मध्यप्रदेश में 11 दिसंबर 2025 का दिन भ्रष्टाचार के खिलाफ निर्णायक जंग की तरह दर्ज हो गया। यह वह दिन था जब प्रदेश के पांच विभिन्न जिलों में लोकायुक्त ने अपनी तेज़, योजनाबद्ध और लगातार की गई कार्रवाई के परिणामस्वरूप पांच अलग-अलग सरकारी विभागों के अधिकारी और कर्मचारी रिश्वत लेते हुए रंगेहाथ पकड़े गए। यह पहली बार नहीं था जब लोकायुक्त ने कार्रवाई की हो, लेकिन एक ही दिन में पांच मामलों का उजागर होना अपने आप में इस बात का संकेत है कि प्रदेश में भ्रष्टाचार कितना गहरा पैठा हुआ है और उसकी जड़ों तक पहुंचने के लिए एजेंसियां किस तरह प्रयासरत हैं।

लोकायुक्त की टीमों द्वारा विदिशा, झाबुआ, नरसिंहपुर, शिवपुरी और बालाघाट में की गई इन कार्रवाइयों ने प्रदेश ब्यूरोक्रेसी में हलचल पैदा कर दी। कई विभागों में बैठकों का दौर शुरू हुआ, वरिष्ठ अधिकारियों ने तुरंत समीक्षा बैठकें बुलाईं, जबकि कई सरकारी कार्यालयों में बेचैनी और खामोशी का वातावरण बन गया। यह माहौल केवल उन कर्मचारियों तक सीमित नहीं था जो सीधे तौर पर जांच के दायरे में थे, बल्कि उन तक भी फैल गया जो भली-भांति जानते थे कि उनके कार्यक्षेत्र में भी यदि लापरवाही या भ्रष्टाचार पाया गया तो उनके लिए भी बच निकलने का कोई रास्ता नहीं बचेगा।
विदिशा: 30 हजार की रिश्वत में पकड़ा गया उपयंत्री
विदिशा जिले के लटेरी क्षेत्र में जनपद पंचायत में पदस्थ उपयंत्री रामगोपाल यादव के खिलाफ शिकायत दर्ज होने के बाद लोकायुक्त की टीम ने जाल बिछाना शुरू किया। शिकायतकर्ता कन्हैया लाल शर्मा ने बताया था कि ग्राम पंचायत धीरगढ़ में सीसी रोड निर्माण से जुड़े मूल्यांकन कार्य में उपयंत्री द्वारा 40 हजार रुपये की रिश्वत की मांग की जा रही थी। शिकायत मिलने के बाद टीम ने सटीक योजना बनाई और गुरुवार को जैसे ही आरोपी ने 30 हजार रुपये स्वीकार किए, उसे रंगेहाथ पकड़ लिया गया। यह मामला केवल रिश्वतखोरी का नहीं बल्कि विकास कार्यों में हो रहे भ्रष्टाचार का सीधा उदाहरण है, जहां एक सड़के बनाने की प्रक्रिया तक को भी बिचौलियों और अधिकारियों की जेब भरने का माध्यम बनाया जाता है।
विदिशा की इस कार्रवाई से कई पंचायत कार्यालयों में खलबली मच गई क्योंकि यह आम शिकायत रहती है कि निर्माण कार्यों की स्वीकृति, मूल्यांकन और भुगतान के लिए अधिकारियों को अवैध धन देना पड़ता है। इस गिरफ्तारी ने ग्राम पंचायतों में काम करने वाले संविदा और स्थायी कर्मचारियों को भी चेतावनी दी कि भ्रष्टाचार के पक्के रिश्ते अब धीरे-धीरे खुलने लगे हैं।
झाबुआ: 14,500 रुपये लेते गिरफ्तार हुआ जनजतीय विभाग का लेखापाल
झाबुआ जिले का मामला परिस्थितियों के लिहाज से और भी गंभीर था। यहां जनजतीय विभाग में पदस्थ लेखापाल जाम सिंह अमलियार ने एक शिक्षक शांतिलाल से 50 हजार रुपये की रिश्वत माँगी थी। शिक्षक पर भाई-भतीजावाद के आरोप लगाकर उसे कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था और इसी नोटिस के निपटारे के नाम पर लेखापाल ने मोटी रकम की मांग की। शिकायत मिलने पर इंदौर लोकायुक्त की टीम ने कार्रवाई की योजना बनाई और आरोपी को 14,500 रुपये स्वीकारते हुए रंगेहाथ पकड़ लिया।
यह मामला इस बात को भी उजागर करता है कि किस तरह विभागीय नोटिसों और अनुशासनात्मक कार्यवाहियों को रिश्वत वसूली का साधन बना दिया जाता है। शिक्षक समुदाय में यह खबर आग की तरह फैली और कई शिक्षकों ने इसे राहत की तरह देखा कि उन पर अनावश्यक दबाव डालने वाले अधिकारियों के खिलाफ अब सख्त कार्रवाई शुरू हो चली है।
शिवपुरी: 5 हजार रुपये की रिश्वत में पकड़ा गया स्टेनो
शिवपुरी जिले में लोकायुक्त ग्वालियर की टीम ने अपर कलेक्टर कार्यालय में पदस्थ स्टेनो मोनू शर्मा को रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया। फरियादी ध्यानेन्द्र सिंह के पिता का नाम सरकारी रिकॉर्ड से हट चुका था। उसे फिर से जोड़ने के लिए स्टेनो ने 20 हजार रुपये की मांग की। पहले ही 15 हजार रुपये आरोपी को दिए जा चुके थे, लेकिन उसका लालच यहीं खत्म नहीं हुआ और फिर उसने अतिरिक्त पैसे की मांग की।
जैसे ही शिकायत लोकायुक्त तक पहुंची, टीम हरकत में आई और सबूत जुटाने के बाद 5 हजार रुपये लेते हुए स्टेनो को पकड़ लिया गया। यह मामला प्रशासनिक कार्यों में भ्रष्टाचार की उस गहराई को दर्शाता है जहां साधारण कागजी संशोधन भी दूसरों की मजबूरी का लाभ उठाकर पैसे उगाहने का तरीका बन जाते हैं।
नरसिंहपुर: वेतन जारी करने के नाम पर पकड़ा गया सहकारिता निरीक्षक
नरसिंहपुर जिले में सहकारिता निरीक्षक संजय दुबे के खिलाफ शिकायत दर्ज की गई थी कि वह वेतन जारी करने के बदले 3 हजार रुपये की रिश्वत मांग रहा है। समिति प्रबंधक देवी प्रसाद तिवारी दो महीने का वेतन रुका होने से परेशान थे और इस कारण उसने शिकायत दर्ज कराई। लोकायुक्त जबलपुर की टीम ने सत्यापन के बाद फिर फंदा तैयार किया और आरोपी निरीक्षक को रिश्वत लेते हुए पकड़ लिया।
यह घटना उन अधिकारियों के लिए बड़ी चेतावनी है जो वेतन, पेंशन, प्रमाणपत्र या अन्य आवश्यक सेवाओं के जरिए रिश्वत वसूलते हैं।
बालाघाट: तहसील कार्यालय का बाबू चाय की टपरी पर पकड़ा गया 3 हजार की रिश्वत लेते
सबसे चौंकाने वाला मामला बालाघाट जिले में सामने आया। बिरसा तहसील कार्यालय में पदस्थ बाबू राजकुमार रामटेके ने एक झूठे केस को खत्म करने के नाम पर युवाक संतोष ढेकवार से रिश्वत की मांग की। संतोष ने शिकायत की थी कि जेल में बंद एक आरोपी ने उसके खिलाफ फर्जी केस दर्ज कराया, जिसे खत्म करने के लिए बाबू ने 5 हजार रुपये की मांग की। लोकायुक्त की टीम ने योजना के तहत बाबू को चाय की दुकान पर ही 3 हजार रुपये लेते हुए रंगेहाथ पकड़ लिया।
यह गिरफ्तारी इसलिए चर्चित हुई क्योंकि यह घटना सरकारी कार्यालय के भीतर नहीं बल्कि खुलेआम चाय की टपरी पर हुई, जिसने जिला प्रशासन को बेहद शर्मसार किया।
