नर्मदापुरम जिले के अंतर्गत आने वाले ग्राम जमुनिया की साधारण-सी सुबह अचानक चहल-पहल से भर उठी। ग्रामीणों के घरों से निकले लोग रेलवे स्टेशन के समीप स्थित एक पुराने मकान की ओर बढ़ रहे थे। कुछ महिलाएं अपनी गोद में बच्चों को थामे थीं, कुछ पुरुष सिर पर गमछा बांधे चल रहे थे। उनकी चाल में उम्मीद भी थी और बेचैनी भी। बताया जाता है कि कई दिनों से यहां एक ऐसे व्यक्ति द्वारा लोगों को इकट्ठा करके प्रार्थना-सत्र चलाए जा रहे थे, जिनके बारे में ग्रामीणों को विश्वास था कि वह मानसिक पीड़ा, पारिवारिक संकट और स्वास्थ्य संबंधी बाधाओं को दूर करने में सक्षम है।

गांव में हमेशा की तरह सुबह की दिनचर्या चल रही थी, तभी खबर धीरे-धीरे फैली कि यह सब महज प्रार्थना या चिकित्सा नहीं, बल्कि किसी अन्य उद्देश्य के लिए किया जा रहा है। इसी चर्चा ने अचानक माहौल को संवेदनशील बना दिया।
धीरे-धीरे बढ़ता असंतोष और ग्रामीणों की आशंकाएं
ग्रामीणों की मान्यता के अनुसार, इस स्थल पर पहुंचने वाले परिवारों को यह आश्वासन दिया जा रहा था कि कथित प्रार्थना विधि से रोगों, मानसिक असामान्यताओं और पारिवारिक उलझनों का समाधान हो जाएगा। लोग अपने बीमार परिजनों को लेकर यहां आने लगे। कई महिलाएं भावुक होकर झूमती देखी गईं, कुछ व्यक्तियों पर अचानक चीख-पुकार जैसे प्रभाव दिखाई दिए। वहां मौजूद लोगों ने इसे ‘शैतानी बाधा दूर करने’ का दावा कहा। इसी स्थिति को देखने आए कुछ अन्य ग्रामीणों ने आपत्ति व्यक्त की।
कुछ लोगों का आरोप था कि उन्हें आर्थिक प्रलोभन दिए जा रहे थे। हालांकि इस बात की पुष्टि अभी तक किसी आधिकारिक सूत्र से नहीं हुई, मगर यह दावा विवाद का आधार जरूर बन गया। कई लोगों ने कहा कि यह धार्मिक विश्वास बदलने का प्रयास हो सकता है। दूसरी ओर, कुछ ग्रामीणों ने तर्क दिया कि यह केवल एक प्रकार की वैकल्पिक प्रार्थना-पद्धति है, जिसमें गांव के लोग अपनी इच्छा से शामिल हो रहे हैं।
आस्था और भय के बीच गांव की दुविधा
गांव के बुजुर्गों का कहना है कि जो भी ग्रामीण पहुंचे, वे स्वेच्छा से पहुंचे। किसी ने न तो किसी पर दबाव डाला और न ही किसी को यहां बुलाया। बस एक उम्मीद थी कि शायद मानसिक या स्वास्थ्य पीड़ा कम हो जाए। कई महिलाएं दावा करती हैं कि उन्हें मानसिक सुकून मिला है, जबकि कुछ लोग इसे मनोवैज्ञानिक प्रभाव बताते हैं।
दूसरी ओर, कई परिवारों का कहना है कि बीमार परिजन ठीक नहीं हुए, बल्कि लोग उम्मीद में बार-बार जाने लगे। इसी कारण ग्रामीणों का एक वर्ग असंतुष्ट हो गया। कुछ युवाओं ने अभियान चलाकर विरोध जताने की योजना बनाई और कहा कि यदि ऐसे आयोजन बंद नहीं किए गए तो गांव-स्तर पर सामूहिक आंदोलन होगा।
स्थानीय स्तर पर पहुंची बात, प्रशासन सक्रिय
जब स्थिति चर्चा से आगे बढ़कर विवाद की ओर गई, तो प्रशासन और संबंधित विभागों को सूचित किया गया। अधिकारियों ने गांव जाकर स्थिति समझने की कोशिश की। यह जांच की जा रही है कि क्या सच-मुच कोई आर्थिक प्रलोभन दिया गया, क्या किसी प्रकार का दबाव बनाया गया या केवल सामान्य धार्मिक-आधारित प्रार्थना का आयोजन किया जा रहा था।
प्रशासन ने बताया कि यदि किसी भी व्यक्ति को महसूस हो कि उनके साथ धोखा हुआ है, उनसे धन-संबंधी वादे किए गए या उनकी धार्मिक स्वतंत्रता पर प्रभाव डाला गया, तो पूरी प्रक्रिया कानूनी दिशा में आगे बढ़ाई जाएगी।
गांव के सामाजिक ताने-बाने पर असर
इस घटना ने गांव में दो धाराएं बना दीं—
एक वह वर्ग जो कहता है कि अगर किसी वैकल्पिक उपाय से लोगों को राहत मिलती है, तो इसमें समस्या नहीं।
दूसरा वर्ग इसे सामाजिक-धार्मिक संतुलन के लिए खतरा मान रहा है।
गांव की चौपाल, जहां पहले खेती-पानी, बीज, मौसम, रोजगार जैसी बातें होती थीं, अब इसी विषय पर चर्चा का केंद्र बन गई है। कई परिवार आपस में बहस कर रहे हैं। बुजुर्ग रिश्तों में दरार आने से चिंतित हैं।
आर्थिक प्रलोभन की चर्चा—सत्य या भ्रम?
कई लोगों ने दावा किया कि कुछ परिवारों को कहा गया कि यदि वे नियमित रूप से प्रार्थना-सभा में आएंगे, तो उन्हें विशेष आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी। हालांकि अभी तक किसी ने किसी दस्तावेज या प्रमाण को सार्वजनिक नहीं किया। संभव है कि यह अफवाह हो या कुछ व्यक्तिगत बातचीत का बढ़ा-चढ़ाकर उल्लेख।
इस विषय पर गांव में काफी मतभेद है। कुछ के अनुसार सहायता का मतलब उपचार हेतु मदद, भोजन या राहत सामग्री हो सकती है, जबकि दूसरी ओर लोगों ने इसे ‘धर्म परिवर्तन के प्रयास’ के रूप में देखा।
गांव के लोग स्वास्थ्य सेवाओं की तलाश में क्यों जाते हैं?
ग्राम जमुनिया, आसपास के कई दूसरे गांवों की तरह, स्वास्थ्य-सुविधाओं से संघर्ष कर रहा है। प्राथमिक स्वास्थ्य-केन्द्र की दूरी कम नहीं है, और कई परिवारों में रोजाना मजदूरी पर जाने वाले लोग इलाज में पैसे खर्च नहीं कर पाते।
जब उन्हें कोई व्यक्ति यह कहता है कि बिना खर्च के वह मानसिक-शारीरिक समस्या दूर कर देगा, तो यह एक आसान विकल्प प्रतीत होता है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में महिलाएं और युवा यहां पहुंचे।
कुछ परिवारों का दावा है कि पहले-पहले उन्हें अच्छा लगा, मगर बाद में उन्हें भय हुआ कि कहीं इसके बदले उनसे कोई और अपेक्षा न रख ली जाए।
आंदोलन की चेतावनी और गांव में तनाव
दूसरे पक्ष ने स्पष्ट कहा कि यदि गतिविधि बंद नहीं हुई तो बड़े स्तर पर विरोध होगा। गांव के दो-तीन संगठित समूहों ने कहा कि वे बैठक करेंगे और एक ज्ञापन तैयार करेंगे। इसके बाद स्थानीय प्रशासन को सौंपा जाएगा। यदि उनके अनुसार संवेदनशील स्थिति बनी तो वे शांतिपूर्ण विरोध भी करेंगे।
आस्था के नाम पर संतुलित दृष्टिकोण की जरूरत
यह पूरी घटना स्पष्ट करती है कि गांवों में चिकित्सा, मानसिक सहायता और परामर्श व्यवस्था की कमी आज भी गंभीर मुद्दा है। जहां डॉक्टर, दवा और आधिकारिक उपचार जरूरी हों, वहां कई बार उम्मीद-भरी आश्वासन-आधारित सभाएं अधिक प्रभावशाली हो जाती हैं।
किसी के लिए वह आध्यात्मिक उपचार बन जाता है, किसी के लिए भ्रम, और किसी के लिए खतरे का संकेत।
संवाद, सहमति और प्रशासनिक समर्थन की आवश्यकता
वर्तमान स्थिति में सबसे आवश्यक है—
लोगों को सूचित किया जाए कि बीमारियों के वैज्ञानिक उपचार उपलब्ध हैं।
किसी भी सभा में आर्थिक या धार्मिक प्रलोभन नहीं दिया जाना चाहिए।
जो लोग स्वेच्छा से किसी प्रार्थना-सभा में जाते हैं, उनसे किसी प्रकार की अपेक्षा न रखी जाए।
ग्रामीणों, प्रशासन और सामाजिक प्रतिनिधियों के बीच खुला संवाद ही इस विवाद का शांतिपूर्ण समाधान बन सकता है।
