नेपाल में तिब्बती शरणार्थियों की जिंदगी अब पहले से कहीं अधिक जटिल और नियंत्रित हो गई है। अमेरिकी तकनीक और चीनी निगरानी उपकरणों के संयोजन ने काठमांडू और सीमावर्ती क्षेत्रों में ‘डिजिटल जेल’ जैसी स्थितियां पैदा कर दी हैं। इसने न केवल तिब्बती समुदाय की स्वतंत्रता सीमित की है, बल्कि उनके दैनिक जीवन और आंदोलन पर भी गहरा प्रभाव डाला है।

2016 से नेपाल सरकार ने ‘सेफ सिटी’ प्रोजेक्ट के तहत राजधानी काठमांडू में निगरानी कैमरों की स्थापना शुरू की। इन उपकरणों का मुख्य उद्देश्य शहर की सुरक्षा बढ़ाना बताया गया, लेकिन वास्तविकता में इसका असर तिब्बती शरणार्थियों और उनके अधिकारों पर पड़ा। यूनिव्यू, एक चीनी एआई-सक्षम सीसीटीवी सप्लायर, ने अमेरिकी तकनीक के आधार पर कैमरों का वितरण किया। यह कंपनी अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की तकनीक का उपयोग करके नेपाल में अपनी निगरानी प्रणाली को मजबूत कर रही है।
हाइटेरा जैसी चीनी कंपनियों ने नेपाली पुलिस को डिजिटल ट्रंकिंग, वॉकी-टॉकी और डेटा प्रबंधन तकनीक मुहैया कराई। इसके साथ ही, हिकविजन और दाहुआ जैसी कंपनियों ने अमेरिकी और यूरोपीय साझेदारों के साथ मिलकर एआई क्षमता वाले कैमरों का निर्माण किया। 2019 में अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद, एडब्ल्यूएस जैसी कंपनियां क्लाउड सेवाओं के माध्यम से चीन को तकनीकी समर्थन देती रही हैं।
सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में स्थापित इन कैमरों के माध्यम से तिब्बती शरणार्थियों की हर गतिविधि रिकॉर्ड की जाती है। गलियों, बाजारों, और सीमा क्षेत्रों में कैमरे उनकी निगरानी करते हैं। राजधानी के कुछ ऑपरेटर मोटरबाइक, कार और पैदल चलने वाले लोगों पर नजर रखते हैं। इस तकनीकी निगरानी ने ‘फ्री तिब्बत’ आंदोलन को दबाने में भी मदद की है।
नेपाल-तिब्बत सीमा पर चीन ने ‘ग्रेट वॉल ऑफ स्टील’ की तरह एक तकनीकी कवच स्थापित किया है। इसका उद्देश्य सीमा पर किसी भी संदिग्ध गतिविधि को तुरंत ट्रैक करना है। सीमावर्ती इलाकों में स्थित कैमरे और सेंसर तिब्बती शरणार्थियों के हर कदम पर नजर रखते हैं। इसके कारण तिब्बती लोग अक्सर सार्वजनिक स्थानों पर आने-जाने से डरते हैं।
स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन लगातार इस मुद्दे पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं। उनके अनुसार, यह निगरानी तकनीक केवल सुरक्षा के नाम पर तिब्बती समुदाय की स्वतंत्रता और अधिकारों का हनन कर रही है। नेपाल में अमेरिका और यूरोप की तकनीक का उपयोग चीन की निगरानी साम्राज्य को बढ़ावा देने में हो रहा है।
अमेरिकी तकनीक का योगदान भी विवादास्पद है। कई तकनीकी विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन ने अमेरिका और यूरोप की उन्नत तकनीक का उपयोग करके अपनी निगरानी प्रणाली को इतना प्रभावी बना लिया है कि नेपाल में मानवाधिकारों पर गंभीर खतरा पैदा हो गया है।
तिब्बती शरणार्थियों की आवाज़ें दबाई जा रही हैं। स्थानीय समुदायों की सुरक्षा और राष्ट्रीय हित के नाम पर यह तकनीक व्यापक रूप से लागू की जा रही है। इसके प्रभाव ने शहर के भीतर स्वतंत्र आवाज़ और अभिव्यक्ति को कमजोर कर दिया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस निगरानी प्रणाली के कारण तिब्बती शरणार्थियों के लिए नेपाल एक डिजिटल जेल में बदल गया है। उनके जीवन, स्वतंत्रता और राजनीतिक गतिविधियां अब पूरी तरह तकनीकी निगरानी के अधीन हैं। यह एक चेतावनी है कि वैश्विक तकनीकी सहयोग किस तरह मानवाधिकारों पर असर डाल सकता है।
नेपाल में इस समय तकनीकी निगरानी का स्तर इतना उच्च है कि छोटे से छोटे आंदोलन या विरोध गतिविधि को तुरंत ट्रैक किया जा सकता है। यह स्थिति तिब्बती समुदाय के लिए भय और असुरक्षा की भावना पैदा करती है।
इस प्रकार, नेपाल में तिब्बती जीवन पर डिजिटल निगरानी का प्रभाव व्यापक और गहरा है। अमेरिकी तकनीक और चीनी उपकरणों के संयोजन ने स्थानीय स्वतंत्रता, सामाजिक गतिविधियों और मानवाधिकारों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। यह कहानी बताती है कि कैसे तकनीकी प्रगति और वैश्विक राजनीतिक रणनीतियों का प्रभाव सीधे लोगों की जिंदगी पर पड़ सकता है।
