भारतीय सिनेमा, विशेषकर मलयालम फिल्म जगत के लिए यह समाचार अत्यंत पीड़ादायक है। अभिनेता, लेखक और निर्देशक श्रीनिवासन का 69 वर्ष की आयु में निधन हो गया। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे श्रीनिवासन ने शनिवार की सुबह अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही सिनेप्रेमियों, कलाकारों और साहित्य-संस्कृति से जुड़े लोगों में शोक की लहर दौड़ गई। यह केवल एक अभिनेता का जाना नहीं है, बल्कि उस दौर का अंत है जिसने मलयालम सिनेमा को संवेदनशील, व्यंग्यात्मक और सामाजिक रूप से जागरूक पहचान दी।

प्रारंभिक जीवन और संघर्ष
श्रीनिवासन का जन्म केरल के कन्नूर जिले में हुआ था। साधारण परिवार में जन्मे श्रीनिवासन का झुकाव बचपन से ही साहित्य, रंगमंच और सिनेमा की ओर था। उन्होंने जीवन के आरंभिक वर्षों में ही यह समझ लिया था कि कला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का आईना भी हो सकती है। शुरुआती संघर्षों के दौरान उन्होंने छोटे-मोटे काम किए, थिएटर से जुड़े और लेखन को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। यही अनुभव आगे चलकर उनके अभिनय और लेखन की आत्मा बने।
सिनेमा में प्रवेश और शुरुआती पहचान
1977 में रिलीज़ हुई फिल्म ‘मणिमुजक्कम’ से श्रीनिवासन ने मलयालम सिनेमा में कदम रखा। इस फिल्म में निभाया गया उनका किरदार दर्शकों को तुरंत याद रह गया। इसके बाद 1980 के दशक में उन्होंने लगातार ऐसी भूमिकाएं निभाईं, जिनमें आम आदमी की पीड़ा, हास्य और संघर्ष साफ झलकता था। उनकी खासियत यह थी कि वे गंभीर विषयों को भी हल्के व्यंग्य और सहज संवादों के माध्यम से प्रस्तुत करते थे।
अभिनेता के रूप में अनूठी शैली
श्रीनिवासन की अभिनय शैली उन्हें अन्य कलाकारों से अलग बनाती थी। वे न तो पारंपरिक नायक थे और न ही केवल हास्य कलाकार। उनके किरदार जीवन से उठे हुए लगते थे, जिनमें कमजोरियां भी थीं और सच्चाई भी। उन्होंने मध्यमवर्गीय व्यक्ति, सरकारी कर्मचारी, पड़ोसी, पिता और सामाजिक कार्यकर्ता जैसे किरदारों को इस तरह निभाया कि दर्शक खुद को उनमें देख सके। यही कारण था कि उनकी फिल्मों को केवल देखा नहीं गया, बल्कि महसूस किया गया।
लेखन में सामाजिक सरोकार
श्रीनिवासन केवल अभिनेता नहीं थे, बल्कि एक सशक्त लेखक भी थे। उन्होंने कई फिल्मों की पटकथा और संवाद लिखे। उनकी लेखनी में समाज की विसंगतियों पर तीखा व्यंग्य होता था, लेकिन वह कटु नहीं होता था। 1984 में आई फिल्म ‘ओडारुथमवा अलारियाम’ की स्क्रिप्ट ने उन्हें एक गंभीर लेखक के रूप में स्थापित किया। उनकी कहानियों में आम आदमी की आवाज, सामाजिक असमानता और नैतिक प्रश्न प्रमुखता से उभरते थे।
निर्देशन में भी छोड़ी छाप
अभिनय और लेखन के साथ-साथ श्रीनिवासन ने निर्देशन में भी हाथ आजमाया। 1989 में आई ब्लैक कॉमेडी फिल्म ‘वडाकुनोक्कियंत्रम’ और ‘चिंताविष्ठयाया श्यामला’ जैसी फिल्मों का निर्देशन कर उन्होंने यह साबित किया कि वे सिनेमा की हर विधा में दक्ष हैं। इन फिल्मों को आज भी मलयालम सिनेमा की क्लासिक कृतियों में गिना जाता है।
चार दशकों का लंबा फिल्मी सफर
लगभग 48 वर्षों के करियर में श्रीनिवासन ने 200 से अधिक फिल्मों में अभिनय किया। यह संख्या केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि उनके समर्पण और निरंतरता का प्रमाण है। इतने लंबे समय तक प्रासंगिक बने रहना किसी भी कलाकार के लिए आसान नहीं होता, लेकिन श्रीनिवासन ने अपनी सादगी और सच्चाई के बल पर यह मुकाम हासिल किया।
हास्य के पीछे छिपा गहरा संदेश
उनकी फिल्मों का हास्य केवल हंसाने के लिए नहीं होता था। उसमें समाज के लिए संदेश छिपा होता था। उन्होंने यह दिखाया कि हंसी के माध्यम से भी गंभीर बात कही जा सकती है। यही कारण है कि उनके संवाद और दृश्य आज भी उतने ही प्रासंगिक लगते हैं।
पारिवारिक जीवन
श्रीनिवासन के परिवार में उनकी पत्नी विमला और दो बेटे हैं। उनके बड़े बेटे विनीत श्रीनिवासन अभिनेता और निर्देशक हैं, जबकि छोटे बेटे ध्यान श्रीनिवासन भी अभिनय और निर्देशन से जुड़े हैं। श्रीनिवासन अपने परिवार के बेहद करीब थे और अक्सर कहते थे कि परिवार ही उनकी सबसे बड़ी ताकत है। पिता के रूप में वे सख्त नहीं, बल्कि मित्रवत स्वभाव के थे।
अंतिम फिल्म और सक्रियता
श्रीनिवासन को आखिरी बार 15 जून 2025 को रिलीज़ हुई मलयालम कॉमेडी-ड्रामा फिल्म ‘नैंसी रानी’ में देखा गया था। इस फिल्म में भी उनकी मौजूदगी ने दर्शकों को भावुक कर दिया। इससे पहले वे 2023 में अपने बेटे के साथ फिल्म ‘कुरुक्कन’ में नजर आए थे। उम्र और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बावजूद उनका काम के प्रति समर्पण कम नहीं हुआ।
स्वास्थ्य संघर्ष और जिजीविषा
मार्च 2022 में श्रीनिवासन को कार्डियक स्ट्रोक आया था, जिसके बाद उनकी सर्जरी हुई। इस कठिन दौर के बावजूद उन्होंने जीवन से हार नहीं मानी। उन्होंने उपचार के साथ-साथ धीरे-धीरे काम में वापसी की। यह उनके मजबूत इच्छाशक्ति और सिनेमा के प्रति प्रेम को दर्शाता है।
निधन और शोक
श्रीनिवासन ने केरल के एर्नाकुलम जिले के थ्रिप्पुनिथुरा तालुक अस्पताल में अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही सिनेमा जगत और उनके प्रशंसकों ने सोशल माध्यमों पर श्रद्धांजलि अर्पित की। हर कोई उन्हें एक सच्चे कलाकार और संवेदनशील इंसान के रूप में याद कर रहा है।
विरासत और स्मृति
श्रीनिवासन भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में, किरदार और लेखन हमेशा जीवित रहेंगे। उन्होंने मलयालम सिनेमा को यह सिखाया कि सिनेमा केवल चमक-दमक नहीं, बल्कि समाज के साथ संवाद का माध्यम भी हो सकता है। आने वाली पीढ़ियां उनके काम से प्रेरणा लेती रहेंगी।
