भोपाल और बैतूल के साइबर अपराध विशेषज्ञों के अनुसार, डिजिटल तकनीक का दुरुपयोग कर ठगी की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। हाल ही में बैतूल में वेस्टर्न कोल फील्ड लिमिटेड (वेकोलि) के 64 वर्षीय सेवानिवृत्त कर्मचारी चैतराम नरवरे को साइबर ठगों ने डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर 73 लाख रुपये की ठगी का शिकार बनाने का प्रयास किया। यह घटना डिजिटल अपराधियों द्वारा किए जा रहे जटिल और सशक्त फ्रॉड का उदाहरण है, जिसमें तकनीकी कौशल के साथ मानसिक दबाव का प्रयोग कर पीड़ितों को फंसाया जाता है।

चैतराम नरवरे भोपाल के अशोका गार्डन में रहते हैं। उनके अनुसार, 29 नवंबर को शाम चार बजे एक अनजान नंबर से कॉल आया। कॉल करने वाले ने खुद को सीबीआई मुंबई का अधिकारी बताया और यह दावा किया कि नरवरे के नाम से मुंबई की बैंक ऑफ महाराष्ट्र में रखे गए खाते से छह करोड़ रुपये आतंकवादी घटनाओं में उपयोग हो रहे हैं। उन्होंने धमकी दी कि यदि उन्होंने तुरंत सहयोग नहीं किया, तो उन्हें गंभीर कानूनी परेशानी का सामना करना पड़ेगा। ठगों ने चैतराम को नया मोबाइल और सिम लेने को कहा, ताकि उनकी बातचीत को ट्रैक करना आसान हो और उन्हें और अधिक दबाव में रखा जा सके।
ठगों की योजना और तकनीक
ठगों ने चैतराम से पाथाखेड़ा जाने को कहा और अगले दिन वीडियो कॉल के माध्यम से उनके सभी बैंक विवरण और वित्तीय जानकारी इकट्ठा की। उन्होंने 73 लाख रुपये की एफडी को तोड़कर दूसरे खाते में जमा करने का निर्देश दिया। इस प्रक्रिया के दौरान उन्होंने मानसिक दबाव डालने के लिए डिजिटल अरेस्ट और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाया।
विशेषज्ञों के अनुसार, डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड में अपराधी इंटरनेट और मोबाइल तकनीक का दुरुपयोग कर पीड़ित को भयभीत करते हैं। इस तरह के फ्रॉड में अक्सर यह दावा किया जाता है कि पीड़ित का नाम किसी गंभीर अपराध में जुड़ा है, जिससे वह डर के कारण निर्देशित तरीके से कार्य करता है।
बेटे और परिवार की सतर्कता ने बचाई जान
चैतराम के बेटे योगेश को पिता की असामान्य गतिविधियों पर संदेह हुआ। योगेश ने तुरंत अपने मौसेरे भाई दीपेंद्र को जानकारी दी। दोनों ने मिलकर बैतूल पुलिस से संपर्क किया। पुलिस ने तत्काल कार्रवाई करते हुए राजेश गेस्ट हाउस में नरवरे को डिजिटल अरेस्ट के खतरे से सुरक्षित बचाया।
पुलिस अधीक्षक वीरेंद्र जैन ने बताया कि जब पुलिस टीम चैतराम के कमरे में पहुंची, तो वीडियो कॉल जारी थी। ठगों ने वास्तविक पुलिस कर्मियों को देखकर भी धमकी देना जारी रखा, लेकिन पुलिस की कड़ी चेतावनी के बाद उन्होंने कॉल काट दी।
डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड और कानूनी पहलू
डिजिटल अरेस्ट जैसी कोई प्रक्रिया भारतीय कानून में मौजूद नहीं है। न तो पुलिस, न सीबीआई, न ही ईडी किसी व्यक्ति को इंटरनेट या वीडियो कॉल के माध्यम से गिरफ्तार करती है और न पैसे की मांग करती है। पुलिस अधीक्षक ने नागरिकों से अपील की है कि इस तरह के कॉल आने पर किसी भी दबाव में न आएं और तुरंत 1930 साइबर हेल्पलाइन या नजदीकी थाने में शिकायत करें।
साइबर अपराध विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल अरेस्ट फ्रॉड में तकनीकी और मनोवैज्ञानिक दोनों प्रकार की रणनीति का इस्तेमाल किया जाता है। अपराधी पीड़ित को भयभीत करते हैं, तकनीकी रूप से नियंत्रित वीडियो कॉल और फर्जी बैंक दस्तावेज दिखाते हैं और वित्तीय लेनदेन के लिए दबाव डालते हैं।
साइबर सुरक्षा और सावधानी
इस घटना से यह स्पष्ट होता है कि साइबर जागरूकता अत्यंत आवश्यक है। विशेषज्ञों का कहना है कि नागरिकों को अपने बैंक विवरण, पिन, ओटीपी और पासवर्ड किसी को भी नहीं साझा करना चाहिए। किसी भी अनजान कॉल या संदेश के मामले में तुरंत पुलिस या बैंक से संपर्क करना चाहिए।
आधुनिक तकनीक के बढ़ते उपयोग के कारण डिजिटल फ्रॉड में नए और जटिल तरीके लगातार विकसित हो रहे हैं। ऐसे में नागरिकों को सतर्क रहना और सरकारी साइबर हेल्पलाइन की जानकारी रखना आवश्यक है।
बैतूल और मध्यप्रदेश में साइबर अपराध की स्थिति
मध्यप्रदेश में साइबर अपराध की घटनाओं में तेजी से वृद्धि देखी जा रही है। बैतूल में यह मामला सिर्फ एक उदाहरण है। विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल फ्रॉड के मामलों में अक्सर वृद्ध या तकनीकी रूप से कम सक्षम लोग निशाना बनते हैं। इस घटना ने यह भी उजागर किया कि परिवार की सतर्कता और पुलिस का त्वरित हस्तक्षेप पीड़ित को गंभीर आर्थिक नुकसान से बचा सकता है।
भविष्य की चुनौतियाँ और समाधान
डिजिटल फ्रॉड रोकने के लिए सरकारी और निजी संस्थाओं को मिलकर जागरूकता अभियान चलाना आवश्यक है। नागरिकों को डिजिटल सुरक्षा के उपाय सिखाने, साइबर हेल्पलाइन और शिकायत प्रणाली की जानकारी देने की आवश्यकता है। इसके अलावा बैंक और वित्तीय संस्थाओं को भी फर्जी कॉल और फ्रॉड की चेतावनी प्रणाली मजबूत करनी होगी।
