भारतीय अर्थव्यवस्था के इतिहास में दिसंबर 2025 का महीना एक अहम मोड़ के रूप में दर्ज किया जाएगा। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया पहली बार 91 के स्तर को पार कर गया। यह केवल एक आंकड़ा नहीं है, बल्कि इसके साथ कई आर्थिक, राजनीतिक और रणनीतिक संकेत जुड़े हुए हैं। मुद्रा बाजार में यह हलचल अचानक नहीं आई, बल्कि इसके पीछे कई महीनों से बन रही परिस्थितियां जिम्मेदार रही हैं।

जब बाजार खुला और रुपये की कीमत 91 के पार फिसलती दिखाई दी, तो निवेशकों, उद्योगपतियों और आम लोगों के बीच चिंता और जिज्ञासा दोनों बढ़ गईं। सवाल उठने लगे कि आखिर सरकार और केंद्रीय बैंक इस गिरावट को रोकने के लिए हस्तक्षेप क्यों नहीं कर रहे हैं।
गिरावट के पीछे छिपी वैश्विक और घरेलू वजहें
रुपये की कमजोरी का सबसे बड़ा कारण भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर बनी अनिश्चितता मानी जा रही है। लंबे समय से चल रही बातचीत अब तक किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच पाई है। इससे वैश्विक निवेशकों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है।
इसके साथ ही विदेशी संस्थागत निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से पूंजी निकालने की प्रक्रिया तेज हुई है। जब विदेशी निवेशक अपने निवेश को समेटते हैं, तो वे डॉलर में पूंजी वापस ले जाते हैं। इससे डॉलर की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव बनता है।
विदेशी फंडों की बिकवाली और बाजार का मनोविज्ञान
पिछले कुछ हफ्तों में शेयर बाजार और बॉन्ड मार्केट दोनों में विदेशी निवेशकों की बिकवाली देखी गई है। वैश्विक स्तर पर ब्याज दरों में बदलाव, अमेरिका की मौद्रिक नीति और उभरते बाजारों के प्रति सतर्कता ने निवेशकों को जोखिम कम करने के लिए प्रेरित किया।
इस बिकवाली का सीधा असर रुपये पर पड़ा। डॉलर की मांग बढ़ने से भारतीय मुद्रा कमजोर होती चली गई। बाजार का मनोविज्ञान भी इसमें अहम भूमिका निभाता है। जब निवेशक यह मान लेते हैं कि रुपया और गिरेगा, तो वे पहले ही डॉलर खरीदने लगते हैं, जिससे गिरावट और तेज हो जाती है।
सरकार और आरबीआई की चुप्पी: रणनीति या मजबूरी
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा चर्चा सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका को लेकर हो रही है। आमतौर पर जब रुपया तेजी से कमजोर होता है, तो केंद्रीय बैंक बाजार में हस्तक्षेप करता है। डॉलर बेचकर रुपये को सहारा दिया जाता है।
लेकिन इस बार ऐसा आक्रामक हस्तक्षेप देखने को नहीं मिला। यही कारण है कि जानकार इसे सरकार की सोची-समझी रणनीति मान रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार फिलहाल रुपये को कृत्रिम रूप से मजबूत दिखाने के बजाय अर्थव्यवस्था के बड़े हितों को प्राथमिकता दे रही है।
निर्यात को बढ़ावा देने का गणित
रुपये की गिरावट का सबसे बड़ा फायदा निर्यातकों को मिलता है। जब रुपया कमजोर होता है, तो भारतीय सामान और सेवाएं विदेशी बाजारों में सस्ती हो जाती हैं। इससे वैश्विक खरीदारों के लिए भारत से खरीदारी करना अधिक आकर्षक बन जाता है।
हाल के आंकड़े इस तर्क को मजबूती देते हैं। वैश्विक व्यापार में चुनौतियों के बावजूद भारत का निर्यात नवंबर में उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। व्यापार घाटा भी कई महीनों के निचले स्तर पर पहुंचा है। इससे यह संकेत मिलता है कि कमजोर रुपया निर्यात के लिए सहायक साबित हो रहा है।
टैरिफ दबाव और प्रतिस्पर्धा की मजबूरी
अमेरिका द्वारा लगाए गए ऊंचे टैरिफ ने भारतीय निर्यातकों के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। ऐसे में सरकार के पास सीमित विकल्प हैं। यदि रुपये को बहुत मजबूत रखा जाए, तो भारतीय उत्पाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में महंगे पड़ेंगे और प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकते हैं।
इसी कारण माना जा रहा है कि सरकार रुपये को कुछ हद तक कमजोर रहने देने के पक्ष में है, ताकि निर्यातक वैश्विक बाजार में टिके रह सकें। यह रणनीति अल्पकालिक असहजता के बावजूद दीर्घकालिक लाभ देने वाली मानी जा रही है।
कितनी गिरावट है स्वीकार्य
आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए सालाना 2 से 3 प्रतिशत की मुद्रा गिरावट सामान्य मानी जाती है। लेकिन मौजूदा स्थिति में रुपये की गिरावट इस सीमा से आगे जाती दिख रही है।
इसके बावजूद नीति निर्माताओं की ओर से घबराहट नहीं दिखाई दे रही है। इससे यह संकेत मिलता है कि वे इस गिरावट को अस्थायी नहीं, बल्कि एक नियंत्रित प्रक्रिया के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, यह भी साफ है कि यदि गिरावट अनियंत्रित होती है, तो हस्तक्षेप से बचा नहीं जा सकेगा।
आम आदमी पर असर
रुपये की कमजोरी का असर केवल निर्यातकों तक सीमित नहीं रहता। आम आदमी की जेब पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। आयातित सामान महंगे हो जाते हैं। कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं।
इससे महंगाई पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। हालांकि सरकार और आरबीआई के पास महंगाई को नियंत्रित करने के लिए अन्य उपकरण मौजूद हैं, लेकिन लंबे समय तक कमजोर रुपया चुनौती बन सकता है।
निवेशकों के लिए संकेत
मुद्रा बाजार में यह हलचल निवेशकों के लिए भी महत्वपूर्ण संकेत देती है। कमजोर रुपया कुछ क्षेत्रों के लिए अवसर पैदा करता है, वहीं कुछ क्षेत्रों में जोखिम बढ़ा देता है। निर्यात-आधारित उद्योगों को लाभ मिल सकता है, जबकि आयात-निर्भर कंपनियों को सतर्क रहने की जरूरत है।
विदेशी निवेशक भी स्थिति पर करीबी नजर बनाए हुए हैं। यदि उन्हें लगेगा कि गिरावट नियंत्रित और रणनीतिक है, तो विश्वास बना रह सकता है। लेकिन अनिश्चितता बढ़ने पर पूंजी निकासी और तेज हो सकती है।
आगे की राह
आने वाले महीनों में रुपये की दिशा कई कारकों पर निर्भर करेगी। भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता का नतीजा, वैश्विक आर्थिक माहौल, कच्चे तेल की कीमतें और घरेलू आर्थिक आंकड़े सभी अहम भूमिका निभाएंगे।
सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखना है। निर्यात को बढ़ावा देना जरूरी है, लेकिन महंगाई और वित्तीय स्थिरता को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
निष्कर्ष: गिरावट या दूरदर्शी नीति
रुपये का 91 के पार जाना निश्चित रूप से चिंता का विषय है, लेकिन इसे केवल नकारात्मक नजर से देखना सही नहीं होगा। यह संभव है कि सरकार और केंद्रीय बैंक इसे एक रणनीतिक कदम के रूप में देख रहे हों, जिससे भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी स्थिति मजबूत कर सके।
आने वाला समय बताएगा कि यह गिरावट अस्थायी झटका थी या एक सोची-समझी आर्थिक नीति का हिस्सा। फिलहाल इतना तय है कि रुपया और डॉलर की यह जंग भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण परीक्षा बन चुकी है।
