दुनिया भर में इस समय कई भू-राजनीतिक तनाव अपनी चरम अवस्था में हैं, लेकिन गाजा संकट उन सभी राजनीतिक उलझनों से कहीं अधिक संवेदनशील और जटिल रूप ले चुका है। इस संघर्ष में अब पाकिस्तान ने अपनी भूमिका को नए स्वरूप में ढालने का प्रयास किया है। आर्थिक रूप से टूटे और राजनीतिक रूप से दबाव में झूलते पाकिस्तान ने यह घोषणा कर दुनिया के सामने एक नया संकेत दिया है कि वह अब सिर्फ दर्शक बनकर नहीं बैठना चाहता बल्कि वह इस संघर्ष को अपने पक्ष में उपयोग करने का प्रयास भी करेगा। उपप्रधानमंत्री इशाक डार की घोषणा ने अचानक से इस संकट में पाकिस्तान की उपस्थिति को प्रमुखता से उभारा है।

आर्थिक बदहाली और भू-राजनीतिक अवसर: पाकिस्तान ने क्यों चुना यह रास्ता
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था पिछले कई वर्षों से संकटों के कठोर दौर से गुजर रही है। विदेशी मुद्रा भंडार लगातार कम हो रहा है, महंगाई आसमान छू रही है, ऊर्जा संकट इतना गंभीर है कि आम जनता बुनियादी जरूरतों को भी पूरा करने के लिए संघर्ष कर रही है। IMF के बेलआउट पैकेज पर निर्भर पाकिस्तान को हर किस्त से पहले नए राजनीतिक और आर्थिक दबावों से गुजरना पड़ रहा है। ऐसे हालात में गाजा संकट पाकिस्तान को एक अवसर की तरह दिखाई दे रहा है।
इस संकट ने पाकिस्तान के सामने एक नई कूटनीतिक खिड़की खोली है, जिसके माध्यम से वह अपने पुराने सहयोगियों जैसे सऊदी अरब, कतर और UAE से आर्थिक राहत हासिल करने की उम्मीद कर रहा है। इन देशों को एक ऐसे मुस्लिम देश की आवश्यकता है जो गाजा संकट में सक्षम, तैयार और राजनीतिक रूप से उपलब्ध हो। पाकिस्तान इस भूमिका में खुद को सबसे अनुकूल दिखाने की कोशिश कर रहा है।
कैसे तय हुआ सैनिक भेजने का प्रारूप: मिस्र में हुई गुप्त वार्ता
सूत्रों के मुताबिक इस निर्णय के पीछे एक गहरी अंतरराष्ट्रीय वार्ता का दौर चला, जो मिस्र में हुई महत्वपूर्ण बैठकों के दौरान आकार लेने लगा। बताया जाता है कि पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल असीम मुनीर की मुलाकात वहां CIA अधिकारियों और इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के प्रतिनिधियों से भी हुई। इस मुलाकात के बाद यह स्पष्ट हुआ कि यदि अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा बल गाजा में तैनात किए जाते हैं, तो पाकिस्तान इसका हिस्सा बनने के लिए तैयार रहेगा।
इस बैठक ने गाजा की जमीन पर पाकिस्तान की सैन्य भूमिका का खाका खींच दिया। यह भूमिका सीधे हमास के खिलाफ नहीं दिखाई जाएगी, बल्कि एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा तैयारी के रूप में प्रस्तुत की जाएगी ताकि पाकिस्तान पर किसी धार्मिक या राजनीतिक विरोध का आरोप न लगे।
‘सैनिकों के बदले सिलेंडर और डॉलर’ का फॉर्मूला क्या है
यह फॉर्मूला पाकिस्तान की आर्थिक रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र है। सरल भाषा में कहें तो पाकिस्तान अपनी सैन्य उपस्थिति को आर्थिक लाभ के बदले एक सौदे के रूप में उपयोग कर रहा है।
सिलेंडर का अर्थ है ऊर्जा संसाधन:
गैस, LNG और कच्चा तेल पाकिस्तान के लिए जीवनरेखा हैं। ऊर्जा संकट के कारण देश में उद्योग बंद होने के कगार पर हैं और घरेलू उपयोगकर्ता महंगे बिलों से त्रस्त हैं। अगर अरब देश पाकिस्तान को सस्ती गैस और कच्चा तेल क्रेडिट या आसान भुगतान शर्तों पर देते हैं, तो यह उसके लिए आर्थिक राहत का सबसे बड़ा अवसर होगा।
डॉलर का अर्थ है नकद सहायता, निवेश और IMF की मंजूरी:
IMF किसी भी बेलआउट को तब तक मंजूरी नहीं देता जब तक सऊदी अरब और UAE जैसे सहयोगी देश गारंटी नहीं देते। पाकिस्तान को डॉलर चाहिए, और अरब देशों को गाजा के मोर्चे पर एक ऐसा देश चाहिए जो उनके लिए ‘पॉलिटिकल फ्रंटलाइन’ बन सके। यह सौदा दोनों पक्षों की ज़रूरत पूरी कर सकता है।
क्यों अरब देश खुद सेना नहीं भेजना चाहते
गाजा का मुद्दा अत्यंत संवेदनशील है। अरब देशों के भीतर जनता में गुस्सा है लेकिन सरकारें सैन्य हस्तक्षेप से बच रही हैं। इसके तीन प्रमुख कारण हैं।
पहला कारण अमेरिका का दबाव है। अमेरिका अरब देशों को यह सलाह नहीं देता कि वे गाजा में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप करें, क्योंकि इससे पश्चिम एशिया की स्थिति और बिगड़ सकती है।
दूसरा कारण घरेलू राजनीति है। अरब राष्ट्र अपनी जनता को यह दिखाने की जरूरत महसूस करते हैं कि वे गाजा संकट को लेकर संवेदनशील हैं लेकिन वे युद्ध में सीधे उतरकर अपने देश के संसाधनों और सैनिकों को जोखिम में नहीं डालना चाहते।
तीसरा कारण ईरान का बढ़ता प्रभाव है। ईरान पहले से ही हमास और हिज्बुल्लाह जैसे समूहों के प्रति समर्थन दिखाता है। सुन्नी अरब यह नहीं चाहते कि ईरान अकेला इस नैरेटिव पर हावी हो जाए। पाकिस्तान सुन्नी देश है और यह संतुलन बनाने में मदद कर सकता है।
क्या यह पाकिस्तान के लिए राजनीतिक पुनरुत्थान का अवसर है
पाकिस्तान लंबे समय से वैश्विक मंच पर संघर्ष कर रहा है। उसकी अर्थव्यवस्था, विदेश नीति और सुरक्षा ढांचे में लगातार चुनौतियां देखी जा रही हैं। ऐसे समय में गाजा संकट उसके लिए एक राजनीतिक अवसर प्रस्तुत कर रहा है जहां वह खुद को एक महत्वपूर्ण मुस्लिम शक्ति के रूप में दिखा सकता है।
इसके दो प्रमुख लाभ हो सकते हैं। पहला, अरब देशों से आर्थिक सहायता और ऊर्जा आपूर्ति। दूसरा, अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी प्रासंगिकता बढ़ाना और एक बार फिर मुस्लिम दुनिया में नेतृत्व की भूमिका हासिल करना।
लेकिन भारत के लिए यह सौदा क्यों चिंता का विषय है
भारत और पाकिस्तान के संबंध दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं। सीमा पर समय-समय पर टकराव की स्थिति रहती है। अगर पाकिस्तान को अरब देशों से आर्थिक और ऊर्जा सहायता मिलती है, तो उसकी सैन्य क्षमता में बढ़ोतरी होगी। वह अपनी सेना को नए हथियारों, बुनियादी ढांचे और प्रशिक्षण में निवेश कर सकेगा।
दूसरी चिंता यह है कि आर्थिक रूप से स्थिर होता पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे पर अधिक आक्रामक रुख अपना सकता है। यह भारत के लिए सुरक्षा की दृष्टि से नया अध्याय खोल सकता है।
तीसरा पहलू धार्मिक नैरेटिव से जुड़ा है। अरब देशों का खुला समर्थन मिलने पर पाकिस्तान दुनिया के मुस्लिम देशों में अपने प्रभाव को मजबूत करने की कोशिश करेगा, जिससे भारत के खिलाफ उसकी अंतरराष्ट्रीय रणनीति सशक्त हो सकती है।
