देशभर में मशहूर ही-मैन के नाम से पहचाने जाने वाले अदाकार धर्मेंद्र के जाने के बाद उनकी फिल्मों, उनके अभिनय और उनके बड़े दिल के किस्सों की ढेरों कहानियाँ बाहर आईं। लेकिन इन सबके बीच एक ऐसी कहानी सामने आई, जिसने लोगों को भावुक कर दिया। यह कहानी किसी फिल्मी सेट, किसी समारोह या किसी बड़े आयोजन की नहीं, बल्कि भोपाल की गलियों में मिलने वाली एक साधारण सी मिठाई, गजक, और उससे जुड़े एक गहरे रिश्ते की है।

यह कहानी एक ऐसे रिश्ते की है जिसे कभी अखबारों की सुर्खियों की जरूरत नहीं पड़ी। यह वह रिश्ता था जो बिना दिखावे के, बिना किसी शोर के, एक साधारण मनुष्य की तरह धड़कता और चमकता रहा। धर्मेंद्र और भोपाल के वरिष्ठ सरकारी अधिकारी सुनील मिश्रा के बीच पनपे इस अनोखे संबंध ने यह साबित कर दिया कि दोस्ती का असली रंग वही है जिसे देखने के लिए प्रकाश की जरूरत नहीं होती।
वो मुलाकात जिसने बदल दिया दोनों परिवारों की जिंदगी का एक पूरा अध्याय
करीब बाईस वर्ष पहले, जब सुनील मिश्रा एक लेखन के काम से जुड़ी जिम्मेदारी निभा रहे थे, उसी दौरान उनकी मुलाकात हुई धर्मेंद्र से। शायद उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि यह मुलाकात उनके जीवन में इतनी जगह बना लेगी। उस मुलाकात ने धीरे-धीरे एक ऐसा रिश्ता तैयार किया जो पेशेवर दायरे से निकलकर घर-परिवार की गर्माहट तक पहुंच गया।
सुनील मिश्रा के बेटे सुमुख बताते हैं कि पिता धर्मेंद्र को बेहद प्यार से पापाजी कहकर बुलाते थे। उनके बीच उम्र का अंतर जरूर था, पर रिश्ते की मिठास बिल्कुल ऐसे थी जैसे किसी बड़े और छोटे भाई के बीच होती है। दोनों के बीच विश्वास, सम्मान और अपनापन इतनी गहराई से बसा था कि कोई यह जान ही नहीं सकता था कि यह रिश्ता किसी औपचारिक मुलाकात से शुरू हुआ था।
धरम जी का भोपाल से प्रेम और गजक के स्वाद से जुड़ी मिठास
इस रिश्ते की सबसे खास बात यह थी कि इसके केंद्र में थी भोपाल की वह प्रख्यात गजक जो सर्दियों में लोगों के दिलों को गर्माहट देती है। धर्मेंद्र इस गजक के इतने बड़े शौकीन थे कि उनके जन्मदिन का जश्न तब तक पूरा नहीं होता था जब तक उन्हें भोपाल की असली, देसी स्वाद वाली गजक न मिल जाए।
धीरे-धीरे यह एक परंपरा बन गई। सुनील मिश्रा सालों तक हर जन्मदिन पर धर्मेंद्र से मिलने जाते और उनके लिए वही खास गजक लेकर जाते जिसे वह बेहद पसंद करते थे। चाहे धर्मेंद्र उस समय मुंबई में हों, पंजाब में हों या किसी दूसरे शहर में शूटिंग के लिए गए हों, सुनील मिश्रा हर वर्ष उनके दरवाजे पर पहुंचते, अपने हाथ में वही भोपाली मिठास लिए हुए।
सुमुख बताते हैं कि यह रस्म सिर्फ एक औपचारिकता नहीं थी। यह ऐसा एहसास था जिसमें कहीं न कहीं बचपन जैसी मासूमियत, अपनापन और बिना बोले समझ आने वाला स्नेह शामिल था।
धरम जी और सुनील मिश्रा के बीच का मानवीय रिश्ता
यह रिश्ता दो बड़ी हस्तियों के बीच का नहीं था। यह रिश्ता दो ऐसे इंसानों का था जिन्होंने लोकप्रियता, पद, प्रसिद्धि और सामाजिक पहचान से ऊपर उठकर एक-दूसरे को महसूस किया। न धर्मेंद्र ने कभी अपने स्टारडम को इस रिश्ते में हावी होने दिया और न सुनील मिश्रा ने अपने प्रशासनिक ओहदे के बीच कोई दूरी पैदा होने दी।
सालों तक यह संबंध एक छोटे परिवार के दायरे में पनपता रहा। मीडिया में कभी चर्चा नहीं हुई। कोई बड़ी तस्वीरें, कोई बयान नहीं। बस एक मिठाई, कुछ प्यारी बातें और सम्मान से भरे मुलाकात के पल।
जब भी सुनील मिश्रा अपनी पत्नी और परिवार सहित धर्मेंद्र से मिलने जाते, धरम जी उनके परिवार के लिए मिठाई, खिलौने या छोटे उपहार भेजते रहते। यह संबंध दोनों परिवारों के बीच भावनात्मक पुल बन चुका था।
कोविड की त्रासदी और एक रिश्ते की दिल तोड़ देने वाली खामोशी
2021 में जब कोविड की दूसरी लहर देशभर में अपनी भयावहता फैला रही थी, उसी समय सुनील मिश्रा का अचानक निधन हो गया। यह घटना सिर्फ उनके परिवार के लिए ही नहीं बल्कि धर्मेंद्र के लिए भी गहरा सदमा लेकर आई।
उनका जाना उस परंपरा को तोड़ गया जो वर्षों से बिना रोके चलती आ रही थी। वह परंपरा जो सिर्फ एक गजक तक सीमित नहीं थी, बल्कि उस भावुक जुड़ाव की थी जिसमें दोस्ती का सच्चा अर्थ बसा था।
सुमुख बताते हैं कि पिता के निधन के बाद भी उन्हें धर्मेंद्र से वह वही अपनापन महसूस होता रहा। वह कहते हैं कि जब उनके पिता चले गए तो उन्हें लगा जैसे परिवार का एक बड़ा सदस्य उन्हें छोड़कर चला गया। उन्हें यह भी लगा कि वह धरम जी के लिए सिर्फ एक दोस्त नहीं रहे, बल्कि किसी अपने जैसे बन चुके थे।
धर्मेंद्र के निधन के साथ ही टूट गया एक और भावनात्मक धागा
जब हाल ही में धर्मेंद्र का निधन हुआ, तब इस रिश्ते को लेकर आखिरी बार एक भावुक याद बाहर आई। यह कहानी दुनिया को यह बताने के लिए पर्याप्त थी कि बड़े लोग सिर्फ अपनी महानता से नहीं, बल्कि अपने संबंधों की सरलता से याद किए जाते हैं।
धर्मेंद्र के जाने से लाखों प्रशंसकों का दिल टूटा, लेकिन उन परिवारों का दर्द और भी गहरा था जिन्होंने उन्हें सिर्फ पर्दे का हीरो नहीं, बल्कि अपने जीवन का हिस्सा माना था। सुमुख और उनका परिवार भी इन्हीं में से एक है।
एक अनकहा अध्याय जो हमेशा स्मृति में जीवित रहेगा
इस पूरी कहानी में सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह एक ऐसा प्रसंग है जो प्रसिद्धि के शोर से दूर था। इस पर कभी कैमरों की रोशनी नहीं पड़ी। इस पर किसी मंच पर चर्चा नहीं हुई। लेकिन इसके भीतर जो भावनाएँ थीं, वे इतनी हृदयस्पर्शी थीं कि यह जीवनभर याद किए जाने के लिए पर्याप्त है।
धर्मेंद्र और सुनील मिश्रा का यह रिश्ता यह सिखाता है कि सच्ची दोस्ती न उम्र देखती है, न धर्म, न पद और न प्रसिद्धि। वह सिर्फ दिल देखती है। और जब दो दिलों के बीच यह रिश्ता जुड़ जाता है, तो उसे निभाने की रस्में अपने आप बनती चली जाती हैं।
इस कहानी में भोपाल की गजक सिर्फ एक मिठाई नहीं रही, बल्कि वह माध्यम बन गई जिसके ज़रिये दो परिवारों के बीच एक भावनात्मक पुल बनता चला गया।
धर्मेंद्र के चाहने वालों के लिए यह कहानी शायद उनकी यादों का एक और सुंदर अध्याय बनकर हमेशा जीवित रहेगी।
