहीं।
वार्ता आगे किस दिशा में जा सकती है
कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि रूस और यूक्रेन इस योजना पर बातचीत जारी रखते हैं, तो निकट भविष्य में संघर्षविराम की घोषणा संभव हो सकती है। लेकिन यह तभी होगा जब दोनों पक्ष अपनी कठोर शर्तों में थोड़ी नरमी दिखाएं।
यूक्रेन के लिए संप्रभुता सबसे बड़ी प्राथमिकता है, जबकि रूस चाहता है कि उसकी क्षेत्रीय सुरक्षा सुनिश्चित हो। अमेरिका इन दोनों के बीच पुल का काम करना चाहता है।
यदि यह योजना सफल होती है, तो आने वाले वर्षों में इसे आधुनिक इतिहास की सबसे प्रभावशाली शांति पहल के रूप में देखा जाएगा।
