कभी-कभी एक छोटी सी घटना पूरे तंत्र की संवेदनहीनता को उजागर कर देती है। बैतूल जिले के चिचोली क्षेत्र में सामने आया एक दृश्य कुछ ऐसा ही था, जिसने राह चलते लोगों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया। स्कूल जाने की उम्र में किताबें कंधे पर टांगे एक पांचवीं कक्षा की छात्रा जब बीच सड़क पर बैठ गई, तो यह सिर्फ यातायात रुकने की घटना नहीं थी, बल्कि यह उस पीड़ा की अभिव्यक्ति थी, जिसे वह शब्दों में नहीं कह पा रही थी।

यह बच्ची शिक्षा के अधिकार कानून के तहत एक निजी स्कूल में पढ़ रही है। स्कूल उससे करीब 18 किलोमीटर दूर है। रोज की तरह वह स्कूल बस का इंतजार कर रही थी, लेकिन उस दिन बस के दरवाजे उसके लिए बंद कर दिए गए। वजह थी बस किराया जमा न होना।
घटना का पूरा दृश्य: सड़क पर बैठी एक मासूम और ठहरता ट्रैफिक
चिचोली क्षेत्र की यह घटना उस समय सामने आई, जब स्कूल बस अपने निर्धारित मार्ग पर बच्चों को लेने पहुंची। छात्रा रोज की तरह बस स्टॉप पर खड़ी थी। उसके हाथ में स्कूल बैग था और आंखों में स्कूल पहुंचने की उम्मीद।
लेकिन बस में चढ़ते समय उसे यह कहकर रोक दिया गया कि बस किराया जमा नहीं किया गया है, इसलिए उसे बस में नहीं बैठाया जाएगा। यह सुनकर बच्ची पहले तो चुप रही, लेकिन जब बस आगे बढ़ने लगी, तो वह अचानक सड़क पर बैठ गई।
बीच सड़क धरने पर बैठी इस मासूम को देखकर आसपास के लोग रुक गए। कुछ ही देर में वहां वाहनों की कतार लग गई। ट्रैफिक बाधित हो गया और माहौल में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया।
बच्ची का दर्द: शब्द नहीं, आंसुओं में छुपी पीड़ा
लोगों ने जब बच्ची से पूछा कि वह सड़क पर क्यों बैठी है, तो उसने बस इतना कहा कि उसे स्कूल जाना है। उसके लिए यह समझना मुश्किल था कि शिक्षा के अधिकार के तहत पढ़ने के बावजूद उसे बस से क्यों उतारा जा रहा है।
उसकी आंखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर जिद भी थी। यह जिद स्कूल जाने की थी, पढ़ने की थी, आगे बढ़ने की थी। यह वही जिद है, जो शिक्षा के अधिकार कानून की आत्मा में छुपी है।
शिक्षा के अधिकार कानून का सवाल
शिक्षा के अधिकार कानून का उद्देश्य यह है कि आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल सके। इस कानून के तहत निजी स्कूलों में चयनित बच्चों से न तो फीस ली जाती है और न ही उनसे किसी प्रकार का भेदभाव किया जाना चाहिए।
हालांकि, कई बार व्यवहारिक स्तर पर यह देखा गया है कि स्कूल प्रबंधन अप्रत्यक्ष रूप से इन बच्चों पर अतिरिक्त खर्च का दबाव डालते हैं। बस किराया भी ऐसा ही एक मुद्दा बनकर सामने आया है।
यह सवाल उठता है कि जब एक बच्ची को आरटीई के तहत स्कूल में दाखिला मिला है, तो उसकी स्कूल तक पहुंच सुनिश्चित करना किसकी जिम्मेदारी है।
परिजनों का पक्ष: मजबूरी और गुस्सा
बच्ची के परिजनों का कहना है कि वे आर्थिक रूप से कमजोर हैं और आरटीई के तहत ही बच्ची को स्कूल में दाखिला मिला है। स्कूल गांव से काफी दूर है, इसलिए बस ही एकमात्र साधन है।
परिजनों का आरोप है कि स्कूल प्रबंधन ने पहले कभी स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया कि बस किराया अनिवार्य है। यदि ऐसा था भी, तो इसे मानवीय तरीके से सुलझाया जा सकता था।
उनका कहना है कि बच्ची को बस से उतारना और फिर उसे अकेला छोड़ देना न सिर्फ अमानवीय है, बल्कि उसकी सुरक्षा के लिहाज से भी गलत है।
राहगीरों और स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया
घटना के दौरान कई राहगीर रुक गए। कुछ लोगों ने बच्ची को समझाने की कोशिश की, तो कुछ ने स्कूल प्रबंधन के रवैये पर नाराजगी जताई।
कई लोगों का कहना था कि यदि एक बच्ची सड़क पर बैठकर विरोध कर रही है, तो यह साफ दिखाता है कि वह कितनी मजबूर है। यह सिर्फ एक स्कूल या एक बस का मामला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनशीलता का सवाल है।
प्रशासन की भूमिका और जिम्मेदारी
घटना की सूचना मिलने के बाद स्थानीय स्तर पर चर्चा शुरू हुई। लोगों का कहना है कि ऐसे मामलों में शिक्षा विभाग और प्रशासन को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।
आरटीई के तहत पढ़ने वाले बच्चों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव कानूनन गलत है। यदि स्कूल बस सुविधा देता है, तो यह देखना जरूरी है कि आरटीई के बच्चों के लिए इसकी व्यवस्था कैसे की जाए।
शिक्षा बनाम व्यवस्था: किसकी हार, किसकी जीत
यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि शिक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित नहीं है। स्कूल तक पहुंच भी शिक्षा का ही हिस्सा है।
एक बच्ची का सड़क पर बैठना किसी आंदोलन की शुरुआत नहीं, बल्कि एक मौन सवाल है, जो हम सभी से पूछा जा रहा है। क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था इतनी कठोर हो गई है कि वह एक मासूम की पीड़ा को नजरअंदाज कर दे।
भविष्य के लिए सबक
इस घटना से यह साफ है कि शिक्षा के अधिकार को केवल कागजों तक सीमित नहीं रखा जा सकता। इसके व्यावहारिक पहलुओं पर गंभीरता से काम करने की जरूरत है।
स्कूल प्रबंधन, प्रशासन और समाज, सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है कि कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न हो, चाहे वजह कितनी ही छोटी क्यों न हो।
निष्कर्ष: सड़क पर बैठी बच्ची, खड़ा होता सवाल
बैतूल की इस मासूम बच्ची का धरना भले ही कुछ देर बाद खत्म हो गया हो, लेकिन उसने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
यह सवाल केवल बस किराए का नहीं है, बल्कि यह सवाल है संवेदनशीलता का, समानता का और उस अधिकार का, जिसे संविधान ने हर बच्चे को दिया है।
