छिंदवाड़ा—मध्य प्रदेश का यह शहर केवल भौगोलिक पहचान भर नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक समृद्धि और लगातार चलती परंपराओं का अद्भुत संगम रहा है। शहर की अपनी एक अलग आत्मा है, जो पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक गतिविधियों से निर्मित होती है। उन्हीं पारंपरिक संपदाओं में से एक है छिंदवाड़ा की श्री रामलीला मंडल समिति।

136 वर्ष पहले जब इस समिति की स्थापना हुई थी, तब शायद किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी कि एक दिन इसकी प्रस्तुति राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान का प्रतीक बन जाएगी। उस काल से लेकर आधुनिक युग तक यह समिति अपने अस्तित्व को उसी निष्ठा, अनुशासन और धार्मिक भावना के साथ निभाती रही है। हर वर्ष दशहरे के समय पूरे शहर में उत्साह की लहर दिखाई देती है, और इसका केंद्र रहती रही है—रामलीला।
रामकथा सुनना और उसका मंचन देखना केवल धार्मिक भावनाओं का प्रदर्शन नहीं होता, बल्कि समाज के संस्कारों और आदर्शों का संवाहक भी होता है। इसी कारण छिंदवाड़ा की रामलीला केवल कार्यक्रम नहीं—एक भावनात्मक धरोहर है।
अयोध्या का निमंत्रण—‘आस्था’ का अद्भुत क्षण
इस वर्ष की प्रस्तुति ने इतिहास का नया अध्याय जोड़ा। समिति को आधिकारिक निमंत्रण लेकर एक संदेश प्राप्त हुआ—अयोध्या में रामलीला मंचन के लिए आमंत्रित किया गया।
हर कलाकार, मंच संचालक और दर्शक के लिए यह क्षण किसी सपना साकार होने जैसा था। जिस अयोध्या को श्रीराम का जन्मस्थल माना जाता है, जहाँ हर भाव-भंगिमा में रामत्व बसता है, वहां अपने अभिनय द्वारा रामकथा को जीवंत करना एक अद्भुत सम्मान है।
13 से 15 दिसंबर तक होने वाली इस प्रस्तुति को लेकर शहर में विशेष तैयारी शुरू हुई। पोशाकें तैयार की जाने लगीं, मंचीय संवादों में संशोधन हुआ, आवाज़ की गुणवत्ता, वाद्य और गीतों की रिहर्सल शुरू हो गईं। हर कलाकार अपनी भूमिका में साधना जैसा समर्पण ला रहा था।
भव्य मंच पर दिखेंगे राजा जनक—जन प्रतिनिधि मंच पर कलाकार
इस प्रस्तुति का सबसे आकर्षक पक्ष यह रहा कि छिंदवाड़ा लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित सदस्य और क्षेत्र के परिचित जनप्रतिनिधि मंच पर अभिनय करेंगे। क्षेत्र के सांसद बंटी विवेक साहू इस बार मिथिला नरेश राजा जनक की भूमिका निभाएंगे।
जनक केवल पात्र नहीं, बल्कि आदर्श पिता और ज्ञान के धनी पात्र के रूप में जाने जाते हैं। उनके जीवन की गंभीरता, उनकी मर्यादा और उनकी करुणा को मंच पर रूप देना किसी भी कलाकार के लिए चुनौतीपूर्ण होता है।
दरअसल, जब कोई सत्ताधारी व्यक्ति मंचीय कला में उतरता है, तो लोगों की अपेक्षाएँ और भी बढ़ जाती हैं। समाज यह देखता है कि राजनीतिक व्यक्तित्व के पीछे कितना सांस्कृतिक, सौम्य और भावनात्मक पक्ष छिपा होता है।
संसद भवन का मंच और रामलीला का मंच अलग है, पर एक समानता है—दोनों के केंद्र में समाज की सेवा होती है।
पुरानी यादें, पुराने पोशाक और नया ज़माना
वर्षों पहले छिंदवाड़ा की रामलीला में ऐसे दृश्य होते थे जब कोई डिज़ाइनर कॉस्ट्यूम उपलब्ध नहीं होते थे। घर की महीन रेशमी साड़ियों से राम और सीता की पोशाकें बनती थीं। वगैरह कपड़ों को सोने जैसे किनारों से सजाया जाता था।
मंच पर खड़े कलाकार लकड़ी की तलवार, चमकदार कागज़ की मुकुट और हाथ से तैयार की गई ढालें लेकर मंच पर उतरते थे।
आज आधुनिक रोशनी, साउंड, सेट, सैकड़ों दर्शकों की डिजिटल रिकॉर्डिंग और सोशल प्रसारण वही कथा आधुनिक रूप में दर्शाती है।
पर एक बात अब भी वैसी ही है—भक्ति।
समाज की सहभागिता—व्यक्ति नहीं, भावनाएं मंचित होती हैं
रामलीला के मंचन की तैयारी केवल कलाकारों तक सीमित नहीं है। पूरा शहर सहयोग करता है।
कभी कोई रथ देने आता है,
कभी कोई मेकअप का खर्च उठा लेता है,
कभी कोई मंच सजाने का जिम्मा ले लेता है।
हर घर में चर्चा होती है कि किस दृश्य में कौन भूमिका निभा रहा है। बच्चे संवाद याद करते हैं। महिलाएँ गीतों की धुन बनाती हैं।
अपने शहर का नाम अयोध्या में मंचित होना स्वयं में सामूहिक उत्सव है।
अयोध्या में मंचन—कथा का मिलन स्थल
अयोध्या में जिस स्थान पर मंचन होगा, वह दर्शकों और श्रद्धालुओं से भरा रहेगा। वहां हर व्यक्ति केवल दर्शक नहीं, बल्कि राम के चरित्र का सहभागी होता है।
छिंदवाड़ा की समिति इस मंच पर एक संदेश लेकर पहुंचेगी—
कि हजार मील दूर भी, राम का भाव नहीं बदलता।
सीता का सम्मान नहीं बदलता।
हनुमान की शक्ति नहीं बदलती।
लक्ष्मण की त्याग भावना नहीं बदलती।
समय बदला, पर रामायण नहीं।
शहर में उत्साह—आशा, गर्व और प्रतीक्षा
जैसे-जैसे तिथियाँ निकट आईं, शहर की सड़कों, चौक-चौराहों, सामाजिक मंचों पर इस आयोजन की चर्चा बढ़ती गई।
लोगों में भावनाएँ उमड़ने लगीं—
किसी बुज़ुर्ग ने कहा— “मेरे दादाजी मंच पर राम बनते थे।”
किसी माँ ने कहा— “मेरी बेटी सीता बनेगी।”
और अब इस बार लोग कह रहे हैं—
“हमारे प्रतिनिधि राजा जनक बनेंगे।”
ऐसा अवसर वर्षों में एक बार आता है।
