इंदौर में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर गंभीर सवालों ने जन्म लिया है। चंदन नगर थाना पुलिस से जुड़े पहले विवाद में सुप्रीम कोर्ट की सख्त फटकार झेलने के बावजूद भी इंदौर पुलिस ने सुधार की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। अब खजराना थाना क्षेत्र में जो नया खुलासा सामने आया है, उसने यह साफ कर दिया है कि गवाह तैयार करने की मनमानी सिर्फ एक थाने तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह एक बड़ा संगठित और सोचा-समझा घोटाला था।

खजराना पुलिस ने हत्या, दुष्कर्म, लूट, पॉक्सो और एनडीपीएस जैसे बेहद संवेदनशील और गंभीर अपराधों के 1250 मामलों में दो व्यक्तियों को गवाह बनाकर सभी मामलों में उनका नाम जोड़ दिया। उनमें से 333 मामले ऐसे थे जिन्हें अत्यंत गंभीर अपराध की श्रेणी में रखा जाता है। यह तथ्य जितना चौंकाता है, उतना ही यह भी उजागर करता है कि गवाहों की विश्वसनीयता और न्यायिक प्रक्रिया के साथ किस तरह खिलवाड़ किया गया।
सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि इन ‘गवाहों’ में से कई को तो यह तक नहीं पता था कि वे इतने मामलों में गवाही दे चुके हैं। पुलिस कर्मचारियों ने न केवल उनके नाम गवाह के रूप में जोड़ दिए, बल्कि उनके नकली हस्ताक्षर कर उनके नाम से बयान भी दर्ज कर दिए। यह पूरा मामला न्यायप्रणाली के साथ एक खतरनाक मजाक जैसा प्रतीत होता है।
सुप्रीम कोर्ट की फटकार का भी नहीं पड़ा असर
कुछ समय पहले चंदन नगर थाना पुलिस की इसी तरह की कार्यप्रणाली पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी। उस मामले में 165 मामलों में मात्र दो गवाहों के नाम सामने आए थे, जिसे देखकर अदालत बेहद नाराज हुई थी। न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने तत्कालीन थाना प्रभारी इंद्रमणि पटेल को कड़ी फटकार लगाई थी और कहा था कि वे उस कुर्सी पर बैठने योग्य नहीं हैं। यह टिप्पणी बताती है कि मामले की गंभीरता अदालत ने किस स्तर पर महसूस की थी।
लेकिन सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इतनी कड़ी आलोचना और देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा साधारण से अधिक कठोर टिप्पणी के बावजूद भी संबंधित अधिकारी पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। परिणामस्वरूप खजराना थाना क्षेत्र में एक और बड़ा गवाह घोटाला उजागर हो गया।
फर्जी गवाह कांड की जांच शुरू
खजराना में नए गवाह घोटाले के सामने आने के बाद पुलिस कमिश्नर ने जोन 1 के डीसीपी कृष्ण लालचंदानी को जांच सौंपी है। रिपोर्ट के अनुसार मजदूरी करने वाले इरशाद पुत्र अब्दुल हकीम और नवीन पुत्र रामचंद्र चौहान को यहां के पुलिसकर्मी वर्षों से अपना ‘पॉकेट गवाह’ बनाकर इस्तेमाल करते रहे। 2022 से 2023 के बीच जितने भी गंभीर अपराधों के केस दर्ज हुए, उन सभी में इन दोनों के नाम गवाह के रूप में जोड़ दिए गए।
प्रारंभिक जांच तत्कालीन एसीपी जयंत सिंह राठौर ने की थी। उनके द्वारा भेजी गई रिपोर्ट के आधार पर कमिश्नर ने विभागीय जांच बैठाई। जांच में एक और बड़ा खुलासा हुआ कि इरशाद और नवीन के अलावा गणेश और शिवदिन नाम के दो और व्यक्तियों को भी कई मामलों में गवाह बनाया गया था।
इन सभी से पूछताछ में जो तथ्य सामने आए, उसने पुलिस विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया। इन्होंने बताया कि उनका थाने में उठना-बैठना रहता है और कई पुलिसकर्मियों से उनकी जान-पहचान है। गवाह न मिलने पर पुलिस वाले खुद ही उनके नकली हस्ताक्षर कर देते थे। यह तक खुलासा हुआ कि कई मामलों में उन्हें कोर्ट में बुलाकर बयान भी दर्ज करवा लिया गया, जबकि उन्हें खुद यह पता नहीं था कि वे किस मामले में क्या कह रहे हैं।
गवाहों का बड़ा खुलासा: पुलिस खुद करती थी नकली हस्ताक्षर
जांच के दौरान गवाहों ने स्पष्ट कहा कि उन्हें केवल कुछ मामलों की जानकारी थी, लेकिन अधिकांश मामलों में उनके हस्ताक्षर फर्जी थे। पुलिसकर्मी मौके पंचनामा, गिरफ्तारी पंचनामा, जब्ती पत्रक और कोर्ट में पेश होने वाले दस्तावेजों में उनके नाम लिख देते थे और वहां भी जाली हस्ताक्षर कर दर्ज कर देते थे।
यह सिर्फ एक अनियमितता नहीं है, बल्कि यह न्यायिक प्रक्रिया में प्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप और धोखाधड़ी का स्पष्ट उदाहरण है। न्याय व्यवस्था इस तथ्य पर आधारित होती है कि प्रत्यक्षदर्शी या दस्तावेजी गवाह सत्य बोलते हैं और विश्वसनीय होते हैं। लेकिन जब एक ही व्यक्ति को सैकड़ों मामलों में गवाही के नाम पर पेश कर दिया जाए, तो यह पूरी व्यवस्था पर बड़ा सवाल उठाता है।
गवाहों की भूमिका और कानून व्यवस्था के लिए खतरे
गवाह न्यायिक प्रणाली की नींव माने जाते हैं। यदि गवाही झूठी हो या उसमें छेड़छाड़ की गई हो, तो पूरी न्याय प्रणाली का ढाँचा हिल सकता है। अपराधी छूट सकते हैं, निर्दोष लोग सजा भुगत सकते हैं और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि जनता का पुलिस और न्यायालय पर से विश्वास डगमगा सकता है।
1250 मामलों में दो लोगों को गवाह बनाना और 333 गंभीर मामलों में उनका उपयोग करना कानून की पूरी आत्मा के खिलाफ है। ऐसा लगता है कि पुलिस सिर्फ फाइलें बंद करने और केस मजबूत दिखाने के उद्देश्य से ही यह करतब करती रही। यह क्रिया किसी भी सभ्य समाज में अस्वीकार्य है और अपराध नियंत्रण के नाम पर की गई इस कार्यप्रणाली ने समाज में न्याय के प्रति गंभीर चिंता पैदा की है।
जांच का भविष्य और जिम्मेदारी तय करने का दबाव
अब जब मामला सामने आ चुका है, विभागीय जांच बैठ चुकी है और नोटिस भी जारी किए जा चुके हैं, सभी की नजरें इस पर हैं कि दोषियों पर किस स्तर की कार्रवाई की जाएगी। यह मात्र विभागीय कार्रवाई का मसला नहीं है, बल्कि समाज में भरोसे को बहाल करने का प्रश्न है।
इंदौर जैसे बड़े शहर में जब पुलिस स्वयं इस प्रकार के घोटाले करे, तो अन्य जिलों में कानून व्यवस्था कितनी मजबूत है, इस पर भी गंभीर सवाल उठते हैं। न्यायिक तंत्र और मीडिया का दबाव अब पुलिस विभाग पर बढ़ रहा है कि वह इस पूरे मामले में पारदर्शी जांच करे और गवाहों के दुरुपयोग के लिए जिम्मेदार सभी अधिकारियों को चिन्हित कर उन पर कड़ी कार्रवाई की जाए।
निष्कर्ष: न्याय व्यवस्था को सुधारने की आवश्यकता
इंदौर का यह गंभीर गवाह घोटाला केवल एक जिला या थाने का मामला नहीं है। यह पूरे पुलिस ढांचे की खामियों और न्याय प्रणाली के प्रति लापरवाही को उजागर करता है। यह घटना उस बड़ी समस्या की छोटी झलक है जिसके कारण वर्षों से न्याय में देरी, गलत फैसले और अपराधियों के बच निकलने की घटनाएँ बढ़ती रही हैं।
यदि इस बार सख्त और पारदर्शी कार्रवाई नहीं हुई तो पुलिस की विश्वसनीयता जनमानस में और भी कम हो जाएगी। समाज और व्यवस्था की मजबूती इसी में है कि कानून के साथ खिलवाड़ करने वालों को किसी भी पद पर रहते हुए बख्शा न जाए।
