भोपाल शहर की शांत सुबहों में जब अधिकांश कॉलेजों में सामान्य दिनचर्या शुरू होती है, उसी समय शासकीय मोतीलाल विज्ञान महाविद्यालय का वातावरण इन दिनों असामान्य हलचल से भरा हुआ है। परिसर में छात्रों की भीड़, मैदान में चल रही गतिविधियां, शिक्षकों की व्यस्तता और बाहर खड़े अभिभावकों की चिंता—सब मिलकर एक अलग ही माहौल बना रहे हैं। इसकी वजह है इंटर कॉलेज स्टेट लेवल क्रिकेट ट्रायल, जिसमें भोपाल के दर्जनों निजी और शासकीय कॉलेजों की टीमें हिस्सा लेने के लिए पहुंची हैं।

छात्राओं के उत्साह और ऊर्जा से भरी इस प्रतियोगिता में एक ऐसा विवाद सामने आया, जिसने इस पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर ही सवाल खड़े कर दिए। कई छात्राओं ने आरोप लगाया कि उनसे ट्रायल में भाग लेने के लिए 500 रुपए की फीस ली गई। खेल चयन की किसी भी राज्य स्तरीय प्रक्रिया में आमतौर पर कोई शुल्क नहीं लिया जाता, इसलिए छात्रों और अभिभावकों दोनों के लिए यह बात हैरान करने वाली थी। बाद में जब चर्चा बढ़ी, शिकायतें सामने आईं और सवाल उठने लगे, तो कॉलेज की ओर से यह सफाई दी गई कि यह राशि वापस कर दी जाएगी।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने कई गहरे मुद्दों को उजागर किया: क्या सरकारी कॉलेजों में खेल गतिविधियों के नाम पर छात्रों से अतिरिक्त धन वसूला जा रहा है? क्या चयन प्रक्रिया में कोई अनियमितता थी? क्या छात्राओं को पर्याप्त जानकारी दिए बिना उनसे रकम ली गई थी? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल—अगर यह शुल्क वाकई वैध था, तो फिर विवाद होते ही उसे वापस करने का निर्णय क्यों लिया गया?
घटना का आरंभ: उत्साह भरी सुबह और अचानक उठा सवाल
घटना की शुरुआत उस दिन हुई जब ट्रायल में शामिल होने पहुंची छात्राओं ने यह पाया कि उनके नाम दर्ज करने और भागीदारी की पुष्टि के लिए उनसे 500 रुपए लिए जा रहे हैं। कुछ छात्राएं इसे कॉलेज की फीस समझकर चुपचाप दे गईं, जबकि कुछ ने सवाल किए। किसी को स्पष्ट जवाब नहीं मिला कि यह राशि किस नियम के तहत ली जा रही है, इसकी रसीद क्यों नहीं दी जा रही, और यह पैसा आखिर जा कहां रहा है।
कई छात्राओं ने बताया कि उन्होंने पहले कभी ऐसा अनुभव नहीं किया था, क्योंकि आमतौर पर कॉलेज या विश्वविद्यालय स्तर पर आयोजित ट्रायल्स में शुल्क नहीं लिया जाता। कुछ छात्राएं पहली बार किसी बड़े स्तर के चयन में हिस्सा ले रही थीं, इसलिए वे प्रक्रिया से अपरिचित थीं और उतनी मुखर नहीं हुईं। लेकिन जब मैदान में अन्य प्रतिभागियों के बीच इस बात की चर्चा फैलने लगी, तब कई लोगों ने मिलकर इसका विरोध शुरू किया।
छात्राओं की आवाज़: डर और असमंजस के बीच हिम्मत
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उन छात्राओं की थी जिन्होंने बिना डरे अपनी आपत्ति दर्ज करवाई। कई छात्राओं ने बताया कि पहले उन्हें लगा कि शुल्क देना प्रक्रिया का हिस्सा होगा, लेकिन जब उन्होंने अन्य कॉलेजों में पढ़ने वाली अपनी सहेलियों से संपर्क किया, तो उन्हें पता चला कि उनसे कोई शुल्क नहीं लिया गया था।
यह जानकारी मिलते ही उनके मन में संदेह गहरा गया। एक छात्रा ने कहा कि जब उसने शुल्क का कारण पूछा, तो उसे सामान्य रूप से जवाब दिया गया कि यह ट्रायल से जुड़ी व्यवस्था का खर्च है। लेकिन जब उसी दौरान कुछ छात्राओं ने बिना शुल्क दिए अपना नाम दर्ज करवाया, तब असमानता और अधिक स्पष्ट हो गई।
छात्राओं के अनुसार, उन्हें यह भी आशंका थी कि कहीं विरोध करने से उनके चयन पर नकारात्मक असर न पड़ जाए। खेलों में चयन प्रक्रिया अक्सर प्रदर्शन के साथ-साथ निर्णय लेने वालों की राय पर भी निर्भर करती है, इसलिए कई छात्राएं खुलकर बोलने से हिचक रही थीं। लेकिन जब कई लोग एक ही अनुभव साझा करने लगे, तब साहस बढ़ा और उन्होंने कॉलेज प्रशासन से सवाल पूछा।
मामला खुलना और कॉलेज का रुख बदलना
विवाद तब मुख्य रूप से सामने आया जब कुछ छात्राओं ने परिसर में उपस्थित अन्य शिक्षकों और पर्यवेक्षकों के सामने अपनी आपत्ति दर्ज की। इसके साथ ही मामला कॉलेज के प्रबंधन तक पहुंच गया। कॉलेज की ओर से तुरंत यह बयान दिया गया कि जो भी छात्राओं से राशि ली गई है, उसे वापस कर दिया जाएगा।
यह सफाई और तत्काल कदम दोनों ही इस बात का संकेत दे रहे थे कि शुल्क वसूली प्रक्रिया नियमित या अधिकृत नहीं थी। अगर शुल्क वाकई वैध होता, तो कॉलेज उसे वापस करने की घोषणा नहीं करता। इसी बिंदु ने मामले को और गंभीर बना दिया।
हालांकि, कॉलेज प्रशासन ने यह भी कहा कि जांच की जा रही है कि शुल्क क्यों लिया गया, किसने लिया और किस अधिकार के तहत लिया। लेकिन छात्रों, अभिभावकों और उपस्थित खेल प्रशिक्षकों के बीच यह सवाल अब भी चर्चा का विषय है कि ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों हुई।
खेल चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल
यह विवाद केवल एक शुल्क वसूली का मामला नहीं है, बल्कि यह पूरे खेल चयन तंत्र की साख पर सवाल उठाता है। खेल में रुचि रखने वाले छात्र अक्सर सीमित संसाधनों के बावजूद अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की कोशिश करते हैं। वे ट्रायल के लिए सुबह से लेकर शाम तक मेहनत करते हैं, मानसिक और शारीरिक दबाव झेलते हैं और चयन की प्रक्रिया को लेकर अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। ऐसे में शुल्क के नाम पर आर्थिक दबाव डालना उनकी उम्मीदों के साथ खिलवाड़ जैसा है।
इस मामले में यह भी सवाल उठ रहा है कि यदि यह फीस किसी आधिकारिक नियम के तहत ली जा रही थी, तो इसकी जानकारी पहले से जारी क्यों नहीं की गई। कॉलेज की आधिकारिक वेबसाइट, नोटिस बोर्ड या ट्रायल से जुड़ी सूचना कहीं भी इस शुल्क का जिक्र नहीं था।
बड़े स्तर के खेल कार्यक्रमों में पारदर्शिता बनाए रखना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। क्योंकि यदि छात्रों को ऐसा लगे कि चयन प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं है, तो उनके मन में अविश्वास पैदा हो सकता है, जिसका असर उनके खेल करियर और मानसिक संतुलन पर भी पड़ता है।
छात्राओं की जीत या प्रशासन की जल्दीबाजी?
कॉलेज द्वारा राशि वापस करने का निर्णय कई छात्राओं के लिए राहत भरा था। इससे यह तो स्पष्ट हो गया कि वे सही थीं और जो सवाल उन्होंने उठाए, वे पूरी तरह जायज़ थे।लेकिन साथ ही इसने इस बात को भी स्वीकार किया कि कहीं न कहीं गलती हुई है। सवाल यह भी है कि क्या इस मामले की पूरी जांच होगी या सिर्फ राशि वापस कर देने से इसे खत्म मान लिया जाएगा।
खेल के क्षेत्र में महिलाएं पहले ही सीमित अवसरों और अनेक चुनौतियों का सामना करती हैं। ऐसे में, अगर आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि की छात्राओं को इस प्रकार बाधाओं का सामना करना पड़े, तो यह उनके खेल करियर के लिए अत्यंत हानिकारक हो सकता है।
भविष्य की दिशा: क्या ऐसे मामलों पर अंकुश लगेगा?
यह विवाद अब केवल कॉलेज तक सीमित नहीं रहा। सोशल मीडिया पर भी इस मुद्दे को व्यापक रूप से उठाया जा रहा है। छात्र, पूर्व खिलाड़ी, सामाजिक कार्यकर्ता और खेल जगत से जुड़े लोग इस मामले पर अपनी राय दे रहे हैं। अधिकतर का मानना है कि कॉलेज को इस मामले में स्पष्ट और पारदर्शी रिपोर्ट जारी करनी चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसे मामलों पर अंकुश लगाया जा सके।
यह भी सुझाव दिया जा रहा है कि किसी भी प्रकार के ट्रायल में भाग लेने के लिए शुल्क वसूली पर स्पष्ट दिशानिर्देश बनाए जाएं। इससे एक ओर भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की संभावना कम होगी, वहीं दूसरी ओर छात्रों को भी भरोसेमंद वातावरण मिलेगा।
