सोशल मीडिया के दौर में किसी एक वीडियो की ताकत लाखों लोगों तक पहुंचने में देर नहीं लगती। जब यह वीडियो किसी मासूम बच्चे की जिंदगी से जुड़ा हो, तो भावनाएं और भी गहराई से जुड़ जाती हैं। हाल ही में ऐसा ही एक वीडियो सामने आया, जिसमें सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर एल्विश यादव एक गंभीर बीमारी से जूझ रहे बच्चे के लिए अपने फैंस और आम लोगों से आर्थिक मदद की अपील करते नजर आए। वीडियो में बच्चे के माता-पिता भी हाथ जोड़कर मदद की गुहार लगाते दिखे। अपील का केंद्र एक ऐसा इंजेक्शन था, जिसकी कीमत करीब 9 करोड़ रुपये बताई गई और दावा किया गया कि समय पर इंजेक्शन न मिलने पर बच्चे की जान खतरे में पड़ सकती है।

इस भावुक अपील के कुछ ही समय बाद एक और वीडियो सामने आया, जिसने पूरे मामले को एक नई दिशा दे दी। कॉमेडियन और रियलिटी शो विनर मुनव्वर फारूकी ने बिना किसी का नाम लिए एक गंभीर सवाल खड़ा किया। उन्होंने दावा किया कि आजकल कुछ एनजीओ और एजेंसियां भावनात्मक कहानियों के जरिए बड़े पैमाने पर चंदा इकट्ठा कर रही हैं और इसके पीछे एक सुनियोजित कारोबार भी हो सकता है। यहीं से यह मामला सिर्फ मदद की अपील नहीं, बल्कि भरोसे और पारदर्शिता की बहस बन गया।
एल्विश यादव की अपील और उसकी संवेदनशीलता
एल्विश यादव का वीडियो साधारण अपील नहीं था। उसमें एक आम इंसान की तरह वह लोगों से कह रहे थे कि वह ऐसा वीडियो आमतौर पर नहीं बनाते, लेकिन इस बार मामला एक मासूम बच्चे की जिंदगी का है। उन्होंने बीमारी का नाम बताया, इलाज की प्रक्रिया का जिक्र किया और इंजेक्शन की कीमत का खुलासा किया। उन्होंने यह भी कहा कि वह खुद अपनी फाउंडेशन के जरिए मदद कर रहे हैं और लोगों से अनुरोध किया कि वे अपनी क्षमता के अनुसार 10, 20, 500 या 1000 रुपये जैसी छोटी राशि भी दें, ताकि बड़ी रकम इकट्ठा हो सके।
इस तरह की अपीलें अक्सर लोगों के दिल को छू जाती हैं, क्योंकि इसमें सीधे तौर पर जीवन और मृत्यु का सवाल जुड़ा होता है। सोशल मीडिया पर लाखों फॉलोअर्स रखने वाले किसी व्यक्ति की बात पर लोग जल्दी भरोसा कर लेते हैं। यही वजह है कि कुछ ही घंटों में इस वीडियो ने तेजी से ध्यान खींचा और लोग मदद को तैयार दिखे।
सोशल मीडिया पर चैरिटी का बदलता चेहरा
पिछले कुछ वर्षों में सोशल मीडिया चैरिटी का बड़ा माध्यम बन गया है। कई बार इस माध्यम से जरूरतमंदों को वास्तविक मदद भी मिली है। लेकिन इसके साथ ही फर्जी अपीलों, गलत जानकारी और भावनात्मक शोषण के मामले भी सामने आए हैं। यही कारण है कि अब हर अपील के साथ सवाल भी खड़े होने लगे हैं।
जब कोई सेलिब्रिटी या बड़ा इन्फ्लुएंसर किसी बीमारी या संकट की बात करता है, तो आम आदमी के मन में यह धारणा बन जाती है कि मामला सत्य ही होगा। लेकिन क्या हर बार ऐसा होता है? इसी सवाल ने इस पूरे विवाद को जन्म दिया।
मुनव्वर फारूकी का वीडियो और गंभीर आरोप
एल्विश यादव की अपील के बाद मुनव्वर फारूकी का वीडियो सामने आया, जिसने पूरे घटनाक्रम को एक अलग मोड़ दे दिया। उन्होंने सीधे किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन साफ शब्दों में कहा कि कुछ एनजीओ आजकल मशहूर लोगों से इमोशनल वीडियो बनवाकर डोनेशन इकट्ठा कर रहे हैं। उन्होंने अपने निजी अनुभव का जिक्र करते हुए बताया कि एक बार उनके मैनेजर के पास भी ऐसा प्रस्ताव आया था, जिसमें एक बच्चे की मदद के नाम पर अपील करने के बदले बड़ी रकम देने की बात कही गई थी।
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि अगर इलाज सच में होता भी है, तो इलाज के बाद बचा हुआ पैसा कहां जाता है। क्या उसकी कोई पारदर्शी जानकारी दी जाती है या नहीं। उनके मुताबिक, इस तरह की भावनात्मक कहानियों के जरिए लोगों से पैसे निकलवाना गलत है और इसके पीछे किसी न किसी तरह का बिजनेस मॉडल जरूर काम कर रहा है।
भरोसे की लड़ाई: भावनाएं बनाम सवाल
इस पूरे मामले ने सोशल मीडिया पर दो ध्रुव बना दिए। एक तरफ वे लोग हैं, जो मानते हैं कि किसी मासूम बच्चे की जान बचाने के लिए सवाल पूछना भी संवेदनहीनता है। उनके अनुसार, अगर थोड़ी सी मदद से किसी की जिंदगी बच सकती है, तो बिना ज्यादा सोचे-समझे मदद करनी चाहिए।
दूसरी तरफ वे लोग हैं, जो कहते हैं कि भावनाओं के नाम पर आंख मूंदकर पैसे देना भी सही नहीं है। उनका मानना है कि पारदर्शिता जरूरी है, खासकर तब जब रकम करोड़ों में हो। इलाज की लागत, अस्पताल का नाम, डॉक्टरों की रिपोर्ट और फंड के इस्तेमाल की पूरी जानकारी सार्वजनिक होनी चाहिए।
एनजीओ, फंडिंग और पारदर्शिता की चुनौती
भारत में और दुनिया भर में एनजीओ के जरिए चैरिटी एक बड़ा सेक्टर बन चुका है। कई संगठन ईमानदारी से काम कर रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी हैं, जिन पर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। मुनव्वर फारूकी की बातों ने इसी संवेदनशील मुद्दे को उजागर किया।
उनका कहना था कि अगर कोई एनजीओ इतना बड़ा क्राउड फंड इकट्ठा कर रहा है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि इलाज के बाद बची राशि का क्या होगा। क्या वह किसी और मरीज के लिए इस्तेमाल होगी या किसी और उद्देश्य में जाएगी। पारदर्शिता के बिना भरोसा कायम नहीं रह सकता।
एल्विश यादव की मंशा पर सवाल या सिस्टम पर
यहां यह समझना भी जरूरी है कि इस पूरे विवाद में एल्विश यादव की मंशा पर सीधे आरोप नहीं लगाए गए हैं। मुनव्वर फारूकी ने भी अपने वीडियो में किसी व्यक्ति का नाम नहीं लिया। सवाल असल में उस सिस्टम पर उठाए गए हैं, जिसमें भावनात्मक अपीलें एक बड़े आर्थिक खेल का हिस्सा बन सकती हैं।
एल्विश यादव के समर्थकों का कहना है कि वह खुद मदद कर रहे हैं और उनकी अपील का मकसद केवल बच्चे की जान बचाना है। वहीं आलोचकों का कहना है कि इतनी बड़ी रकम के मामले में हर पहलू साफ होना चाहिए।
सोशल मीडिया यूजर्स की जिम्मेदारी
इस विवाद ने आम सोशल मीडिया यूजर्स की भूमिका पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। आज हर व्यक्ति के पास न सिर्फ देखने की ताकत है, बल्कि प्रतिक्रिया देने और पैसा भेजने की भी क्षमता है। ऐसे में जरूरी है कि भावनाओं के साथ-साथ विवेक का इस्तेमाल भी किया जाए।
किसी भी चैरिटी अपील से पहले यह देखना जरूरी है कि जानकारी कितनी स्पष्ट है, फंड किस खाते में जा रहा है और उसका इस्तेमाल कैसे होगा। सवाल पूछना गलत नहीं है, बल्कि यह एक जिम्मेदार नागरिक होने की निशानी है।
भावनात्मक अपील और नैतिक जिम्मेदारी
भावनात्मक कहानियां हमेशा असर करती हैं, लेकिन उनकी नैतिक जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होती है। यदि कोई अपील पूरी तरह सच्ची और पारदर्शी है, तो उसे खुलकर जानकारी देनी चाहिए। वहीं अगर किसी को संदेह है, तो उसे भी शालीन तरीके से सवाल उठाने का अधिकार है।
इस पूरे मामले में यही टकराव देखने को मिला है। एक तरफ बच्चे की जिंदगी बचाने की कोशिश और दूसरी तरफ संभावित धोखाधड़ी की आशंका।
निष्कर्ष: मदद भी जरूरी, सवाल भी
यह विवाद किसी एक व्यक्ति या वीडियो तक सीमित नहीं है। यह सोशल मीडिया के दौर में भरोसे, पारदर्शिता और जिम्मेदारी की बड़ी बहस है। मासूम की मदद करना सबसे बड़ा धर्म है, लेकिन उसी के साथ यह भी जरूरी है कि मदद सही जगह पहुंचे।
यदि चैरिटी और फंडिंग में पारदर्शिता होगी, तो ऐसे विवाद अपने आप खत्म हो जाएंगे। जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक हर भावुक अपील के साथ सवाल उठते रहेंगे और यह बहस जारी रहेगी।
