भोपाल शहर में ‘हर किसी के लिए घर’ योजना को लेकर पिछले कई वर्षों से बड़ी उम्मीदें जुड़ी हुई थीं। केंद्रीय सरकार के हाउस फॉर ऑल मिशन के तहत नगर निगम ने 21 प्रोजेक्ट शुरू किए थे, जिनमें कुल 11,457 फ्लैट्स बनाए जाने थे। नौ साल बीत जाने के बाद भी केवल 6573 फ्लैट्स ही बनकर तैयार हो पाए हैं। इस देरी ने हजारों हितग्राहियों के जीवन में आर्थिक और मानसिक तनाव पैदा कर दिया है।

नगर निगम की जानकारी के अनुसार 40 फीसदी प्रोजेक्ट्स काम शुरू होने के बाद अटक कर बंद हो गए हैं। जबकि जो प्रोजेक्ट चल रहे हैं, वे बेहद धीमे गति से आगे बढ़ रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि योजना के लक्ष्य और वास्तविकता के बीच खाई काफी गहरी है।
2016 से चल रहे प्रोजेक्ट्स की स्थिति
भोपाल में इन परियोजनाओं की शुरुआत 2016 से हुई थी। इन नौ वर्षों में केवल पांच प्रोजेक्ट ही पूरी तरह बनकर तैयार हो पाए हैं। हितग्राही अपने घर पाने की राह में भटक रहे हैं। उन्हें न केवल किराए का बोझ सहना पड़ रहा है, बल्कि उन फ्लैट्स की बैंक लोन की किस्त भी नियमित रूप से चुकानी पड़ रही है।
अभी हाउसिंग प्रोजेक्ट्स की जिम्मेदारी अपर आयुक्त तन्मय शर्मा और अधीक्षण यंत्री उदित गर्ग के पास है। उनके द्वारा परियोजनाओं की साप्ताहिक समीक्षा की जा रही है, लेकिन गति में सुधार नहीं दिखाई दे रहा।
प्रमुख प्रोजेक्ट्स का विश्लेषण
12 नंबर बस स्टॉप प्रोजेक्ट: मई 2017 में शुरू हुआ, कुल 1224 फ्लैट्स निर्धारित थे। लागत लगभग 146 करोड़ थी। काम का प्रतिशत 87% है। इसे 18 महीने में पूरा करने का लक्ष्य था, लेकिन ठेकेदार द्वारा बीच में काम छोड़ देने के कारण यह अब सात साल बाद भी अधूरा है।
बागमुगालिया प्रोजेक्ट: फरवरी 2019 से चल रहा है। कुल 768 फ्लैट्स के निर्माण का लक्ष्य था। लागत लगभग 210 करोड़। कार्य 90% पूरा हो चुका है। इसे 24 महीने में पूरा करने का लक्ष्य था, लेकिन यह अभी भी विलंबित है। रेरा की अनुमति भी प्राप्त नहीं हुई।
गंगा नगर/श्याम नगर प्रोजेक्ट: 2017 से चल रहा है। 792 फ्लैट्स का निर्माण होना था। लागत लगभग 190 करोड़। कार्य 76% पूरा है। 18 महीने में पूर्ण होने वाला यह प्रोजेक्ट अब भी अधूरा है।
राहुल नगर-2: 2022 से शुरू, कुल 240 फ्लैट्स। लागत लगभग 125 करोड़। कार्य 41% पूरा हुआ। इसे 24 महीने में पूरा होना था, लेकिन प्रगति बहुत धीमी है। हालांकि, राहुल नगर-1 के 336 फ्लैट तैयार हो चुके हैं।
अन्य प्रोजेक्ट्स: बैरागढ़ में 60 फ्लैट्स का 95% काम, नीलबड़ में 60 फ्लैट्स का 75%, रासलाखेड़ी में 60 फ्लैट्स का 80% काम पूरा है।
इन विलंबित प्रोजेक्ट्स के कारण हितग्राही परेशान हैं। उनके लिए घर न मिलने के कारण किराया, लोन किस्त और रोजमर्रा के खर्चों का दबाव लगातार बढ़ रहा है।
नगर निगम की भूमिका और जिम्मेदारी
निगम की ओर से दावा किया गया है कि सभी प्रोजेक्ट्स की साप्ताहिक समीक्षा होती है। अधिकारी हर प्रोजेक्ट की प्रगति की निगरानी कर रहे हैं। हालांकि, वास्तविकता यह है कि प्रोजेक्ट्स की धीमी प्रगति और ठेकेदारों की लापरवाही ने योजना की प्रभावशीलता को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
अधिकारियों का कहना है कि जल्द ही सभी प्रोजेक्ट्स को गति दी जाएगी और हितग्राहियों को उनके फ्लैट्स उपलब्ध कराए जाएंगे। लेकिन पिछले वर्षों के अनुभव ने जनता में विश्वास की कमी पैदा कर दी है।
हितग्राहियों की समस्याएँ और सामाजिक प्रभाव
लंबे समय से फ्लैट न मिलने के कारण लोग आर्थिक और मानसिक दबाव में हैं। किराया और लोन किस्त एक साथ चुकाना उनके लिए भारी बोझ बन गया है। कई हितग्राही स्थानीय प्रशासन और अधिकारियों के चक्कर काटते-खाते थक चुके हैं।
यह समस्या केवल व्यक्तिगत स्तर पर नहीं है, बल्कि शहर की सामाजिक और आर्थिक स्थिरता को भी प्रभावित करती है। लोग अक्सर शिकायत करते हैं कि योजना का वास्तविक लाभ उन्हें नहीं मिल पा रहा, जबकि सरकारी डेटा में उनका नाम दर्ज है।
समस्या का समाधान और भविष्य की राह
विशेषज्ञ सुझाव देते हैं कि ठेकेदारों के चयन और अनुबंध प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ानी होगी। प्रोजेक्ट प्रगति की वास्तविक रिपोर्ट हितग्राहियों के लिए उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इससे उनके मानसिक दबाव में कमी आएगी और योजना के प्रति भरोसा बढ़ेगा।
निगम को यह सुनिश्चित करना होगा कि शेष फ्लैट्स का निर्माण समयबद्ध तरीके से पूरा हो और हितग्राहियों को उनके घर जल्द से जल्द मिलें।
निष्कर्ष
भोपाल में हाउसिंग प्रोजेक्ट्स की यह लेटलतीफी एक गंभीर चुनौती बन चुकी है। वर्षों के प्रयास के बावजूद केवल आधे से अधिक फ्लैट्स ही तैयार हो पाए हैं। यह न केवल हितग्राहियों के लिए चिंता का विषय है, बल्कि नगर निगम और राज्य सरकार की कार्यक्षमता पर भी प्रश्नचिह्न लगाता है।
यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह समस्या और बढ़ सकती है। हितग्राही और शहर दोनों ही समयबद्ध समाधान के हकदार हैं।
