उत्तर कोरिया एक ऐसा देश है, जिसके बारे में दुनिया के बहुत सीमित पहलू सामने आ पाते हैं। बंद सीमाएं, सीमित संवाद, बाहरी तकनीक से कटाव, नागरिकों पर नियंत्रण, सख्त नियम और केंद्रीकृत तंत्र—इन सबके बीच अक्सर जो खबरें बाहर आती हैं, वे किसी गहरे संकट का संकेत बनकर सामने खड़ी होती हैं। हाल ही में सामने आया तथ्य यही दर्शाता है कि वहां की व्यवस्था अब एक अभूतपूर्व समस्या से जूझ रही है। यह समस्या हथियारों, तेल, खाद्य सामग्री या रोजगार से जुड़ी नहीं, बल्कि कागज से संबंधित है। ऐसा बताया जा रहा है कि उत्तर कोरिया में कागज की कमी इतनी गंभीर हो गई है कि सरकारी दस्तावेज़, अखबारों की छपाई, शैक्षणिक सामग्री और यहां तक कि बैंक नोटों की प्रिंटिंग भी प्रभावित होने लगी है।

यह संकट सिर्फ कागज का नहीं है, बल्कि उस मानसिकता और प्रणाली का प्रतीक है, जो वर्षों से खुद को बाहरी संरचनाओं, वैश्विक व्यापार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से काटकर चल रही है। कागज जैसी वस्तु जिस पर दुनिया में शायद ही कभी आपातकाल जैसा असर आता हो, वहां राष्ट्रीय प्राथमिकता बन गई है। यह स्थिति बता रही है कि आर्थिक ढांचे में कितनी कमी है और प्रयास कितने सीमित।
कागज क्यों खत्म हो गया? मूल कारण क्या हैं?
उत्तर कोरिया में कागज की कमी अचानक से पैदा नहीं हुई। यह एक धीरे-धीरे बढ़ती समस्या थी, जो हाल ही में उफान पर पहुंच गई। वहां की सरकारी कागज उत्पादन इकाइयां लंबे समय से पुराने ढांचे और मशीनरी के सहारे चल रही थीं। पाया गया है कि वहां की फैक्ट्रियों में लकड़ी आधारित पल्प उत्पादन ना केवल अत्यंत कम क्षमता पर है बल्कि तकनीकी रूप से पिछड़ा भी।
उत्तर कोरिया मुख्य रूप से स्थानीय लकड़ी पर निर्भर रहा है, लेकिन पिछले दो दशकों में वहां बड़े पैमाने पर जंगलों की कटाई हुई। इस कटाई के पीछे कृषि विस्तार, सैन्य संरचना निर्माण और भौतिक संसाधनों की कमी की वजहें प्रमुख मानी जा रही हैं। कम जंगल होने से कागज के लिए जरूरी सेलुलोज पल्प भी घटता गया और धीरे-धीरे कागज उत्पादन धीमा पड़ता गया।
इसके अतिरिक्त जहां अन्य देश रिसायकल्ड पेपर का उपयोग करते हैं, वहां रिसाइक्लिंग सिस्टम लगभग मौजूद ही नहीं। बंद अर्थव्यवस्था के चलते उत्तर कोरिया बाहरी देशों से कच्चा माल नहीं ला सकता। संयुक्त राष्ट्र और अन्य राष्ट्रों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने स्थिति को और जटिल कर दिया है। नतीजा यह हुआ कि देश अब अपनी सबसे मूलभूत वस्तुओं में भी आत्मनिर्भर नहीं रह गया।
अखबारों के प्रकाशन पर असर: सूचना तंत्र कमजोर
उत्तर कोरिया में सूचना का प्रवाह नियंत्रित रहता है। बाहरी मीडिया नहीं पहुंच पाता और वहां के नागरिक वही पढ़ते और जानते हैं, जो सरकारी माध्यमों से सामने आता है। लेकिन हालात इस कदर बिगड़े कि वहां सरकारी समाचार प्रकाशन भी सीमित हो गए।
बताया यह जा रहा है कि अखबारों के संस्करण पहले जितनी प्रतियों में नहीं निकल पा रहे। कई स्थानों पर स्थानीय समाचार पत्र अब सप्ताह में 2 से 3 दिन ही प्रकाशित हो रहे हैं। विद्युत कटौती की वजह से पहले ही प्रिंटिंग व्यवस्था सीमित है, अब कागज की कमी ने इस तंत्र को और गंभीर झटका दिया।
किसी भी देश में अखबार के माध्यम से सरकार अपने नागरिकों तक संदेश, निर्देश, नियम और चेतावनी पहुंचाती है। ऐसे में यह कमी सिर्फ एक वस्तु की कमी नहीं, बल्कि संवादहीनता की स्थिति निर्मित कर रही है।
शिक्षा प्रणाली पर सीधा असर
उत्तर कोरिया की शिक्षा प्रणाली में भौतिक सामग्री यानी किताबें एक केंद्रीय तत्व हैं। सरकारी पाठ्यक्रमों की पुस्तकों की आपूर्ति पहले भी सीमित थी, किंतु अब नई पुस्तकों की छपाई लगभग बंद जैसी स्थिति में आ चुकी है। जानकारी मिली है कि कई शहरों में छात्रों को पुराने फटे हुए संस्करणों से पढ़ाया जा रहा है।
शिक्षा संस्थानों में एक ही पुस्तक कई विद्यार्थियों को मिलकर पढ़ानी पड़ रही है, कई जगह शिक्षक अपनी नोटबुकों से सामग्री डिक्टेट करके बच्चों को लिखवाते हैं। यह ऐसी विडंबना है जिसमें आधुनिक युग मोबाइल शिक्षा, ऑनलाइन क्लास और स्मार्ट लर्निंग की बात करता है लेकिन वहां बुनियादी कागज तक उपलब्ध नहीं।
बैंक नोट छपाई पर संकट: आर्थिक व्यवस्था प्रभावित
कागज की कमी ने राष्ट्रीय मुद्रा की छपाई पर भी असर डाला है। यह बात अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि किसी भी राष्ट्र की आर्थिक विश्वसनीयता उसकी मुद्रा और बैंकिंग प्रणाली पर टिकी होती है।
सूत्र बताते हैं कि वहां अब नई नोट श्रृंखला अस्थायी रूप से रोक दी गई। देश कई सालों से डिजिटल लेनदेन की दिशा में नहीं बढ़ा, इसलिए नकद मुद्रा की मांग अधिक है। जब आपूर्ति रुकती है, तो नकदी प्रवाह में ठहराव पैदा होने लगता है।
यह स्थिति आगे चलकर महंगाई, ब्लैक मार्केटिंग और अवैध करेंसी बदलवाने जैसे परिणाम दे सकती है।
तानाशाही शासन पर सवाल और नागरिकों का मौन दर्द
उत्तर कोरिया की राजनीतिक व्यवस्था में कोई भी सार्वजनिक विरोध संभव नहीं। जनता अपने देश के हालात पर बोल नहीं सकती। किसी को पता भी नहीं चलता कि भीतर असहमति या दुख कितना है। कागज का संकट उन कई परेशानियों में से बस एक है, जिनके बारे में बाहरी दुनिया को समय-समय पर जानकारी मिलती है।
आम नागरिकों की समस्याएं और खर्च बढ़ रहे हैं। स्टेशनरी दुकानों में कागज़ चाहे रजिस्टर के रूप में हो या ऑफिस पेपर—उसकी कीमत कई गुना बढ़ चुकी है। कई परिवार अपने बच्चों को कॉपी खरीदकर नहीं दे पा रहे।
संकट से निकलने के प्रयास
बताया गया है कि संकट को देखते हुए सरकार ने नए कारखानों के निर्माण के आदेश दिए। सरकार चाहती है कि देश फिर से खुद कागज बना सके, लेकिन यह आसान नहीं।
नए कारखानों के लिए मशीनरी, विशेषज्ञता, तकनीकी ज्ञान और कच्चे माल की जरूरत होती है। इनमें से कई चीजें देश में उपलब्ध नहीं हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि कागज उत्पादन जैसी औद्योगिक संरचना तैयार करना कम से कम कई वर्षों का काम है।
अनिश्चित भविष्य
आज की स्थिति में उत्तर कोरिया में सिर्फ संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि एक संकुचित सामाजिक तंत्र भी है जो नागरिकों को नए विकल्प और नई दिशा नहीं देता। आगे क्या होगा इसका कोई स्पष्ट अनुमान नहीं। शायद सरकार जल्द समाधान ढूंढ ले, या शायद स्थिति और बिगड़ जाए। लेकिन इतना अवश्य है कि कागज जैसी सादी वस्तु के संकट ने देश के प्रशासनिक स्तंभों को हिला दिया है।
