बांग्लादेश की राजधानी ढाका इन दिनों गंभीर राजनीतिक और सामाजिक उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। विरोध प्रदर्शनों, आगजनी, तोड़फोड़ और कट्टरपंथी गतिविधियों ने न केवल देश की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दी है, बल्कि पड़ोसी देशों के साथ उसके संबंधों पर भी असर डालना शुरू कर दिया है। इस अस्थिर माहौल के बीच भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता अपने नागरिकों, राजनयिक मिशनों और संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर रही है। इसी पृष्ठभूमि में बांग्लादेश के सेना प्रमुख द्वारा भारतीय सेना प्रमुख को दी गई जानकारी ने नई दिल्ली को कुछ हद तक राहत प्रदान की है।

ढाका में भड़की हिंसा की पृष्ठभूमि
हालिया हिंसा की जड़ें उस समय और गहरी हो गईं जब भारत-विरोधी विचारधारा से जुड़े कट्टर नेता शरीफ उस्मान हादी की सिंगापुर के एक अस्पताल में मृत्यु हो गई। इससे कुछ दिन पहले ही ढाका में नकाबपोश हमलावरों द्वारा उन्हें गोली मारी गई थी। उनकी मौत की खबर फैलते ही देश के विभिन्न हिस्सों में उग्र प्रदर्शन शुरू हो गए। इन प्रदर्शनों ने जल्द ही हिंसक रूप ले लिया और भीड़ ने सरकारी, सांस्कृतिक और मीडिया संस्थानों को निशाना बनाना शुरू कर दिया।
ढाका में प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के कार्यालयों में आगजनी की घटनाएं सामने आईं। इसके साथ ही वामपंथी सांस्कृतिक संगठन के कार्यालय में तोड़फोड़ की गई। इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि विरोध प्रदर्शन केवल राजनीतिक असंतोष तक सीमित नहीं रहे, बल्कि वे एक सुनियोजित अराजकता का रूप ले चुके हैं।
मीडिया और सांस्कृतिक संस्थानों पर हमले
हिंसा के दौरान जिस तरह मीडिया संस्थानों को निशाना बनाया गया, उसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। पत्रकारों और सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं में भय का माहौल फैल गया है। कई स्थानों पर कार्यालयों में तोड़फोड़, दस्तावेजों को जलाना और संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की घटनाएं दर्ज की गईं। यह सब उस स्थिति की ओर इशारा करता है, जहां असहमति को दबाने के लिए हिंसा को हथियार बनाया जा रहा है।
भारत-बांग्लादेश सैन्य संपर्क की अहमियत
इन हालातों के बीच भारत और बांग्लादेश की सेनाओं के बीच लगातार संवाद बना रहना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। बांग्लादेश के सेना प्रमुख ने अपने भारतीय समकक्ष को स्पष्ट रूप से आश्वस्त किया है कि ढाका सहित पूरे देश में स्थित भारतीय संपत्तियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है।
यह संवाद केवल औपचारिक नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय स्थिरता और आपसी विश्वास का संकेत भी देता है। दोनों देशों की सेनाओं के बीच सीधा संपर्क यह दर्शाता है कि संकट के समय भी रणनीतिक संवाद के रास्ते खुले हुए हैं।
भारतीय संपत्तियों और राजनयिक मिशनों की सुरक्षा
हालांकि बांग्लादेश में भारतीय संपत्तियों को सुरक्षित बताए जाने की जानकारी राहत देने वाली है, लेकिन जमीनी हालात पूरी तरह आश्वस्त करने वाले नहीं हैं। हिंसक भीड़ द्वारा भारतीय उच्चायोग को निशाना बनाने की कोशिशों और भारतीय अधिकारियों पर हमले की खबरों ने नई दिल्ली की चिंता बढ़ाई है।
भारत ने इस मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए बांग्लादेश के शीर्ष राजनयिक को तलब कर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई। भारत ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वह बांग्लादेश में शांति और स्थिरता का समर्थक है, लेकिन अपने राजनयिक मिशनों और नागरिकों की सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा।
अंतरिम सरकार और बदले राजनीतिक समीकरण
शेख हसीना सरकार के पतन के बाद बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन हुआ और मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार का गठन किया गया। इस राजनीतिक बदलाव के बाद देश की आंतरिक राजनीति में अस्थिरता बढ़ी है। कई विश्लेषकों का मानना है कि सत्ता परिवर्तन के बाद प्रशासनिक ढांचे की कमजोरी का फायदा कट्टरपंथी और अराजक तत्व उठा रहे हैं।
भारत-बांग्लादेश संबंधों पर भी इसका प्रभाव पड़ा है। दोनों देशों के बीच वर्षों से चला आ रहा सहयोग और विश्वास इस अस्थिरता की वजह से दबाव में दिखाई देने लगा है।
अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमले और भारत की चिंता
हालिया हिंसा के दौरान बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से हिंदू समुदाय पर हमलों की खबरों ने स्थिति को और संवेदनशील बना दिया है। एक घटना में एक हिंदू युवक की बेरहमी से हत्या किए जाने और उसके बाद शव के साथ अमानवीय व्यवहार की जानकारी ने पूरे क्षेत्र में आक्रोश पैदा किया।
भारत ने इन घटनाओं पर गहरी चिंता जताते हुए बांग्लादेश सरकार से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की है। भारत का रुख स्पष्ट है कि क्षेत्रीय शांति तभी संभव है जब सभी समुदाय सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें।
सुरक्षा व्यवस्था पर उठते सवाल
ढाका और अन्य शहरों में हुई हिंसा ने बांग्लादेश की सुरक्षा व्यवस्था की तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब मीडिया कार्यालय, सांस्कृतिक संगठन और राजनयिक मिशन तक सुरक्षित नहीं रह पा रहे, तो आम नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चिंताएं स्वाभाविक हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्थिति को नियंत्रित करने के लिए केवल सैन्य या पुलिस कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी। राजनीतिक संवाद, सामाजिक समरसता और कट्टरपंथ के खिलाफ सख्त नीति की आवश्यकता है।
क्षेत्रीय स्थिरता और भविष्य की चुनौतियां
भारत और बांग्लादेश दक्षिण एशिया के महत्वपूर्ण पड़ोसी हैं। दोनों देशों के बीच आर्थिक, सांस्कृतिक और सामरिक संबंध गहरे रहे हैं। वर्तमान संकट इन संबंधों की परीक्षा ले रहा है।
सैन्य प्रमुखों के बीच संवाद यह संकेत देता है कि दोनों देश हालात को बिगड़ने से रोकने के लिए गंभीर हैं। लेकिन दीर्घकालिक स्थिरता के लिए बांग्लादेश को आंतरिक स्तर पर कानून व्यवस्था बहाल करनी होगी और भारत को कूटनीतिक सतर्कता बनाए रखनी होगी।
निष्कर्ष: संवाद ही समाधान का रास्ता
ढाका में जारी हिंसा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राजनीतिक अस्थिरता और कट्टरपंथ का असर केवल एक देश तक सीमित नहीं रहता। इसका प्रभाव पूरे क्षेत्र पर पड़ता है। ऐसे समय में भारत और बांग्लादेश के बीच सैन्य और कूटनीतिक संवाद अत्यंत आवश्यक है।
भारतीय संपत्तियों के सुरक्षित होने की पुष्टि राहत जरूर देती है, लेकिन स्थायी शांति के लिए बांग्लादेश में कानून व्यवस्था, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती जरूरी है। संवाद, संयम और सहयोग ही इस संकट से निकलने का एकमात्र रास्ता है।
