कुछ कहानियां आँसू बनकर उतरती हैं, कुछ दहलीज़ों पर स्मृतियों की धूल बनकर ठहर जाती हैं। और कुछ कहानियां लौटकर जीवन में उसी तरह प्रवेश करती हैं जैसे कोई भूली हुई खुशबू अचानक हवा में घुल जाए। भोपाल में नवंबर माह ने ऐसी ही तीन भावनात्मक कहानियों को घर-घर में चर्चा का विषय बना दिया। तीन बेटियां—तीन अलग जीवन-स्थितियों में खोई हुईं—और तीन परिवार जिनकी उम्मीदें वर्षों से जमी हुई राख के नीचे जैसी दबी पड़ी थीं। पुलिस की लगातार खोज और निगरानी की कोशिशों ने आखिरकार वह मुकाम हासिल किया, जहां आंखें छलक आईं, घर का आंगन फिर से भरा और जिंदगी नए स्वरूप में लौट आई।

कहानी पहली — चौदह की उम्र में छोड़ा घर, बारह साल बाद मिली बेटी
कहानी एक ऐसे पिता की है, जिसके जीवन में बेटी ही सब कुछ थी। चौदह वर्ष की उम्र में बेटी अचानक घर से निकल गई थी। कोई विदाई नहीं, कोई अंतिम बात नहीं, बस एक सुबह वह स्कूल नहीं पहुंची और फिर लौटकर कभी घर नहीं आई।
वर्षों तक पिता ने हर सड़क, हर गलियारे, हर मेले, हर स्टेशन पर तलाश की। धीरे-धीरे समय आगे बढ़ता रहा, उम्र की रेखाएं चेहरे पर खिंचती रहीं, लेकिन बेटी की एक तस्वीर दिल में उसी उम्र में स्थिर बनी रही—14 साल की बच्ची—दो चोटी, हल्का-सा बस्ता, और निराला हावभाव।
बेटी पढ़ने में तेज थी—98% अंक लाने वाली। माता-पिता उसी उपलब्धि में बेटी की नई ज़िंदगी की कल्पना करते थे। लेकिन जिंदगी के मोड़ कभी पूर्वानुमान पर नहीं चलते। वह किसी अज्ञात स्थान चली गई—किसके साथ, क्यों, कैसे—सालों तक कोई जवाब नहीं मिला। कई रिश्तेदारों ने पिता को समझाया कि किस्मत की रेखाओं को स्वीकार कर लें। पर पिता ने अपनी खोज कभी बंद नहीं की।
पुलिस ने जैसे ही एक खास शिकायत रिकॉर्ड में देखी, उसकी पूरी स्कैनिंग शुरू हुई। डिजिटल तरीके से पुरानी मिसिंग रिपोर्टों की फाइलें खोली गईं। कॉल लॉग्स, सार्वजनिक रिकॉर्ड, पुराने स्टेशन एंट्री, महिला आश्रय केंद्र—हर जगह निगरानी हुई।
और फिर वह दिन आया—एक युवती मिल गई, पहचान मेल खाई, और पुलिस ने परिवार को संपर्क किया।
जब बेटी अपने घर पहुंची तो पिता की आंखें ज़ोर से भर आईं। छाती से लगा कर वह फूट-फूटकर रो पड़े। इतने वर्षों की थकान, असफलता, उम्मीद सब आंसुओं में बह गईं। बेटी भी रोई—लेकिन रोने की वजहें अलग थीं। उसके जीवन की जानकारी अभी भी पुलिस जांच में है, लेकिन इतना निश्चित है कि वह सुरक्षित थी—अलग परिस्थिति में, अलग शहर में।
पिता का घर वही था, लेकिन बेटी अब चौदह साल की नहीं थी। इस बार घर में कदम रखी एक परिपक्व युवती, जिसे खो देने का डर अब भी पिता की आंखों में गहरा था।
कहानी दूसरी — खोई बच्ची और परिवार की हर सुबह एक इंतजार
दूसरी कहानी में एक घर का आंगन सालों तक खामोश रहा। बच्ची जब घर से निकली तो सिर्फ़ यह कहकर गई— “शाम तक आ जाऊंगी।” दूसरी बच्चियों की तरह वह भी खेलकूद में व्यस्त रहती थी। लेकिन शाम आई, रात आई, अगली सुबह आई—और उसके बाद आने वाले हर दिन एक सिरीज़ की तरह बदलते गए लेकिन बेटी नहीं लौटी।
परिवार की महिलाएं हर त्योहार पर घर में एक थाली अधिक रखतीं। जन्मदिन पर बिना वजह दीये जलाए जाते और हर शाम सड़क की ओर निगाहें जातीं। बेटी की एक तस्वीर दरवाज़े पर लगी रही, जिसे पिता रोज पोंछते। माँ ने भगवान के सामने हर रोज़ वही पूजा की, वही दीपक जलाया, वही दुआ मांगी—और हर दिन वह दीपक ऐसे बुझ जाता जैसे उम्मीद का धागा फिर छोटा हो गया हो।
पुलिस ने इस मामले को दोबारा खोलने का निर्णय लिया। पुरानी शिकायतों को सिस्टम में सक्रिय किया गया। एक महिला पहचान रिपोर्ट, जिसमें कुछ तिथियां और शुरुआती जानकारी थी, उसे पकड़कर सुराग बढ़ा। आखिरकार वह युवती एक शहर के कार्यस्थल पर मिली। तब तक वह किसी निजी कार्यस्थल में निवास कर रही थी।
जब वह वापस आई, तो माँ के गले लगते ही पूरा परिवार रो पड़ा। लोग कहते हैं—बच्चियां घर छोड़ती नहीं, परिस्थितियों में धकेली जाती हैं। इस बच्ची की कहानी भी वैसी ही थी। पुलिस अभी उसकी परिस्थितियों को विस्तार से देख रही है।
वापसी के समय पड़ोस की महिलाएं दरवाज़े पर खड़ी थीं। कुछ की आंखें भीगीं, कुछ के चेहरे पर राहत थी। कई लोगों ने कहा—जैसे घर में बच्चे फिर से जन्म ले रहे हों।
कहानी तीसरी — तीन साल की दूरी, पर हर दिन की चुप्पी
तीसरी कहानी उतनी लंबी नहीं, लेकिन उतनी ही भावुक। बेटी घर से नाराज़ होकर चली गई थी। शिकायत उस समय दर्ज हुई, लेकिन तीन वर्ष तक कुछ भी नहीं मिला। फोन बंद मिला, संपर्क टूट गया। परिवार ने कई स्थानों पर मदद मांगी।
नवंबर में पुलिस ने शहर भर में लापता लड़कियों की पहचान, आधार रिकॉर्ड, सोशल लोकेशन और सुरक्षा केंद्रों से मिलान किया। इसी दौरान तीसरी बेटी का पता लगा। उसने अपने लिए एक नया जीवन खोजने की कोशिश की थी, लेकिन परिस्थितियां कठिन थीं।
जब पुलिस उसे लेकर घर पहुंची, तो वह चुप खड़ी रही। पिता की आंखें नम थीं, लेकिन मां ने जाते ही उसे चूम लिया। बच्ची ने सिर झुका लिया और वह धीरे-धीरे घर के अंदर चली गई। कुछ बातें उसके मन में थीं जो केवल परिवार के साथ साझा की जानी थीं।
तीन साल लंबा समय नहीं होता, लेकिन जिन परिवारों के दरवाज़े खुलते रहने की आदत हो, उनके लिए यह समय बहुत भारी साबित होता है।
पुलिस की पहल — उम्मीदों को घर लौटाना
किसी भी परिवार के लिए बच्चा खो जाना जिंदगी के टूट जाने जैसा होता है। पुलिस की लगातार निगरानी, डिजिटल जांच, पुराने दस्तावेज पुनः सत्यापन, और अदालतों के सहयोग से 69 लापता बेटियों में कई को हाल में ट्रेस किया गया। इनमें से तीन की कहानियां सिर्फ घटनाएं नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए भावना, चेतावनी और उम्मीद हैं।
आज जब ये बेटियां घर लौटी हैं, तो केवल दरवाजे नहीं खुले—आंगनों में रौनक लौटी, रसोई की खुशबू में मिठास लौट आई, और माता-पिता के चेहरों पर मुस्कान।
