मध्यप्रदेश के लोक निर्माण विभाग में वर्षों से जमी हुई व्यवस्था को बदलने की दिशा में सरकार ने एक बड़ा और निर्णायक कदम उठाने की तैयारी कर ली है। लंबे समय से एक ही जगह पदस्थ इंजीनियरों को लेकर उठते रहे सवालों और निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर लगते आरोपों के बीच अब विभाग में तथाकथित “बड़ी सर्जरी” की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है। इस फैसले का सीधा असर उन इंजीनियरों पर पड़ेगा, जो बीते 15 से 20 वर्षों से एक ही जिले, एक ही संभाग या यहां तक कि एक ही कार्यालय में जमे हुए हैं।

लोक निर्माण विभाग प्रदेश के बुनियादी ढांचे की रीढ़ माना जाता है। सड़कें, पुल, सरकारी भवन, अस्पताल, स्कूल और अन्य सार्वजनिक निर्माण इसी विभाग के जिम्मे होते हैं। ऐसे में यहां होने वाले हर फैसले का सीधा असर आम जनता की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ता है। लेकिन पिछले कई वर्षों से यह आरोप लगते रहे हैं कि विभाग के भीतर एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जो स्थानांतरण से लगभग अछूता रहा है। यही कारण है कि अब सरकार और विभागीय नेतृत्व ने इस स्थिति को बदलने का मन बना लिया है।
गुणवत्ता जांच का विरोध बना कार्रवाई की वजह
हाल के महीनों में लोक निर्माण विभाग द्वारा निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर औचक निरीक्षण शुरू किए गए थे। इन निरीक्षणों का मकसद यह जानना था कि सड़कें, पुल और भवन तय मानकों के अनुरूप बनाए जा रहे हैं या नहीं। लेकिन विभागीय सूत्रों के अनुसार, कुछ स्थानों पर इन निरीक्षणों का खुले तौर पर या परोक्ष रूप से विरोध किया गया। कहीं फाइलें समय पर उपलब्ध नहीं कराई गईं तो कहीं निरीक्षण दल के सामने तकनीकी अड़चनें खड़ी की गईं।
यही विरोध विभागीय नेतृत्व को सबसे ज्यादा खटक गया। माना गया कि अगर कोई अधिकारी या इंजीनियर पारदर्शी तरीके से काम कर रहा है, तो उसे जांच से डरने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। इसके बाद यह साफ संकेत मिलने लगे कि जिन इंजीनियरों ने वर्षों से एक ही स्थान पर रहकर मजबूत पकड़ बना ली है, वही व्यवस्था में बदलाव के सबसे बड़े रोड़े बन रहे हैं।
बीस साल से जमे इंजीनियरों पर नजर
सूत्रों के मुताबिक, विभाग ने उन इंजीनियरों को चिह्नित करने का निर्णय लिया है, जो 20 साल या उससे अधिक समय से एक ही स्थान पर पदस्थ हैं। इसमें उपयंत्री, सहायक यंत्री और कार्यपालन यंत्री स्तर तक के अधिकारी शामिल हो सकते हैं। कई मामलों में यह अवधि 25 साल तक भी पहुंच चुकी है।
इन इंजीनियरों को हटाने का फैसला अचानक नहीं लिया गया है। लंबे समय से विभाग के भीतर यह चर्चा चल रही थी कि एक ही स्थान पर लंबे समय तक पदस्थ रहने से अधिकारी स्थानीय ठेकेदारों, जनप्रतिनिधियों और अन्य प्रभावशाली लोगों से जरूरत से ज्यादा नजदीकी बना लेते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि निर्माण कार्यों में लापरवाही, घटिया सामग्री और नियमों की अनदेखी पर भी आंखें मूंद ली जाती हैं।
प्रमुख अभियंता को सौंपी गई अहम जिम्मेदारी
इस पूरी प्रक्रिया को व्यवस्थित और पारदर्शी बनाने के लिए विभाग ने प्रमुख अभियंता को विशेष जिम्मेदारी सौंपी है। उन्हें निर्देश दिए गए हैं कि वे प्रदेशभर के सभी मुख्य अभियंताओं से जानकारी लेकर ऐसे इंजीनियरों की विस्तृत सूची तैयार करवाएं, जो लंबे समय से एक ही स्थान पर जमे हुए हैं।
इस सूची में केवल नाम ही नहीं, बल्कि पदस्थापना का पूरा इतिहास शामिल किया जाएगा। कब किस पद पर नियुक्ति हुई, कितने वर्षों से एक ही जिले या कार्यालय में पदस्थ हैं, पहले कहां-कहां काम कर चुके हैं, इसका पूरा ब्यौरा मांगा गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तबादलों में किसी तरह की मनमानी या पक्षपात की गुंजाइश न रहे।
कर्मचारियों की कमी के बावजूद क्यों जरूरी है यह फैसला
यह सच है कि मध्यप्रदेश में पिछले कई वर्षों से सरकारी विभागों में भर्तियां सीमित रही हैं। लोक निर्माण विभाग भी इससे अछूता नहीं है। इंजीनियरों और तकनीकी स्टाफ की कमी के चलते कई परियोजनाएं पहले ही दबाव में चल रही हैं। बावजूद इसके सरकार ने यह फैसला लिया है कि जमे हुए इंजीनियरों को हटाना जरूरी है।
सरकार का मानना है कि समस्या केवल संख्या की नहीं, बल्कि व्यवस्था की भी है। अगर एक ही व्यक्ति दशकों तक एक ही जगह पर रहेगा, तो चाहे वह कितना ही सक्षम क्यों न हो, समय के साथ उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़े होने लगते हैं। नए स्थान पर भेजे जाने से न सिर्फ कामकाज में ताजगी आती है, बल्कि जवाबदेही भी बढ़ती है।
राजनीतिक संरक्षण की चर्चा भी आई सामने
लोक निर्माण विभाग में लंबे समय से जमे इंजीनियरों को लेकर यह चर्चा भी आम रही है कि उन्हें राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। जब भी तबादलों की सूची बनती है, तो किसी न किसी स्तर पर दबाव आ जाता है। कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधि खुलकर उनके समर्थन में सामने आते हैं।
यह भी देखा गया है कि 2020 में सत्ता परिवर्तन के बाद भी कई ऐसे इंजीनियर अपनी जगह पर बने रहे, जिनके तबादले लगभग तय माने जा रहे थे। इस बार विभाग का दावा है कि सूची पूरी तरह तथ्यात्मक होगी और केवल पदस्थापना की अवधि के आधार पर निर्णय लिया जाएगा।
नियम क्या कहते हैं और अब तक क्या होता रहा
प्रशासनिक नियमों के अनुसार, किसी भी अधिकारी को सामान्य परिस्थितियों में तीन वर्ष से अधिक समय तक एक ही स्थान पर पदस्थ नहीं रखा जाना चाहिए। यह नियम अखिल भारतीय सेवाओं से लेकर राज्य सेवाओं तक लागू होता है। चुनाव आयोग भी निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए सबसे पहले उन्हीं अधिकारियों को हटाने का आदेश देता है, जो लंबे समय से एक ही स्थान पर तैनात होते हैं।
इसके बावजूद लोक निर्माण विभाग में यह नियम वर्षों से कागजों तक ही सीमित नजर आया। अब विभागीय स्तर पर इसे सख्ती से लागू करने की बात कही जा रही है।
निर्माण गुणवत्ता सुधारने की उम्मीद
इस पूरे फैसले का सबसे बड़ा उद्देश्य निर्माण कार्यों की गुणवत्ता में सुधार लाना बताया जा रहा है। सड़कों के गड्ढे, समय से पहले टूटते पुल और अधूरे सरकारी भवन अक्सर जनता के गुस्से का कारण बनते हैं। जब एक ही इंजीनियर वर्षों तक एक इलाके में रहता है, तो उस पर सवाल उठाना मुश्किल हो जाता है।
नए इंजीनियरों की तैनाती से उम्मीद की जा रही है कि वे पुराने समीकरणों से मुक्त होकर काम करेंगे और गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं करेंगे। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि यह कदम लंबे समय में लोक निर्माण विभाग की साख को मजबूत करेगा।
आने वाले समय में क्या बदल सकता है
सूत्रों के अनुसार, सूची तैयार होने के बाद चरणबद्ध तरीके से तबादले किए जाएंगे। शुरुआत उन जिलों और संभागों से हो सकती है, जहां सबसे ज्यादा शिकायतें सामने आई हैं। इसके बाद पूरे प्रदेश में यह प्रक्रिया लागू की जाएगी।
यह भी संकेत दिए गए हैं कि भविष्य में तबादला नीति को और सख्त बनाया जाएगा, ताकि कोई भी अधिकारी लंबे समय तक एक ही स्थान पर जड़ न जमा सके।
