भारतीय सभ्यता की पहचान उसके त्योहारों, दर्शन, सामाजिक मूल्यों और सांस्कृतिक धरोहरों में निहित है। इन धरोहरों के बीच दीपावली वह पर्व है, जिसकी जड़ें केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना, ऐतिहासिक संदर्भ और आध्यात्मिक दर्शन तक विस्तृत हैं। इसी सांस्कृतिक परंपरा को एक महत्वपूर्ण वैश्विक सम्मान प्राप्त हुआ है, जब दीपावली को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में आधिकारिक रूप से शामिल कर लिया गया। यह निर्णय भारतीय परंपरा और सांस्कृतिक मूल्य संरचना के सम्मान का वह रुप है, जो विश्व स्तर पर समाज की भागीदारी, परंपराओं की निरंतरता और सांस्कृतिक विरासत की जीवंतता को प्रमाणित करता है।

वैश्विक व्याख्या और निर्णय प्रक्रिया
वर्ष 2025 भारत के लिए सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत विशिष्ट वर्ष साबित हुआ। दिल्ली में आयोजित एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक बैठक में विशेषज्ञ मंडल के समक्ष भारतीय पक्ष ने दीपावली पर्व की विशेषताओं, उसकी ऐतिहासिक निरंतरता, समाज में इसकी स्वीकार्यता, पारिवारिक व्यवस्था में इसकी भूमिका और वैश्विक प्रवासी समुदाय में इसके प्रसार को विस्तार के साथ प्रस्तुत किया। विशेषज्ञों ने यह पाया कि दीपावली मात्र एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों को सुदृढ़ करने वाला, पीढ़ियों में सांस्कृतिक स्थानांतरण सुनिश्चित करने वाला और आर्थिक, पारिवारिक और नैतिक ताने-बाने को सुदृढ़ करने वाला त्योहार है।
इसी विचार के आधार पर दीपावली को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत सूची में शामिल करने का निर्णय लिया गया। निर्णय की घोषणा होते ही यह स्पष्ट हो गया कि अब दीपावली भारतीय सांस्कृतिक पहचान की दृष्टि से वैश्विक धरोहरों की श्रेणी में पंजीकृत हो चुकी है।
दीपावली का ऐतिहासिक स्वरूप और दार्शनिक आधार
दीपावली की उत्पत्ति धार्मिक कथाओं में अवश्य दिखाई देती है, परंतु इन कथाओं के भीतर भारतीय दृष्टि और जीवन-दर्शन प्रमुख रूप से विद्यमान हैं। इस पर्व का एक प्रमुख आधार श्रीराम के अयोध्या लौटने का प्रसंग है, जहाँ समस्त नगरवासियों ने प्रकाश उत्सव से अपने प्रिय राजा का स्वागत किया। यह प्रसंग उस भावनात्मक एकजुटता का प्रतीक है, जिसमें समाज के प्रत्येक वर्ग ने अपने राजा की उपलब्धि को सांस्कृतिक रूप से स्वीकार किया।
दूसरी महत्वपूर्ण कथा श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर के वध से जुड़ी है। यह प्रसंग अंधकारपूर्ण सत्ता, अन्याय और उत्पीड़न पर नैतिक विजय का संकेत देता है। यह संकेत भारतीय समाज में धर्म, नीति और दैवी संरक्षण के स्वरूप को परिभाषित करता है।
तीसरा प्रमुख संदर्भ समुद्र मंथन की कथा में देखा जाता है, जिसमें माता लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ। लक्ष्मी को केवल धन की देवी नहीं, बल्कि “सौभाग्य, सुशासन, समृद्धि और सामंजस्य” का प्रतीक माना गया। इस संदर्भ में दीपावली उस वैचारिक ऊर्जा का प्रतीक रूप लेती है, जो समाज को उन्नति और नैतिक संतुलन की राह पर अग्रसर करती है।
पर्व का सामाजिक प्रभाव
यदि सामाजिक संरचना का परीक्षण किया जाए, तो यह तथ्य स्पष्ट होता है कि दीपावली भारतीय समाज में पारिवारिक एकजुटता, आपसी विश्वास, आर्थिक सक्रियता और नैतिक रीति-नीति का प्रमुख स्रोत है। दीपावली से पूर्व सफाई, व्यवस्था, वृहद धार्मिक आयोजन, घरों में सजावट, दीप प्रज्ज्वलन और पूजन प्रक्रिया सामाजिक एकता का सशक्त मंच निर्मित करते हैं।
इस समय पूरे देश में बड़े स्तर पर आर्थिक गतिविधियों का विस्तार होता है। खुदरा व्यापार, हस्तकला, गृह-निर्माण सामग्री, फूल, मिठाइयों, वस्त्रों, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तथा स्वदेशी उत्पादों की मांग में तीव्र वृद्धि होती है। छोटे व्यापारियों, ग्रामीण कारीगरों और बुनकर समुदाय को इस पर्व से विशेष आय का स्रोत मिलता है।
प्रवासी भारतीय समुदाय में दीपावली
विश्व के अनेक देशों में भारतीय मूल की जनसंख्या के विस्तार ने भी दीपावली के वैश्विक प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, जापान, मॉरीशस, फिजी, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों में दीपावली उत्सव अब सामुदायिक भूमिका निभाता है। वहां कार्यस्थलों, विश्वविद्यालयों, सांस्कृतिक क्लबों, राजनयिक दफ्तरों और स्थानीय प्रशासनिक संस्थाओं में दीपावली दिवस के आयोजन होते हैं।
इस आयोजन में प्रमुखत: दीप प्रज्ज्वलन, लोकसंगीत, भारतीय परिधान प्रदर्शन, पारंपरिक भोजन और धार्मिक अनुष्ठानों का रंग दिखाई देता है। इसके माध्यम से भारतीय संस्कृति का प्रचार जिस सम्मानजनक रूप में सामने आता है, वह आज वैश्विक नागरिकता के एक सांस्कृतिक अध्याय के रूप में माना जाता है।
यूनेस्को सूची में शामिल होने का महत्व
यूनेस्को की किसी विरासत सूची में शामिल होना एक ऐसी मान्यता है, जो किसी भी परंपरा की ऐतिहासिक निरंतरता, समाज द्वारा संरक्षण और सांस्कृतिक प्रभाव को आधिकारिक रूप से स्वीकार करती है। इसका अर्थ यह भी है कि इस विरासत से संबंधित सांस्कृतिक अभ्यास, आने वाली पीढ़ियों में सुरक्षित रूप से स्थानांतरित किए जाएंगे।
दीपावली के संदर्भ में इस निर्णय का प्रभाव आने वाले वर्षों में अधिक दिखाई देगा। विभिन्न सांस्कृतिक संस्थानों में दीपावली पर विशेष शोध अध्याय बनाए जाएंगे। विश्वविद्यालयों में सांस्कृतिक अध्ययन कार्यक्रम में इस पर्व को संदर्भित किया जाएगा। संग्रहालयों, अभिलेखागारों और सांस्कृतिक दस्तावेजों में दीपावली संबंधित सामग्री संरक्षित की जाएगी।
विवेचना और निष्कर्ष
यह स्पष्ट है कि दीपावली का वैश्विक विरासत में शामिल होना केवल धार्मिक अवसर का सम्मान नहीं, बल्कि भारतीय सामाजिक एकता, मानव संबंधों की प्रकृति, दार्शनिक भावबोध और सांस्कृतिक सृजनशीलता का आधिकारिक अनुमोदन है। भारत सदियों से मानव सभ्यता को ज्ञान, दर्शन और न्यायोन्मुख दृष्टि देता रहा है। इस संदर्भ में दीपावली विश्व की सांस्कृतिक सूची में वह प्रतीक बन गई है, जो प्रकाश, समन्वय और सामंजस्य की विरासत को आगे बढ़ाती है।
दीपों की यह श्रृंखला केवल प्रकाश की छवि नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का वह स्वरूप है, जो अंधकार से विमुक्त होकर समाज को सभ्यता के केंद्र तक पहुंचाती है।
