भोपाल शहर की शैक्षणिक दुनिया में इस समय एक नई ऊर्जा और दिशा महसूस की जा रही है। उच्च शिक्षा उत्कृष्टता संस्थान, जिसे लोग IEHE के नाम से भी जानते हैं, ने कृषि शिक्षा के क्षेत्र में एक ऐसा कदम उठाया है, जिसे न केवल छात्रों के भविष्य को नई रोशनी देगा बल्कि प्रदेश में व्यवहारिक कृषि अनुसंधान की दिशा भी बदल देगा। यह पहल केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि कृषि शिक्षा को जमीन से जोड़ने और खेतों की असल परिस्थितियों को छात्रों तक पहुँचाने का एक जीवंत प्रयास है।

कृषि शिक्षा लंबे समय से देश में एक ऐसे मोड़ पर खड़ी थी जहाँ सिद्धांत तो बहुत पढ़ाया जाता था, लेकिन व्यवहारिक ज्ञान की कमी अक्सर छात्रों को वास्तविक चुनौतियों के सामने असहाय बना देती थी। खेत की मिट्टी का तापमान कैसा होता है, फसल किस चरण में कैसी दिखती है, सिंचाई व्यवस्था की कौन-सी विधि किस परिस्थिति में उपयुक्त रहती है, खरपतवार नियंत्रण के व्यावहारिक तरीके क्या हैं, और खेती के दौरान मौसम के उतार-चढ़ाव से कैसे निपटा जाए, ये सब बातें किताबों में पढ़ी जा सकती हैं लेकिन इनका अनुभव तभी मिलता है जब छात्र खेत की मिट्टी में कदम रखता है। यही वह अंतर है जिसे IEHE भोपाल ने समझा और उसे दूर करने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ली।
कृषि विभाग के छात्रों को खेतों से जुड़ने और आधुनिक कृषि तकनीकों को व्यवहारिक रूप में सीखने का अवसर प्रदान करने के लिए संस्थान ने कई स्तरों पर योजनाएँ तैयार कीं। इस पूरे प्रयास को दिशा मिली उच्च शिक्षा मंत्री इन्दर सिंह परमार के स्पष्ट निर्देशों से, जिन्होंने प्रदेश में शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने के लिए विभिन्न विभागों को व्यवहारिक शिक्षा को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित किया। उच्च शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव अनुपम राजन ने इस पहल को प्रशासनिक मार्गदर्शन प्रदान किया। वहीं संस्थान के संचालक डॉ. प्रज्ञेश कुमार अग्रवाल ने इसे जमीनी रूप देने के लिए निरंतर प्रयास किए।
कृषि छात्रों को खेतों से जोड़ने के लिए संस्थान ने दो विस्तृत प्रस्ताव आमंत्रित किए। इन प्रस्तावों के आधार पर इस बात का मूल्यांकन किया गया कि कौन सा स्थान छात्रों के लिए उपयुक्त होगा। यह सुनिश्चित करना आवश्यक था कि खेत न केवल सुरक्षित हों, बल्कि वहाँ ऐसी फसलें भी मौजूद हों जिनसे छात्र वास्तविक कृषि चक्र को समझ सकें। इसके अलावा सिंचाई सुविधाएँ, मिट्टी की गुणवत्ता, पहुंचने की दूरी और प्रशिक्षण देने के लिए आवश्यक क्षेत्र जैसी बातें भी ध्यानपूर्वक जांची गईं।
प्रस्तावों के परीक्षण में यह सामने आया कि वास्तविक अनुभव प्राप्त करने के लिए छात्रों को ऐसे खेतों तक पहुँचाना जरूरी है जहाँ विभिन्न प्रकार की फसलें एक साथ उगाई जा रही हों। इससे छात्रों को बहुआयामी अनुभव मिलेगा, जैसे रबी और खरीफ की फसलों के बीच अंतर को समझना, विभिन्न मौसमों में मिट्टी के स्वभाव को पहचानना, तथा अलग-अलग फसलों की सिंचाई आवश्यकताओं को व्यवहारिक रूप से देखना।
IEHE की यह पहल केवल खेतों में जाकर देख लेने तक सीमित नहीं है। योजनाएँ इस तरह बनाई गई हैं कि छात्र कृषि वैज्ञानिकों और अनुभवी किसानों के साथ सीधे संवाद कर सकें। यह संवाद छात्रों को वास्तविक समस्याओं और उनके समाधान को समझने का अवसर देगा, जो किसी भी कक्षा में संभव नहीं होता।
यह प्रशिक्षण छात्रों के लिए कई मायनों में महत्वपूर्ण होगा। सबसे पहले यह उनकी समझ को व्यापक बनाएगा। किताबों में पढ़ाया गया हर सिद्धांत तब अधिक स्पष्ट हो जाता है जब छात्र उसे वास्तविक परिस्थितियों में होता हुआ देखता है। जैसे कि सिंचाई विधियों में स्प्रिंकलर और ड्रिप के उपयोग के लाभ व हानि, फसल रोगों के नियंत्रण के लिए कौन-सी दवाओं का प्रयोग कैसे और कब किया जाए, पौधों के लिए आवश्यक पोषक तत्वों की कमी के लक्षण कैसे पहचाने जाएँ, ये सब बातें केवल खेत पर जाकर ही सीखने योग्य हैं।
दूसरे, इस पहल से छात्रों में नवाचार की क्षमता बढ़ेगी। जब वे पारंपरिक तरीकों को आधुनिक तकनीकों के साथ मिलते हुए देखेंगे, तो वे स्वयं नए समाधान खोजने के लिए प्रेरित होंगे। भविष्य के कृषि विशेषज्ञों को न सिर्फ खेती समझनी है बल्कि बदलते समय के साथ आने वाली चुनौतियों के लिए समाधान भी तैयार करना है। यह पहल उन्हें इसी दिशा में प्रेरित करेगी।
तीसरे, व्यवहारिक प्रशिक्षण से छात्रों की रोजगार क्षमता भी बढ़ेगी। कृषि क्षेत्र में काम करने वाली कंपनियाँ, शोध संगठन और सरकारी विभाग, उन छात्रों को प्राथमिकता देते हैं जिन्हें खेत का वास्तविक अनुभव हो, जो कृषि उत्पादन की जमीनी हकीकत को समझते हों। ऐसे छात्र बड़ी आसानी से फसल विश्लेषक, कृषि सलाहकार, फार्म मैनेजर, रिसर्च असिस्टेंट और कृषि तकनीक विशेषज्ञ जैसे पदों पर नियुक्ति पा सकते हैं।
इस पहल के तहत छात्रों को सप्ताह के निश्चित दिनों में खेतों का भ्रमण कराया जाएगा। हर सत्र के लिए विशेषज्ञों की टीम उपलब्ध रहेगी जो छात्रों को प्रशिक्षण देगी। खेतों में मौजूद विविध फसलों के आधार पर अलग-अलग मॉड्यूल तैयार किए जाएँगे ताकि छात्र चरणबद्ध तरीके से सीख सकें।
इस पूरी प्रक्रिया में सुरक्षा को भी प्राथमिकता दी गई है। यह सुनिश्चित किया गया है कि प्रशिक्षण स्थल तक पहुँचने का मार्ग सुरक्षित हो, खेतों के आसपास आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध हों और प्रशिक्षक हर समय छात्रों के साथ मौजूद रहें। इसके अलावा मौसम की स्थिति को देखते हुए प्रशिक्षण सत्रों का समय निर्धारण किया गया है ताकि छात्रों को असुविधा न हो।
भोपाल में कृषि शिक्षा के क्षेत्र में यह पहली बार हो रहा है कि छात्रों को इतना व्यापक और गहन अनुभव प्रदान करने की तैयारी की गई है। प्रदेश में कृषि शिक्षा की वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए यह पहल एक मील का पत्थर साबित हो सकती है। यह न केवल छात्रों को बेहतर बनाएगी बल्कि प्रदेश की कृषि प्रणाली को भी मजबूत करेगी क्योंकि प्रशिक्षित और व्यवहारिक ज्ञान से समृद्ध युवा भविष्य के किसान और कृषि वैज्ञानिक बनकर उभरेंगे।
IEHE की यह पहल आने वाले समय में प्रदेश के अन्य कॉलेजों और संस्थानों के लिए भी प्रेरणादायक होगी। यह उम्मीद की जा रही है कि ऐसे प्रयास शिक्षा को किताबों की सीमा से बाहर निकालकर उसे वास्तविक अनुभवों और वैज्ञानिक तरीकों से जोड़ेंगे, जिससे छात्र अधिक आत्मनिर्भर और सक्षम बनेंगे।
कृषि शिक्षा केवल एक डिग्री प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह देश की खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और वैज्ञानिक प्रगति से जुड़ी हुई है। जब युवा छात्र खेतों में जाकर मिट्टी की खुशबू महसूस करेंगे, पौधों की वृद्धि के चरणों को अपनी आँखों से देखेंगे, और एक किसान की दैनिक चुनौतियों को समझेंगे, तभी कृषि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा।
IEHE भोपाल ने इस उद्देश्य को समझा और उसी के अनुरूप कदम उठाए। आज यह पहल न केवल छात्रों के लिए बल्कि पूरे शिक्षा जगत के लिए प्रेरणा बन गई है। आने वाले वर्षों में यह देखा जाएगा कि इस प्रशिक्षण का प्रदेश की कृषि पर सकारात्मक प्रभाव कैसे पड़ता है, लेकिन इतना तय है कि यह पहल एक नई शुरुआत है, एक बेहतर भविष्य की दिशा में उठाया गया महत्वपूर्ण कदम।
