भोपाल, भारत का दिल कहा जाने वाला शहर, जहां रोज़ हजारों यात्री ट्रेन से सफर करते हैं — लेकिन अब यही सफर डर का दूसरा नाम बन गया है। हाल के महीनों में मंगला एक्सप्रेस, सोमनाथ एक्सप्रेस और इंटरसिटी एक्सप्रेस जैसी ट्रेनों में लगातार चोरी और लूटपाट की घटनाओं ने यात्रियों की नींद उड़ा दी है।

जहां रेलवे अपनी नई सुविधाओं और सुरक्षा अभियानों का बखान कर रहा है, वहीं भोपाल से गुजरने वाली ट्रेनों में अपराधी बेलगाम होते जा रहे हैं। चलती ट्रेन के धीमे होने या स्टेशन से छूटने के ठीक पहले का वह पल — अब यात्रियों के लिए सबसे खतरनाक साबित हो रहा है।
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अपराध का नया तरीका: जब रफ्तार घटती है, खतरा बढ़ता है
पिछले हफ्ते की घटना ने जीआरपी और आरपीएफ दोनों को झकझोर कर रख दिया।
मंगला एक्सप्रेस में यात्रा कर रहीं नंदनी कुमारी शर्मा, जो अपने पति आशीष शर्मा के साथ कल्याण से आगरा कैंट जा रही थीं, का बैग चोरी हो गया। जैसे ही ट्रेन भोपाल आउटर पर धीमी हुई, एक युवक उनके पास आया और झटके से हैंडबैग छीनकर चलती ट्रेन से कूद गया।
नंदनी ने शोर मचाया, पति और अन्य यात्री दौड़े — लेकिन तब तक चोर रात के अंधेरे में गायब हो चुका था। उस बैग में सोने-चांदी के जेवर और करीब ₹30,000 नकद रखे हुए थे। यह सब कुछ सेकंडों में हुआ।
इसी तरह सोमनाथ एक्सप्रेस और इंटरसिटी एक्सप्रेस में भी यात्रियों के मोबाइल और बैग छिनने की घटनाएं दर्ज की गईं।
जीआरपी का कहना है कि अपराधी ट्रेन के रुकने या धीरे चलने का फायदा उठाते हैं — वह ट्रेन की खिड़कियों या गेट के पास खड़े यात्रियों को निशाना बनाते हैं और फिर चलती ट्रेन से कूदकर भाग निकलते हैं।
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अपराधी कौन हैं?
पुलिस जांच में सामने आया है कि ये चोर आमतौर पर स्टेशन आउटर इलाके में रहने वाले स्थानीय गिरोहों से जुड़े होते हैं। ये इलाके अक्सर स्लम बेल्ट्स या झुग्गी बस्तियों के पास होते हैं जहां से ट्रैक तक पहुंच आसान होती है।
अपराधियों की उम्र 18 से 30 साल के बीच बताई जा रही है।
एक जीआरपी अधिकारी ने बताया:
> “ये लोग पहले ट्रेनों की गति और स्टॉपिंग पॉइंट्स को हफ्तों तक देखते हैं। फिर जब ट्रेन धीमी होती है, तो एक व्यक्ति हमला करता है और बाकी साथी उसे भगाने या छिपाने में मदद करते हैं।”
इस तरह का संगठित तरीका अब भोपाल, जबलपुर, इटारसी और नागपुर रूट तक फैल चुका है।
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मोबाइल और बैग: सबसे आसान निशाने
एक अन्य घटना में नरसिंहपुर निवासी सुदीप रघुवंशी सोमनाथ एक्सप्रेस में जनरल कोच में करेली से भोपाल आ रहे थे। ट्रेन जब स्टेशन से लगभग पांच मिनट दूर थी, तभी एक व्यक्ति उनके पास आया और हाथ पर झपट्टा मारकर मोबाइल छीन लिया।
सुदीप ने पीछा करने की कोशिश की, लेकिन चोर पहले ही चलती ट्रेन से कूद चुका था। उनका फोन ₹14,000 का था।
इसी तरह भोपाल के आनंद नगर निवासी निखिल लोधी इंटरसिटी एक्सप्रेस में सवार थे। ट्रेन जैसे ही भोपाल स्टेशन से धीरे-धीरे रवाना हुई, एक युवक ने उनके हाथ पर डंडा मारा, मोबाइल नीचे गिरा और फिर वह उठा कर भाग गया।
इन वारदातों का तरीका लगभग एक जैसा है — अचानक वार, तेज भागना, और गायब हो जाना।
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थोड़ी सी लापरवाही, बड़ा नुकसान
भोपाल निवासी मुकेश लोधी ने बताया कि वे रानी कमलापति रेलवे स्टेशन पर श्रीधाम एक्सप्रेस का इंतजार कर रहे थे। वे ओवरब्रिज के पास बैठे-बैठे थोड़ी देर के लिए लेट गए और नींद लग गई।
जब नींद खुली, तो उनका मोबाइल और ब्लूटूथ स्पीकर गायब थे। करीब ₹15,000 का नुकसान हुआ।
यह घटना दिखाती है कि सिर्फ चलती ट्रेन ही नहीं, बल्कि स्टेशन परिसर भी अब सुरक्षित नहीं रहे।
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अभियान जो खत्म होते ही अपराध बढ़ जाते हैं
जीआरपी (Government Railway Police) और आरपीएफ (Railway Protection Force) लगातार अभियान चला रही हैं।
ट्रेनों में नकली यात्रियों के रूप में सादे कपड़ों में जवान तैनात किए जाते हैं, लेकिन जैसे ही अभियान खत्म होता है, अपराधी दोबारा सक्रिय हो जाते हैं।
भोपाल रेलवे के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा,
> “अपराधियों के पास अब मोबाइल ऐप्स और ग्रुप चैट्स हैं जिनसे वे ट्रेनों की लाइव मूवमेंट ट्रैक करते हैं। वे जानबूझकर उन्हीं जगहों पर वार करते हैं जहां पुलिस पेट्रोलिंग कमजोर होती है।”
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टेक्नोलॉजी से लड़ाई: CCTV, GPS और ऐप अलर्ट
रेलवे अब इन अपराधों से निपटने के लिए टेक्नोलॉजी पर दांव लगा रहा है।
CCTV कैमरों की संख्या बढ़ाई जा रही है
ट्रेनों में GPS ट्रैकिंग और इंसीडेंट रिपोर्टिंग ऐप्स की टेस्टिंग चल रही है
यात्री अब रेल मदद ऐप से तुरंत शिकायत दर्ज कर सकते हैं
लेकिन यात्रियों के अनुसार,
> “जब तक ट्रेन में या आउटर ट्रैक पर रियल-टाइम एक्शन नहीं होगा, तब तक ऐप से ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा।”
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यात्रियों की आवाज़: डर और नाराज़गी
रेलवे के ‘सुरक्षित भारत मिशन’ के बावजूद यात्रियों में असुरक्षा का माहौल है।
इंदौर से भोपाल यात्रा कर रहीं एक महिला ने बताया,
> “हम महिलाएं रात की ट्रेन से यात्रा करने से डरती हैं। हर बार डर लगता है कि कोई झपट्टा न मारे।”
वहीं, नियमित यात्री और कॉलेज छात्र राजेश बघेल कहते हैं,
> “ट्रेन आउटर पर पहुंचते ही हम मोबाइल जेब में डाल लेते हैं। क्योंकि वहां कोई नहीं बचाता।”
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विशेषज्ञ राय: टेक और ट्रेन दोनों को चाहिए नई सोच
रेलवे सुरक्षा विशेषज्ञ डॉ. अनिरुद्ध पाठक के अनुसार, यह समस्या सिर्फ पुलिसिंग की नहीं है —
> “यह एक सिस्टम की खामी है। जहां ट्रैक के आसपास शहरी फैलाव बढ़ा है, वहां सुरक्षा दीवारें और निगरानी दोनों कमजोर हैं।”
वे सुझाव देते हैं कि रेलवे को:
1. आउटर ट्रैक पर ड्रोन सर्विलांस शुरू करना चाहिए।
2. कोच में AI आधारित कैमरे लगाने चाहिए जो संदिग्ध हरकतों को पहचान सकें।
3. और सबसे जरूरी — रात के वक्त यात्रियों को जागरूक करने वाले डिजिटल अलर्ट्स भेजे जाएं।
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हर ट्रेन पर एक कहानी, हर स्टेशन पर एक डर
भोपाल से लेकर इंदौर, जबलपुर से नागपुर तक — यात्रियों की कहानियां एक जैसी हैं।
धीमी रफ्तार वाली ट्रेनें, तेज रफ्तार वाले अपराधी, और पुलिस जो घटनाओं के बाद पहुंचती है।
रेलवे का कहना है कि त्योहारी सीजन में यात्रियों की संख्या बढ़ी है, जिससे अपराधियों को और मौके मिल रहे हैं।
लेकिन सवाल वही है — जबतक अपराधी पकड़ में नहीं आएंगे, क्या आम यात्री चैन से यात्रा कर पाएगा?
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निष्कर्ष: अब रेलवे को चाहिए रफ्तार में सुधार और सुरक्षा में क्रांति
इस वक्त देश की सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ ट्रेनें समय पर चलाना नहीं है, बल्कि उन्हें सुरक्षित बनाना भी है।
भोपाल की ये घटनाएं चेतावनी हैं कि रेलवे के “मेक इन इंडिया मॉडर्नाइजेशन” की चमक के नीचे सुरक्षा का अंधेरा अब और गहराता जा रहा है।
अगर रेलवे ने तुरंत टेक्नोलॉजी, पेट्रोलिंग और पब्लिक अवेयरनेस का मिश्रण नहीं अपनाया — तो ये अपराध भारत की रेल लाइनों पर नई महामारी बन जाएंगे।
