मध्य प्रदेश के मंत्री गौतम टेटवाल इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा के केंद्र में हैं। हाल ही में आयोजित एक भूमि पूजन समारोह में उन्होंने अपने विधायक और मंत्री बनने की तारीख को गलत पढ़ दिया। यह घटना इतनी चर्चा में आई कि वीडियो वायरल हो गया और लोग उनकी योग्यता तथा प्रशासनिक अनुभव पर सवाल उठाने लगे। यह सिर्फ एक भूल नहीं, बल्कि उस समय और माहौल में हुई घटना ने राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से भी कई सवाल खड़े कर दिए।

घटना का विवरण
भूमि पूजन कार्यक्रम के दौरान टेटवाल मंच पर भाषण दे रहे थे। उन्होंने लिखित भाषण को पढ़ते हुए कहा कि वे 3 दिसंबर 1923 को विधायक बने और 25 दिसंबर 1923 को मंत्री बने। यह सुनते ही वहां मौजूद लोग हक्का-बक्का रह गए और वीडियो इंटरनेट पर साझा होने के बाद सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गया। वीडियो में यह साफ देखा जा सकता है कि टेटवाल लिखित कागज देखकर भी तारीखों में भ्रमित हो रहे थे।
सोशल मीडिया और जनता की प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होते ही लोगों ने उनकी शैक्षणिक योग्यता और राजनीतिक अनुभव पर सवाल उठाना शुरू कर दिया। कई लोगों ने लिखा कि लिखित कागज देखकर भी ऐसा भूल जाना स्वीकार्य नहीं है। हालांकि उनके समर्थकों ने इसे केवल एक भूल करार दिया और कहा कि मंत्री टेटवाल ने छात्र राजनीति और संगठनात्मक कामों में लंबा अनुभव हासिल किया है।
गौतम टेटवाल का राजनीतिक सफर
गौतम टेटवाल पहली बार वर्ष 2008 में सारंगपुर विधानसभा क्षेत्र से विधायक बने। इसके बाद वर्ष 2023 में उन्होंने 16वीं विधानसभा के लिए पुनः जीत हासिल की और 25 दिसंबर 2023 को राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) के पद की शपथ ली। उनकी राजनीतिक यात्रा छात्र राजनीति से शुरू हुई, जहां उन्होंने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों में सक्रिय भूमिका निभाई।
संगठनात्मक भूमिका और जिम्मेदारियां
टेटवाल ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के उज्जैन शिक्षा वर्ग से अपनी यात्रा शुरू की थी और इसके बाद विभिन्न पदों पर काम किया। उन्होंने कृषि महाविद्यालय छात्र संघर्ष समिति, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, बजरंग दल, भाजयुमो और भारतीय जनता पार्टी में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं। उनके नेतृत्व और संगठनात्मक कौशल ने उन्हें मध्य प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में एक मजबूत पहचान दिलाई।
विवादास्पद बयानों का इतिहास
टेटवाल के सार्वजनिक बयान भी अक्सर चर्चा में रहते हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान उन्होंने आरक्षण पर विवादित टिप्पणी की थी। एक भूमि पूजन कार्यक्रम में अजान सुनकर उन्होंने भाषण रोक दिया और मंच से कलमा पढ़ा। इस घटना को लेकर हिंदूवादी संगठनों ने आलोचना की, जबकि कुछ वरिष्ठ नेताओं ने इसे राष्ट्रीय एकता का प्रतीक कहा।
जनता और मीडिया पर प्रभाव
इस भूल ने जनता और मीडिया के बीच विभिन्न चर्चाओं को जन्म दिया। एक तरफ़ लोग उनकी तारीख भूलने की घटना पर हंसते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ उनके समर्थक यह बताते हैं कि उनके संगठनात्मक अनुभव और जनता सेवा के कार्यों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह घटना बताती है कि छोटे-छोटे सार्वजनिक झुकाव भी सामाजिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
भविष्य और राजनीतिक प्रभाव
इस घटना के बाद टेटवाल की छवि जनता के बीच मिश्रित रही। कुछ लोग इसे एक मजाकिया गलती मानते हैं, तो कुछ इसे उनके प्रशासनिक कौशल पर सवाल उठाने का अवसर समझते हैं। हालांकि, उनका अनुभव और लंबे समय से राजनीति में सक्रिय रहने का रिकॉर्ड उन्हें अभी भी मध्य प्रदेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति बनाता है।
निष्कर्ष
गौतम टेटवाल की तारीख भूलने की घटना सिर्फ़ एक व्यक्तिगत भूल नहीं है। यह घटना सोशल मीडिया, जनता और राजनीतिक नेतृत्व के बीच संवाद का एक नया आयाम लेकर आई है। यह बताती है कि सार्वजनिक जीवन में प्रत्येक गतिविधि, चाहे छोटी या बड़ी, जनता और मीडिया की नजर में होती है।
