दुनिया की राजनीति में कई मित्रताएं बनीं, कई टूट गईं, कई समय के साथ कमजोर हो गईं, लेकिन कुछ संबंध ऐसे भी हैं जो समय, हित और अंतरराष्ट्रीय दबावों की कसौटी पर खरे उतरे। भारत और रूस का संबंध उसी दुर्लभ श्रेणी में आता है, जिसने युद्धकालीन संकट में भी मजबूती दिखाई। यह संबंध केवल कूटनीतिक दस्तावेजों का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि युद्ध के मैदान से संयुक्त राष्ट्र के गलियारों तक भारत का संबल बनकर उभरा। विशेष रूप से वह समय जब पूर्वी पाकिस्तान की परिस्थितियों ने दक्षिण एशिया के राजनीतिक भूगोल को बदल दिया था, और भारत को कई स्तरों पर संघर्ष का सामना करना पड़ा।

1971 में युद्ध केवल सीमा पर नहीं, कूटनीति में भी लड़ा गया
1971 का वर्ष केवल सैन्य अभियानों का समय नहीं था, बल्कि यह ऐसा दौर था जब भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर वैश्विक धाराओं से जूझना पड़ रहा था। पूर्वी पाकिस्तान में मानवाधिकार संकट विकराल रूप में सामने था। लाखों लोग शरण लेकर भारत की सीमाओं पर पहुंचे। भारत को आर्थिक, सामाजिक और सुरक्षा संबंधी दबावों से गुजरना पड़ा। उस समय तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने न केवल युद्ध के निर्णायक फैसले लिए, बल्कि विश्व समुदाय को स्थिति समझाने का भी प्रयास किया।
पश्चिमी राष्ट्रों में से कई उस समय पाकिस्तान के पक्ष में खुलकर तर्क दे रहे थे। विश्व की शक्तियों के समूह में भारत को इरादतन अलग-थलग करने का माहौल भी तैयार किया गया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को दो-दो मोर्चों पर लड़ाई लड़नी पड़ी।
यूएन में भारत के खिलाफ एक नहीं तीन प्रस्ताव
पूर्वी पाकिस्तान में मानवाधिकार संकट, सैन्य दमन और नागरिक हत्याओं के मामले को भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर उठाना चाहता था, लेकिन कई देशों ने उसी स्थिति को उलटकर भारत को ही दखल देने वाला देश घोषित करना शुरू कर दिया। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में लगातार तीन प्रस्ताव पेश किए गए। इन प्रस्तावों का सार यही था कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष रोका जाए, भारत सेना वापस ले और युद्धविराम लागू हो।
भारत की ओर से जवाब स्पष्ट था कि स्थिति का मूल कारण पूर्वी पाकिस्तान में मानवाधिकार संकट और नागरिक उत्पीड़न था। लेकिन पश्चिमी देशों की दृष्टि केवल सैन्य संघर्ष तक केंद्रित थी। भारत को आरोपित करने वाली कई पंक्तियों के साथ प्रस्ताव तैयार किए गए।
रूस का वीटो: संघर्ष की दिशा पलटने वाला निर्णय
इसी समय रूस ने विश्व राजनीति के इतिहास को बदलने जैसा कदम उठाया। सोवियत संघ ने इन तीनों प्रस्तावों पर वीटो कर दिया। यह केवल एक हस्तक्षेप नहीं था, बल्कि भारत के लिए कूटनीतिक सुरक्षा कवच था। वीटो का अर्थ था कि प्रस्ताव को यूएन द्वारा अंतिम रूप से स्वीकृति नहीं मिलेगी।
उस समय सोवियत संघ के नेतृत्व में लियोनिद ब्रेज़नेव थे और भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी। दोनों देशों के बीच समझदारी केवल औपचारिक नहीं थी। यह रणनीतिक, सैन्य और आर्थिक साझेदारी का निर्णायक क्षण साबित हुआ।
भारत ने राहत की सांस ली, युद्ध की दिशा स्पष्ट हुई
रूस के इस रुख ने भारत को वह समय दिया जिसकी जरूरत थी। भारतीय सेना ने पूर्वी मोर्चे पर निर्णायक प्रगति की। पाकिस्तान की फौज ने 16 दिसंबर 1971 को आत्मसमर्पण कर दिया। बांग्लादेश का निर्माण हुआ और दक्षिण एशिया के राजनैतिक नक्शे में भारी परिवर्तन आया।
अगर उस समय यूएन के प्रस्ताव पारित हो जाते, भारतीय सेना की कार्रवाई रोक दी जाती और मानवीय संकट लंबा खिंच जाता। इस प्रकार वीटो केवल एक हस्ताक्षर नहीं था, बल्कि लगभग तीन करोड़ विस्थापित परिवारों के लिए राहत का प्रतीक बन गया।
इंदिरा गांधी और ब्रेज़नेव: नेतृत्व की समान सोच
1971 के बाद भारत और सोवियत संघ ने सामरिक संबंधों को और मजबूत किया। दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग, तकनीकी विनिमय और राजनैतिक संवाद बढ़ते गए। रूस ने भारत को सैन्य उपकरणों के साथ-साथ तकनीकी हस्तांतरण की नीति पर समर्थन दिया।
बीते दशकों में शासन, सरकारें और वैश्विक विचार बदलते रहे, लेकिन दोनों देशों के बीच कूटनीतिक परंपरा ने स्थिरता बरकरार रखी।
इतिहास का संदर्भ आज भी प्रासंगिक क्यों
आज के समय में जब विश्व के रिश्ते हितों पर आधारित समझौतों में बदलते जाते हैं, उस दौर की घटनाएं याद दिलाती हैं कि अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल नीति नहीं होते, बल्कि संकट में दिखाई गई नैतिक प्रतिबद्धता भी होते हैं।
भारत और रूस संबंधों में समय-समय पर विचारभिन्नता रही, लेकिन सामरिक दृष्टिकोण से दोनों देश हमेशा पास रहे। रूस आज भी वैश्विक शक्तियों में महत्वपूर्ण स्थान रखता है और भारत से उसके संबंध घरेलू व वैश्विक संदर्भ में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
भारत के प्रधानमंत्री मीडिया में बोल चुके हैं कि “दोस्ती का तापमान हमेशा ऊंचा रहा है”, यह एक प्रतीकात्मक संकेत है कि दो देशों ने समय की परीक्षाओं में एक-दूसरे के पक्ष में खड़े होकर इतिहास की धारा बदली है।
निष्कर्ष
1971 के संकट में जब भारत की आवाज दबाने की कोशिश की गई, तब सोवियत समर्थन निर्णायक बन गया। वीटो का महत्त्व केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि यह भारत की सैन्य और मानवाधिकार सुरक्षा की दिशा तय करने वाला कदम बना।
बीते समय की यह कहानी आज भी सामरिक संबंधों के मूल्य को प्रमाणित करती है। भारत और रूस की दोस्ती विश्व राजनीति में एक उदाहरण के रूप में दर्ज है।
