मध्य-पूर्व की राजनीति में सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात दशकों से रणनीतिक साझेदार माने जाते रहे हैं। दोनों देशों ने क्षेत्रीय संघर्षों, आर्थिक मोर्चों और कूटनीति में एक-दूसरे का साथ दिया। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह सहयोग धीरे-धीरे सिमटता गया है। अब इस रिश्ते में एक ऐसी खामोश लेकिन स्पष्ट कड़वाहट जन्म ले चुकी है, जिसकी जड़ें यमन के संकट से लेकर ओपेक की नीतियों और अफ्रीका के भू-राजनीतिक समीकरणों तक फैली हुई हैं।

यह तनाव अचानक नहीं पैदा हुआ। यह कई घटनाओं, निर्णयों और रणनीतिक हितों के बीच टकराव का परिणाम है। यमन की लड़ाई में बदलता रुख, आर्थिक महत्वाकांक्षाएँ, समुद्री सीमाओं को लेकर विवाद और अफ्रीका में बढ़ता प्रभाव—सबने मिलकर इस रिश्ते में एक नई कहानी लिख दी है।
यमन: तनाव की असल चिंगारी
यमन का संघर्ष वह मोर्चा है, जहाँ सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात की नीतियाँ सबसे स्पष्ट रूप से अलग दिखाई देती हैं।
एसटीसी का बढ़ता प्रभाव और यूएई का समर्थन
पिछले सप्ताह संयुक्त अरब अमीरात समर्थित सदर्न ट्रांजिशनल काउंसिल (एसटीसी) ने दक्षिण-पूर्वी यमन के कई प्रमुख क्षेत्रों, शहरों और तेल भंडारों पर फिर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। यह वही इलाक़े हैं जिन पर पहले सऊदी समर्थित सेनाएँ तैनात थीं, लेकिन उनके पीछे हटने के बाद एसटीसी ने अपना असर बढ़ाना शुरू कर दिया।
यूएई-समर्थित मीडिया चैनलों ने इस कार्रवाई को स्वाभाविक और सुरक्षा-केंद्रित कदम के रूप में पेश किया, वहीं सऊदी-समर्थित मीडिया ने इसे एकतरफा और यमन सरकार की संप्रभुता के खिलाफ बताया।
सऊदी अरब और यमन सरकार की नाराज़गी
प्रेसिडेंशियल लीडरशिप काउंसिल, जिसे सऊदी समर्थित माना जाता है, ने एसटीसी की कार्रवाइयों को राज्य की स्थिरता के लिए नुकसानदायक बताया।
क़तर और दूसरी स्वतंत्र मीडिया रिपोर्टों ने यह भी बताया कि यमन के सरकारी प्रतिनिधि स्थिति से चिंतित होकर सऊदी अरब जाकर विरोध दर्ज करा रहे हैं।
यमन की जटिलता यह दिखाती है कि दोनों देशों की प्राथमिकताएँ अब पहले जैसी नहीं रहीं। संयुक्त अरब अमीरात दक्षिणी तटों और व्यापारिक मार्गों पर सैन्य और रणनीतिक प्रभाव चाहता है, जबकि सऊदी अरब चाहता है कि यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार मज़बूत रहे।
ओपेक में बढ़ रही दूरी: तेल उत्पादन का विवाद
तेल-उत्पादक देशों का संगठन ओपेक हमेशा से सऊदी अरब के नेतृत्व में चला है। लेकिन पिछले दो वर्षों में संयुक्त अरब अमीरात ने कई बार उत्पादन नीतियों पर असहमति जताई है।
कई पश्चिमी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार यूएई चाह रहा था कि उसे अधिक तेल उत्पादन कोटा मिले, जबकि सऊदी अरब उत्पादन में कटौती चाहता था ताकि वैश्विक कीमतें स्थिर रहें।
द इकॉनमिस्ट ने तो यहाँ तक लिखा कि यूएई शायद ओपेक को छोड़ने की तैयारी कर सकता है।
ज़ाहिर है, इससे दोनों देशों के बीच लंबे समय का आर्थिक संतुलन हिल सकता है।
समुद्री सीमाओं का विवाद: यासात द्वीप नई चिंगारी
मार्च 2024 में जब संयुक्त अरब अमीरात ने यासात क्षेत्र को समुद्री संरक्षित क्षेत्र घोषित किया, तब सऊदी अरब ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन बताया और संयुक्त राष्ट्र में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई।
सऊदी अरब का कहना है कि यह क्षेत्र 1974 के जेद्दाह समझौते के तहत उसकी अधिकार-सीमा में आता है।
यह विवाद केवल सीमाओं का नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा, तेल-गैस संसाधनों और व्यापारिक मार्गों का है।
ईजेआईएल की रिपोर्टों के अनुसार यह विवाद दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे अनसुलझे समुद्री मसलों की एक नई कड़ी है।
अफ्रीका और लाल सागर: प्रभाव बढ़ाने की होड़
सऊदी-अमीरात तनाव की सबसे दिलचस्प पृष्ठभूमि अफ्रीका और लाल सागर का भू-राजनीतिक क्षेत्र है।
सूडान का संघर्ष: प्रॉक्सी वॉर की भूमि
सूडान में चल रहे संघर्ष में दोनों देश अलग-अलग पक्षों का समर्थन कर रहे हैं, यह तनाव और स्पष्ट करता है।
यूएई पर आरोप लगाया गया कि उसने आरएसएफ को सैन्य उपकरण मुहैया कराए, जबकि हाल के महीनों में सऊदी अरब ने सूडान की सैन्य सरकार को खुला समर्थन दे दिया।
इससे यह साफ हो गया कि अफ्रीका में दोनों की महत्वाकांक्षाएँ टकरा रही हैं
कूटनीति और नेतृत्व की दौड़
सऊदी अरब ने ईरान के साथ संबंध सुधारकर खुद को एक मजबूत क्षेत्रीय नेता के रूप में स्थापित करने की कोशिश की।
दूसरी ओर यूएई ने इज़राइल के साथ अब्राहम अकॉर्ड जैसे ऐतिहासिक समझौतों में पहल करके अपनी शक्ति साबित की।
दोनों ही क्षेत्रीय नेतृत्व चाहते हैं, लेकिन रास्ते अलग हैं—और यही टकराव पैदा कर रहा है।
दोनों देशों के रिश्तों का भविष्य
सऊदी अरब और यूएई दोनों आर्थिक, सैन्य और रणनीतिक मजबूरी में एक-दूसरे के साथ बने रहेंगे, लेकिन उनके बीच मतभेद गहराते रहेंगे।
यमन, अफ्रीका, ओपेक, समुद्री सीमाएँ और कूटनीतिक महत्वाकांक्षाएँ—ये पाँच मोर्चे आने वाले वर्षों में भी तनाव की वजह बने रहेंगे।
