भारत में अक्षय ऊर्जा क्षेत्र लगातार विस्तार कर रहा है और इसी क्षेत्र की प्रमुख फाइनेंसिंग संस्था IREDA यानी Indian Renewable Energy Development Agency निवेशकों के बीच कभी तेजी तो कभी दबाव के साथ चर्चा में बनी रहती है। वर्ष 2024 की दूसरी तिमाही से लेकर 2025 के अंत तक कंपनी के शेयर में असामान्य उतार–चढ़ाव दर्ज हुआ। यह गिरावट इतनी बड़ी है कि कई निवेशकों ने इस कंपनी के भविष्य को लेकर सवाल खड़े करने शुरू कर दिए हैं। हालांकि उसी समय कई विश्लेषक यह भी कह रहे हैं कि इस प्रकार की गिरावट किसी भी मजबूत कंपनी के लिए एक “करेक्शन फेज” भी हो सकती है।

52–वीक लो तक गिरा शेयर
2025 के अंतिम महीनों में हुए लगातार गिरावट ने IREDA के शेयर को ₹132.94 के स्तर तक ला दिया, जो इसका नया 52-वीक लो है। यह वही कंपनी है जिसका शेयर IPO के समय ₹32 पर जारी हुआ था और बाद में लगभग दस गुना से ज्यादा बढ़कर ₹310 तक पहुंच गया था। जुलाई 2024 में कंपनी अपने सर्वोच्च स्तर पर थी। उस समय निवेशकों को यह विश्वास हो गया था कि अक्षय ऊर्जा से संबंधित सरकारी समर्थन और ऋण वितरण की गति कंपनी के प्रदर्शन को लंबे समय तक मजबूत बनाए रखेगी।
कई अनुभवी निवेशकों के अनुसार—उच्च स्तरों पर निवेशक मुनाफा बुकिंग करते हैं और जब एक बार गिरावट शुरू होती है तो कई बार निवेशक भावनात्मक निर्णय लेकर बेच देते हैं, जिससे शेयर और गिर जाते हैं। यहां भी वही हुआ। IPO निवेशकों के लिए IREDA अभी भी अच्छा रिटर्न दे रही है, लेकिन जो लोग उच्च स्तर पर प्रवेश किए थे, उन्हें नुकसान का सामना करना पड़ा।
लगातार गिरावट का कारण क्या
लगातार गिरावट के पीछे दो मुख्य कारण सामने आए।
पहला, लगातार QIP जारी करना यानी कंपनी का बाजार से पूंजी जुटाना। जून 2025 में कंपनी ने करीब ₹2,000 करोड़ जुटाए और अब ₹3,000 करोड़ जुटाने की बात चल रही है। बड़े संस्थागत निवेशक कंपनी की वैल्यूएशन देखकर निवेश करते हैं, लेकिन जब उपलब्ध शेयरों की संख्या बढ़ती है, तो मांग-आपूर्ति का संतुलन प्रभावित होता है।
दूसरा, कई विशेषज्ञ कहते हैं कि कुछ बड़े निवेशकों द्वारा आक्रामक मुनाफावसूली भी शेयर की कमजोरी का कारण बनी। किसी भी स्टॉक में जब रुझान बदल जाता है, तो छोटे और नए निवेशक डर जाते हैं और बेचना शुरू कर देते हैं, जिससे गिरावट तेजी पकड़ लेती है।
कंपनी खुद यह पहले कह चुकी है कि QIP की दूसरी किश्त पूरी तरह बाजार की स्थिति पर निर्भर करेगी। इसका मतलब स्पष्ट है कि कंपनी नुकसान को कम करने या निवेशकों की धारणा को संभालने की कोशिश करती रही है।
IREDA की भूमिका और सरकारी समर्थन
IREDA एक सरकारी संस्था है और इसका काम देश के भीतर चल रहे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, बायोमास और अन्य नवीकरणीय परियोजनाओं को वित्त उपलब्ध कराना है। हाल के वर्षों में ग्रामीण विद्युतीकरण, सोलर रूफटॉप प्रोजेक्ट्स और ईंधन-विकल्पी परियोजनाओं पर निवेश बढ़ा है।
सरकार की 71.76% हिस्सेदारी इस संस्था में है। इसका मतलब है कि दीर्घकालिक सुरक्षा और नीति आधारित समर्थन कंपनी को मिलता रहेगा। यही कारण है कि विश्लेषकों का एक वर्ग यह भी कहता है कि गिरावट अस्थायी है और कंपनी की आधार संरचना मजबूत है।
कुछ बाजार विशेषज्ञों का मत है कि सरकारी कंपनियों में निवेश लंबी अवधि की रणनीति के अनुसार किया जाना चाहिए। क्योंकि इन कंपनियों में तेजी से ट्रेडिंग उतार-चढ़ाव तो होते हैं, लेकिन नीति-समर्थन उन्हें भविष्य में फिर मजबूत बनाता है।
क्या निवेशक अभी मौका देखें
कुछ विशेषज्ञ इस स्तर पर IREDA को “लॉन्ग-टर्म एवरेज-प्राइसिंग अवसर” मान रहे हैं। मगर यह भी कह रहे हैं कि केवल उन निवेशकों को लाभ होगा जो कंपनी की प्रकृति को समझते हैं।
IREDA का राजस्व बढ़ रहा है, कंपनी का ऋण वितरण खर्च-प्रभावी हुआ है और उसकी बैलेंस शीट पहले से मजबूत है।
लेकिन साथ ही–
QIP, बाजार की अस्थिरता, ब्याज दरों में संभावित बदलाव और नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं पर जारी दबाव भविष्य की चुनौतियां भी हैं।
निवेशकों की चिंता क्यों बढ़ी
कई निवेशकों का कहना है कि गिरावट तब हुई जब बाजार अपने उच्चतम स्तर पर था। बड़ी गिरावट हमेशा मनोवैज्ञानिक असर डालती है।
कुछ निवेशकों ने कहा कि अगर कंपनी बार-बार पूंजी जुटाएगी, तो कंपनी पर दबाव रहे सकता है।
कुछ लोगों ने यह भी कहा कि बाजार परिस्थितियां बदलने पर कंपनी के शेयर का रुझान भी बदल सकता है।
QIP का विवाद और LIC की भूमिका
जून में जारी QIP में कई संस्थानों ने निवेश किया था। इसमें लगभग 50% हिस्सेदारी LIC को आवंटित की गई थी, जिससे बाजार में यह संकेत गया था कि कंपनी को स्टेबल फाइनेंशियल सपोर्ट मिल रहा है। इसके बावजूद बाद में आई गिरावट इस धारणा को झटका देती दिखी।
विश्लेषकों का कहना है कि बड़े संस्थानों की एंट्री दीर्घकालिक दिशा में संकेत देती है। वह शॉर्ट-टर्म ट्रेंड नहीं देखते।
अगर दूसरी किश्त भी आती है, तो शेयर का प्राइस निवेशकों के लिए आकर्षक बन सकता है, बशर्ते कंपनी अपने बिजनेस विस्तार में तेजी दिखाए।
आगे की राह
IREDA की स्थिति आज उस दौर में है जहां निवेशक विभाजित राय रखते हैं।
पहला वर्ग कहता है कि इतनी बड़ी सरकारी संस्था को एक स्थिर वित्तीय साधन माना जाना चाहिए, इसलिए डरने की जरूरत नहीं है।
दूसरा वर्ग कहता है कि जब तक कंपनी पूंजी जुटाना बंद नहीं करेगी या विस्तार की पारदर्शी योजना नहीं बताती, जोखिम बना रहेगा।
विशेषज्ञों के शोध में यह सामने आया है कि 2026 से 2030 तक देश में अक्षय ऊर्जा निवेश 3-4 गुना बढ़ेगा। इसमें IREDA का बड़ा योगदान रहेगा।
यदि कंपनी अपनी कार्यशैली और वितरण मॉडल को बेहतर करती रही, तो अभी जो गिरावट दिखाई दे रही है, वह आने वाले समय में लाभप्रद साबित हो सकती है।
