दुनिया जिस समय तकनीकी क्रांति के सबसे निर्णायक दौर से गुजर रही है, उसी समय एक छोटा लेकिन भू-रणनीतिक रूप से अत्यंत महत्त्वपूर्ण देश, म्यांमार, महाशक्तियों के बीच एक नए संघर्ष का मैदान बन चुका है। यह संघर्ष हथियारों का, शक्ति का और वैश्विक वर्चस्व का है, पर असली निशाना कुछ और है। यह लक्ष्य उन अत्यंत दुर्लभ खनिजों पर कब्जा करना है जिनके बिना आधुनिक तकनीक, शक्तिशाली सैन्य हथियार और इलेक्ट्रिक ऊर्जा संचालित भविष्य की दुनिया की कल्पना अधूरी है।

म्यांमार दक्षिण-पूर्व एशिया का वह पर्वतीय देश है जो भारत, चीन और थाईलैंड के बीच एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सेतु की तरह स्थित है। यह भूगोल उसे केवल क्षेत्रीय राजनीति ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर भी निर्णायक स्थान देता है। हालांकि उसके भीतर पिछले एक दशक से उभर रहे गृहयुद्ध और सत्ता संघर्ष ने उसकी संवेदनशीलता को और बढ़ा दिया है। ऐसे अस्थिर माहौल में दुनिया की बड़ी शक्तियां अपना प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं। पर इस बार लक्ष्य सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि उन रेयर अर्थ मिनरल्स की दावेदारी है जो भविष्य के तकनीकी साम्राज्य को मजबूत बनाएंगे।
म्यांमार के उत्तर में स्थित कचिन प्रदेश की पहाड़ियों में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा दुर्लभ खनिज भंडार मौजूद है। इनमें से एक प्रमुख खनिज है डिस्प्रोसियम। यह धातु उन प्रिसिजन गाइडेड हथियारों, मिसाइलों, इलेक्ट्रिक वाहनों और अत्याधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाती है जिनकी मांग आने वाले वर्षों में कई गुना बढ़ने वाली है। जो देश इन खनिजों पर नियंत्रण बनाएगा, उसका तकनीकी और सैन्य वर्चस्व कई दशकों तक मजबूत रहेगा।
चीन इस खेल में सबसे पहले कूद पड़ा। साल 2021 में म्यांमार में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद जब पश्चिमी देशों ने वहां की सेना पर प्रतिबंध लगाए, तब चीन ने इस स्थिति को अवसर में बदला। उसने म्यांमार की सेना को हथियार, वित्तीय सहायता और राजनीतिक संरक्षण देकर उत्तर क्षेत्र की खदानों पर अपनी पकड़ मजबूत की। म्यांमार से निकाले जाने वाले लगभग 80 प्रतिशत महत्वपूर्ण खनिज चीन के कब्जे में पहुंचने लगे। चीन ने इन्हें बिना प्रोसेस किए अपनी घरेलू फैक्ट्रियों में भेज दिया और अपने रेयर अर्थ उत्पादन को मजबूत किया।
परंतु यह स्थिति स्थायी नहीं रही। म्यांमार के कचिन इलाके में सक्रिय कचिन इंडिपेंडेंस आर्मी और कई अन्य विद्रोही समूहों ने पिछले दो वर्षों में सेना के खिलाफ लगातार बढ़त बनाई। उनकी गतिविधि बढ़ने से चीन के खनन कार्यों पर रोक लगने लगी। कई खदानें बंद हो गईं। चीन का रसद मार्ग खतरे में आ गया और उसका म्यांमार पर प्रभाव कमजोर होने लगा। यही वह समय था जब अमेरिका ने अंदर प्रवेश की कोशिश की।
अमेरिका ने म्यांमार के सैन्य नेतृत्व के साथ संपर्क बढ़ाए। उनके लिए कई प्रतिबंधों में ढील दी गई, जिससे नए रास्ते खुल सके। थाईलैंड के चियांग माई कांसुल के माध्यम से अमेरिकी खुफिया एजेंसियों की मौजूदगी तेजी से बढ़ी। उनका उद्देश्य दोहरा था। पहला, चीन के प्रभुत्व को चुनौती देना। दूसरा, रेयर अर्थ खनिजों तक पहुंच बनाना। लेकिन अमेरिका यह समझ गया कि म्यांमार में बिना भारत की भूमिका के स्थिर जमीन बनाना संभव नहीं है।
भारत की स्थिति इस पूरे परिदृश्य में बेहद खास है। एक ओर वह म्यांमार का सीधा पड़ोसी है और उत्तर-पूर्व का बड़ा हिस्सा म्यांमार से कनेक्टिविटी पर निर्भर करता है। दूसरी ओर भारत ने हाल के वर्षों में अपनी मिनरल प्रोसेसिंग तकनीक में महत्वपूर्ण प्रगति की है। भारत ने 2025 में शुरू किए गए नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन के तहत विदेशी खदानों के अधिग्रहण, उन्नत प्रोसेसिंग, और अनुसंधान सुविधाओं को विस्तार दिया है। खनिज विदेश लिमिटेड यानी काबिल पहले से ही अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया में रेयर अर्थ और महत्वपूर्ण खनिजों की खोज में लगी है।
भारत ने म्यांमार के साथ वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग बढ़ाने के लिए भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग और म्यांमार सरकार के बीच वार्ताएं तेज कर दी हैं। कचिन क्षेत्र के पहाड़ों में मौजूद खनिजों की संभावनाओं पर दो देशों के वैज्ञानिक संयुक्त अध्ययन कर रहे हैं। भारत इस बात को अच्छी तरह समझता है कि रेयर अर्थ खनिजों पर नियंत्रण भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा, तकनीकी विकास और रक्षा तैयारियों का आधार होगा। इसलिए भारत इस दौड़ में सिर्फ एक साझेदार नहीं, बल्कि एक उभरता हुआ निर्णायक पावर प्लेयर है।
क्वाड देशों की एंट्री से यह समीकरण और दिलचस्प हो गया है। भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया मिलकर भारत के उत्तर-पूर्व को रेयर अर्थ प्रोसेसिंग हब के रूप में विकसित करने पर काम कर रहे हैं। इसका उद्देश्य चीन को उसकी दशकों से चली आ रही रेयर अर्थ मोनोपॉली से बाहर धकेलना है। चीन दुनिया का लगभग 90 प्रतिशत रेयर अर्थ प्रोसेस करता है और यह स्थिति वैश्विक सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक मानी जाती है। यदि चीन इन खनिजों की आपूर्ति रोक दे तो दुनिया की मिलिट्री टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक्स और ग्रीन एनर्जी सेक्टर पर गंभीर असर पड़ेगा।
भारत की एंट्री इस कहानी का सबसे निर्णायक हिस्सा बन रही है। चीन जानता है कि भारत की भू-सामरिक स्थिति, तकनीकी उन्नति, और वैश्विक साझेदारियां उसके लिए चुनौती खड़ी कर सकती हैं। यही कारण है कि म्यांमार का यह संघर्ष सिर्फ क्षेत्रीय मसला नहीं रह गया है, बल्कि एक बड़े वैश्विक शक्ति संतुलन का केंद्र बन चुका है।
आने वाले वर्षों में म्यांमार एक ऐसा भू-राजनीतिक युद्धक्षेत्र रहेगा जहां हथियारों से ज्यादा खदानों की रक्षा होगी, और सैनिकों से ज्यादा वैज्ञानिकों व कंपनियों की उपस्थिति बढ़ेगी। यहां की धरती के भीतर छिपे खजाने आने वाले समय की तकनीक, युद्ध रणनीतियों और आर्थिक साम्राज्य का भविष्य तय करेंगे। और इस नए युग में भारत की भूमिका हर गुजरते महीने के साथ और मजबूत होती दिखाई दे रही है।
भारत, चीन और अमेरिका की इस प्रतिस्पर्धा में सवाल यह नहीं है कि कौन म्यांमार में किस समूह का समर्थन कर रहा है। असली प्रश्न यह है कि रेयर अर्थ के नियंत्रण से विश्व शक्ति संरचना का भविष्य कैसा आकार लेगा। यह एक शांत लेकिन अत्यंत निर्णायक युद्ध है, जिसके नतीजे अगले कई दशकों तक वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेंगे।
