उत्तर प्रदेश में नागरिक पहचान सत्यापन को लेकर चल रही प्रशासनिक कार्रवाइयों ने एक नए और महत्वपूर्ण मोड़ पर प्रवेश कर लिया है। शहर में सफाई कार्य और कूड़ा प्रबंधन से जुड़े जिन श्रमिकों का आधार रिकॉर्ड उपलब्ध था, उनसे उनकी पहचान को और स्पष्ट करने के लिए अतिरिक्त दस्तावेज मांगे गए। इस प्रक्रिया के अंतर्गत एनआरसी नंबर प्रस्तुत करने को कहा गया, जिसके बाद एक बड़ी संख्या में कर्मचारी अचानक नौकरी छोड़कर चले गए। सरकारी संस्थाओं से जुड़े सूत्रों के अनुसार, यह संख्या लगभग 160 बताई जा रही है, जो अब पुलिस और प्रशासन दोनों के लिए जांच का विषय बन चुकी है।

पहचान सत्यापन क्यों शुरू हुआ
पिछले कई महीनों से राज्य में बाहरी व्यक्तियों की पहचान सुनिश्चित करने को लेकर नीति चर्चा में रही है। राज्य स्तर पर यह निर्णय लिया गया कि किसी भी आवश्यक श्रमिक या सेवा प्रदाता को आधार के साथ ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत करने होंगे जिनसे यह प्रमाणित हो सके कि उनकी उत्पत्ति भारत के भीतर है और वह किसी लंबी अवधि के लिए यहाँ रहते आए हैं। इसी प्रक्रिया के अंतर्गत कुछ ठेकेदार कंपनियों से कहा गया कि यदि उनके कार्यबल में ऐसे कर्मचारी हों, तो उनकी पहचान स्पष्ट कराई जाए।
एनआरसी संबंधी प्रस्तुति को लेकर सबसे बड़ा उद्देश्य यह था कि जिन व्यक्तियों का स्थानीय या स्थायी रजिस्ट्रेशन असम में हुआ है, उनकी स्थिति स्पष्ट हो सके, क्योंकि असम में एनआरसी रिकॉर्ड उपलब्ध है। यहीं से आगे की पड़ताल शुरू हुई।
कूड़ा और सफाई कार्य से जुड़े कर्मचारी क्यों चर्चा में आए
नगर निगम द्वारा अधिकृत संस्था के माध्यम से कई क्षेत्रों में सफाई कार्य लंबे समय से चल रहा है। जब पहचान सत्यापन की औपचारिक प्रक्रिया संस्था तक पहुंची, तो कर्मचारियों को अपने दस्तावेज प्रदान करने के लिए कहा गया। जानकारी सामने आई कि दस्तावेज मांगते ही कई कर्मचारी उपस्थित नहीं हुए और कई ने अगले ही दिन काम बंद कर दिया।
नगर प्रशासन के सूत्रों के अनुसार यह स्थिति अचानक नहीं हुई, बल्कि बीते कुछ सप्ताहों से इन श्रमिकों की पहचान की पुष्टि करने का प्रयास चल रहा था। कई कर्मचारी केवल आधार कार्ड ही प्रस्तुत कर पाए और उनसे जब उनके निवासक्षेत्र या नागरिकता संबंधी दस्तावेज मांगे गए, तो स्थिति बदलने लगी। आधार कार्ड प्रस्तुत करने के बाद भी जब आगे जांच की गई, तो जानकारी अस्पष्ट रही।
जांच आगे कैसे बढ़ेगी
अब यह मामला जांच के दायरे में है। प्रशासन कर्मचारियों की पिछली उपस्थिति, वेतन भुगतान रिकॉर्ड, ठेकेदार संस्था के रजिस्टर और मोबाइल नंबरों के आधार पर जगह-जगह जानकारी जुटा रहा है। इस संबंध में स्थानीय पुलिस को भी कई महत्वपूर्ण बिंदु सौंपे गए हैं ताकि पता चल सके कि गायब हुए कर्मचारी शहर में मौजूद हैं या कहीं और चले गए।
जानकारी के अनुसार, कर्मचारी जिन क्षेत्रों में नियुक्त थे, वहाँ की उपस्थिति सूची से भी पता लगाया जा रहा है कि वे पहले किस पते से आते थे। यह जांच भविष्य में कानूनी दिशा भी तय करेगी।
जिन क्षेत्रों से अधिक कर्मचारी गायब हुए
शहरी निकाय क्षेत्रों में अलग-अलग ज़ोन बनाए गए थे और इन्हीं ज़ोन में सफाई कर्मियों की तैनाती थी। ज़ोनवार आँकड़ों के अनुसार, लगभग 38 कर्मचारी एक क्षेत्र से, 70 दूसरे से, और शेष अन्य से अनुपस्थित पाए गए।
इन क्षेत्रों में लंबे समय से सफाई कार्य चल रहा था और पिछले कई महीनों में यह कर्मी नियमित रूप से उपस्थित रहते थे। अचानक अनुपस्थिति सरकारी एजेंसियों के लिए जांच का विषय बन गई है।
नगर निकाय में प्रशासनिक स्तर पर गंभीरता
शहर स्तर पर नेतृत्व संभाल रहे अधिकारी लंबे समय से यह प्रयास कर रहे थे कि यदि कोई व्यक्ति शहर में कार्यरत है तो उसकी पहचान स्पष्ट रूप से सत्यापित हो। कुछ वर्ष पहले भी पहचान संबंधी कार्रवाई हुई थी, जहाँ कुछ बस्तियों को हटाया गया था।
इस बार स्थिति अलग है क्योंकि इस बार मामला दस्तावेजों की जाँच से सीधे गायब हुए व्यक्तियों तक पहुँच गया है। नगर प्रशासन ने संबंधित प्रबंधन संस्था को निर्देश दिया है कि वे पुलिस को उपलब्ध सभी विवरण सौंपें, जिसमें कार्यप्रारंभ की जानकारी से लेकर संपर्क विवरण शामिल हों।
पहचान संबंधी रिकॉर्ड क्यों महत्वपूर्ण
ऐसे मामले केवल रोजगार संबंधी नहीं हैं, बल्कि यह सुरक्षा, सरकारी सेवाओं और भविष्य में शहर के विकास से भी जुड़े हैं। नगर प्रशासन का तर्क है कि यदि कोई व्यक्ति शहर में कई वर्षों से रह रहा है और सरकारी कार्य से जुड़ा है तो उसे पहचान प्रमाण देने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए।
ये रिकॉर्ड इस बात को भी स्पष्ट करते हैं कि सरकारी योजनाओं या सुविधाओं का लाभ किन व्यक्तियों तक पहुँच रहा है।
इसी दौरान सामने आए अन्य मामले
जाँच करते समय कुछ अन्य संबंधित घटनाएँ भी सामने आईं जिनकी जानकारी प्रशासन को पूर्व में मिल चुकी थी। इनमें से एक में एक महिला की पहचान गलत आधार पर बदल दिए जाने का मामला शामिल था, जिसमें अतिरिक्त दस्तावेजों की सहायता से सही स्थिति का पता लगाया गया। यह घटना भी यही बताती है कि पहचान सत्यापन प्रक्रिया आवश्यक है और इसे व्यवस्थित रूप से चलाया जाना चाहिए।
वर्तमान स्थिति और भविष्य
कई सुरक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे मामलों में केवल कानूनी कार्रवाई काफी नहीं होती। स्थानीय स्तर पर यह सुनिश्चित करना पड़ता है कि कोई व्यक्ति जो शहर में कार्यरत है, उसकी पहचान और मूल जानकारी स्पष्ट रहे। साथ ही प्रशासन ने संबंधित एजेंसियों को निर्देशित किया है कि वह नए कर्मचारियों की भर्ती करते समय भी पहचान स्पष्ट करें।
आगे आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि गायब हुए कर्मचारी कहाँ तक पहुँचे और क्या उनमें से किसी ने पहचान संबंधी दस्तावेज़ प्रस्तुत किए।
